अगर ग्लोबल वार्मिंग काबू नहीं की तो कहर ढा देगा हिंद महासागर का पुराना अल नीनो

अगर ग्लोबल वार्मिंग काबू नहीं की तो कहर ढा देगा हिंद महासागर का पुराना अल नीनो
हिंद महसागर में अलनीनो का पुराना प्रभाव बहुत ही खतरनाक तबाही मचा सकता है.

ग्लोबल वार्मिंग(Global Warming) से संकेत मिल रहे हैं कि तापमान वृद्धि हिंद महासागर (Indian Ocean) में पुराना अल नीनो (Al Nino) आ सकता है जो भारत सहित कई देशों में कहर ढा देगा.

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नई दिल्ली: जलवायु परिवर्तन (Climate Change) के खतरों से हमें आगाह करने वाली कई घटनाएं हो चुकी है. अब इससे एक और खतरा आने के संकेत मिले हैं. शोधकर्ताओं ने पाया है कि अगर जलायु परिवर्तन के कारकों को नियंत्रित नहीं किया गया तो हिंद महासागर में पुराने अल नीनो स्टाइल (Al Nino) के सिस्टम की वापसी हो सकती है.

एक और खतरा
अगर हमें ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन की कठिन चुनौतियों से पार पाना है तो हमें उन्हें और उनके प्रभावों को बहुत अच्छे से समझना होगा.  मौसम के मिजाज को समझने का प्रयास करता हुआ यह शोध इस नए खतरे की ओर संकेत कर रहा है.

क्या है यह अल नीनो
यह एक सामान्य मौसम प्रक्रिया है जिसकी वजह से दक्षिणी अमेरिका के देश पेरू और इक्वाडोर के तटीय प्रशांत महासागर का पानी बहुत गर्म हो जाता है. इसका ऑस्ट्रेलिया में पड़ने वाले सूखे और दक्षिण अमेरिका में हो रही भारी बारिश से भी संबंध है और यह जलवायु परिवर्तन के कारण और भी खतरनाक हो गया है. लेकिन हमारे ग्रह के और गर्म होते रहने से पुराने तरह का अल नीनो फिर से सिर उठा सकता है.



क्या होगा हिंद महासागर में
ताजा शोध दर्शाता है कि हिंद महासागर के तापमान में थोड़ी सी वृद्धि उसके मौसम के बर्ताव में खास बदलाव ला सकता है. ये बदलाव उसी तरह के होंगे जो प्रशांत महासागर में अलनीनों के कारण होते हैं. यह बदलाव स्पष्ट तौर पर साल 2050 में दिखाई भी लगेंगे. यह वैसे ही प्रभाव होंगे जैसे कि 21 हजार साल पहले पिछली आईस एज में हवा और बारिश से होते थे.

कैसा होगा हिंद महासागर का खुद का अलनीनो
इसकी वजह से हिंद महासागर के आसपास के इलाकों में तूफान, बाढ़, सूखे जैसी घटनाएं बढ़ने लगेंगी. इस तरह का प्रभाव पहले ही अफ्रीका, एशिया और ऑस्ट्रेलिया में जलवायु परिवर्तन की वजह से दिखाई दे रहा है. एस्टिन की टेक्सास यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक पैड्रो डिनेजियो का कहना है, “हमारा शोध बताता है कि दुनिया का औसत तापमान केवल कुछ ही डिग्री बढ़ने या घटने से हिंद महासागर में भी वैसा ही बदलाव आएगा जैसा कि दूसरे कटिबंधीय महासागरों में आया है. इससे भूमध्यरेखा के पास सतह का तापमान अनियमित हो जाएगा और जलवायु में विविधता बढ़ेगी और उसकी एक अपना अल नीनो प्रभाव दिखेगा.

इल नीनो की वजह से बा़ढ़ के आलावा लंबे सूखे भी पड़ेंगे.


तापमान बढ़ने से आएगा बदलाव
डिनेजियो और उनके साथियों ने 36 अलग जलवायु मॉडल बनाए और उनमें से उनको छांटा जो आज के हालात के हिसाब से मेल खाते हैं. इसके बाद उन्होंने यह जानने की कोशिश की कि तापमान बढ़ने से हिंद महासागर के मौसम में कैसा बदलाव आएगा.

जलावायु परिवर्तन का कम बदलाव दिखा है अभी तक
फिलहाल हिंद महासागर में साल दर साल तापमान में बहुत कम बदलाव देखने को मिल रहा है. इसका कारण पश्चिम से पूर्व की ओर बहने वाली पवनें हैं. वे हालात को स्थायी बनाए हुए हैं.  मॉडल बताते हैं कि ग्लोबल वार्मिंग से इन पवनों की दिशा पलट जाने का जोखिम है.

लेकिन यदि यही हाल रहा तो मामला बिगड़ जाएगा
यदि मौसम के स्वरूप में इसी तरह से बदलाव होता रहा यहां एक और अलनीनो प्रभाव आ गया, तो इससे महीनों चलने वाली गर्म और ठंडे होने की प्रक्रिया में भी बदलाव हो जाएगा. और तब हिंद महासागर वैसा ही हो जाएगा जैसा कभी था.

बढ़ता ही जा रहा है जोखिम
सब कुछ ग्लोबल वार्मिंग की दर पर निर्भर करता है यानि कि इस पर क्या कि ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन रुकता है या नहीं. डिनेजियो का कहना है कि उन्हें यकीन है कि इन घटनाओं के होने की संभवाना का जोखिम बढ़ता ही जा रहा है. हम और ज्यादा कार्बन डाइऑक्साइड हवा में भर रहे हैं और इसका उष्णकटिबंधीय (Tropical) इलाकों के देशों पर कम ज्यादा असर जरूर होगा.

दस हजार साल पुराने बदलाव दिखेंगे
शोध के मुताबिक बढ़ता तापमान हिंद महासागर में आज वैसा ही असर दिखा रहा है जैसे ग्लेशियर ने दस हजार साल पहले दिखाया था और मौसम के हालात बहुत ही ज्यादा बदल गए थे. पवनों की दिशा में यह बदलाव दुनिया में बहुत ही ज्यादा असर दिखाएगा जिसमें कहीं ज्यादा बाढ़ तो कहीं ज्यादा लंबा सूखा दिखाई देगा. हम जलवायु परिवर्तन का असर पहले ही ऑस्ट्रेलिया के जंगलों की आग में देख चुके हैं.

यह कैसे होगा यह तो इन मॉडलों से पता नहीं चलता, लेकिन इतना तय है कि अगर कुछ नहीं किया गया तो दुनिया बदलना तय है.

 
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