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क्या पुलिस के पास किसी आरोपी की जान लेने का अधिकार है?

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Updated: December 6, 2019, 4:36 PM IST
क्या पुलिस के पास किसी आरोपी की जान लेने का अधिकार है?
हैदराबाद गैंगरेप के सभी चार आरोपी पुलिस एनकाउंटर में मारे गए

हैदराबाद गैंगरेप (Hyderabad Gangrape) के आरोपियों के पुलिस एनकाउंटर (Police encounter) में मारे जाने के बाद कई तरह के सवाल उठ रहे हैं. एक सवाल ये भी है कि चाहे आरोपी ने कितना भी संगीन अपराध (crime) क्यों न किया हो क्या पुलिस के पास उसकी जान (killing) लेने का अधिकार है...

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  • Last Updated: December 6, 2019, 4:36 PM IST
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हैदराबाद गैंगरेप (Hyderabad Gangrape) के सभी चार आरोपियों को पुलिस ने एक एनकाउंटर (police encounter) में मार गिराया. पुलिस का कहना है कि वो आरोपियों को लेकर घटनास्थल पर क्राइम सीन (crime scene) रिक्रिएट करने गए थे. वहां आरोपी पुलिस से हथियार छीनकर फायरिंग कर भागने लगे. पुलिस को उन्हें रोकने के लिए गोली चलानी पड़ी, जिसमें चारों आरोपी मारे गए. पुलिस के मुताबिक उन्हें आत्मरक्षा में गोली चलानी पड़ी, जिसमें आरोपियों की मौत हो गई.

अब लोग इस एनकाउंटर का जश्न मना रहे हैं. एनकाउंटर करने वाले पुलिसवालों पर फूलों की बारिश की जा रही है. देशभर में लोग इस एनकाउंटर पर खुशी जता रहे हैं. कुछ नेताओं ने भी इसकी तारीफ की है. यूपी की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने पुलिस के कारनामे को प्रशंसनीय बताया है. उन्होंने कहा कि इंसाफ हो गया है.

पुलिस एनकाउंटर के बारे में अभी विस्तार से जानकारी नहीं दी जा रही है. हालांकि इसपर कई तरह के सवाल जरूर उठ रहे हैं. आरोपियों के अपराध की वीभत्सता के बावजूद ये सवाल उठता है कि क्या ये पुलिस एनकाउंटर जरूरी था? क्या सच में पुलिस ने अपनी आत्मरक्षा में गोली चलाकर आरोपियों की जान ली? क्या न्यायिक व्यवस्था के दायरे में आरोपियों को सजा दी जाती तो ज्यादा अच्छा नहीं रहता? और सबसे बड़ा सवाल तो ये है कि चाहे आरोपी ने कितना भी संगीन अपराध क्यों न किया हो क्या पुलिस के पास उसकी जान लेने का अधिकार है?

पुलिस एनकाउंटर पर क्या कहता है कानून?

पुलिस एनकाउंटर पर 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने कुछ गाइडलाइंस दिए हैं. सुप्रीम कोर्ट ने 2015 के अपने फैसले में किसी भी तरह के पुलिस एनकाउंटर की न्यायिक जांच जरूरी कर दी है. इसका मतलब है कि हैदराबाद गैंगरेप के आरोपियों के एनकाउंटर की भी न्यायिक जांच होगी.

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हैदराबाद एनकाउंटर करने वाले पुलिसवालों पर लोग फूल बरसा रहे हैं


2015 में पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज़ बनाम स्टेट ऑफ महाराष्ट्र के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ये निर्णय दिया था. महाराष्ट्र में पुलिस के किए 99 एनकाउंटर पर सवाल उठाए गए थे. 1995 से 1997 के दौरान महाराष्ट्र में पुलिस एनकाउंटर में 135 लोग मारे गए थे. ये 1993 में हुए बम ब्लास्ट के बाद का दौर था. मुंबई की कानून व्यवस्था दुरुस्त करने के लिए वहां की पुलिस सख्ती पर उतर आई थी. इसी दौरान पुलिस ने कई एनकाउंटर किए थे.सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में हर पुलिस एनकाउंटर में हुई मौत की मजिस्ट्रेट से जांच को जरूरी कर दिया है, ताकि ये पता चल सके कि ऐसे एनकाउंटर में पुलिस की भूमिका क्या थी, और क्या पुलिस एनकाउंटर जरूरी था.

क्या किसी भी परिस्थिति में हत्या को जायज ठहराया जा सकता है?
कानूनन किसी भी तरह के आरोपी को मार डालने को जायज नहीं ठहराया जा सकता. चाहे आरोपी ने रेप या हत्या जैसा गंभीर अपराध ही क्यों नहीं किया हो. मजबूत न्यायिक व्यवस्था कायम रखने के लिए ये जरूरी है. पुलिस या कोई जांच एजेंसी किसी अपराध की जांच करते वक्त कोई फैसला नहीं सुना सकती. पुलिस का काम सिर्फ जांच करना है. जांच के आधार पर फैसला देना न्याय व्यवस्था का काम है.

इंडियन पीनल कोड और क्रिमिनल प्रोसीजर कोड के मुताबिक सिर्फ मौत होने वाले हालात में ही आत्मरक्षा में किसी की जान लेना अपराध के दायरे में नहीं आता है. लेकिन इसे भी साबित करना पड़ता है.

इस लिहाज से कानूनन पुलिस को कुछ छूट भी हासिल है. इंडियन पीनल कोड का का सेक्शन 96 कहता है कि अगर पुलिस अपनी आत्मरक्षा में कोई कदम उठाती है तो वो अपराध के दायरे में नहीं आता. आईपीसी के सेक्शन 100 में वैसी स्थितियों का जिक्र किया गया है, जिसके अंतर्गत आत्मरक्षा के अधिकार का इस्तेमाल किया जा सकता है. इसमें उस हालात की भी चर्चा की गई है, जिसमें अगर आत्मरक्षा में हमलावर के खिलाफ कार्रवाई न की जाए तो जान भी जा सकती है.

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आरोपियों के एनकाउंटर पर लोगों ने मनाई खुशी


इस तरह पुलिस एनकाउंटर को जायज ठहराती है
इसी तरह से सीआरपीसी का सेक्शन 46 कहता है कि अगर कोई आरोपी या संदिग्ध अपनी गिरफ्तारी का विरोध करता है या गिरफ्तारी से बचना चाहता है तो ऐसी स्थिति में पुलिस सभी जरूरी कदम उठा सकती है. इसमें ये भी जिक्र है कि पुलिस के पास किसी की जान लेने की वजह बनने का अधिकार नहीं है, जब तक की आरोपी ने मौत की सजा या फिर उम्रकैद की सजा के बराबर का अपराध नहीं किया हो.

इसी का सहारा लेकर अक्सर पुलिस एनकाउंटर को जायज ठहराने की कोशिश की जाती है. पुलिस को मिले इस अधिकार की वजह से अक्सर ये कहा जाता है कि अगर फांसी की सजा या उम्रकैद की सजा के बराबर अपराध करने वाली अपराधी की पुलिस के हाथों मौत हो जाती है तो इसे इंसाफ के एक पुलिसिया ऑप्शन की तरह देखा जाए.

पुलिस एनकाउंटर पर सुप्रीम कोर्ट का 16 पॉइंट का गाइडलाइन

सुप्रीम कोर्ट के 2015 के फैसले में 16 पॉइंट का गाइडलाइन दिया गया है. उसी की कसौटी पर न्यायिक व्यवस्था के बाहर हुई हत्या को कसा जाता है. खासतौर पर सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था पुलिस की मौजूदगी में हुई ऐसी हत्या, जिसमें गन का इस्तेमाल हुआ है, उसकी जांच अनुभवी सीआईडी के अधिकारी या किसी दूसरे पुलिस स्टेशन के अधिकारी या मजिस्ट्रेट करें. ऐसी परिस्थिति में मानवाधिकार आयोग को भी जानकारी दी जाए.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अगर पुलिस ने फायरआर्म्स का इस्तेमाल कर किसी की जान ली हो तो सबसे पहले इसकी एफआईआर लिखी जाए और व्यवस्थित तरीके से आपराधिक जांच को अंजाम दिया जाए. ऐसे मामलों में पुलिस बिना देरी किए एफआईआर की कॉपी और केस डायरी कोर्ट को सौंपे. सुप्रीम कोर्ट के गाइडलाइंस में ये भी लिखा गया है कि अगर एनकाउंटर में मारे गए शख्स के परिजनों को ये लगता है कि पुलिस गाइडलाइंस को फॉलो नहीं कर रही है तो वो सेशन जज से इसकी शिकायत कर सकते हैं. ऐसी स्थिति में जज एक्शन ले सकते हैं.

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First published: December 6, 2019, 4:36 PM IST
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