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अगर भारत ने खरीद लिया होता ये इलाका तो पाकिस्तान होता बेहद कमजोर!

News18Hindi
Updated: January 15, 2020, 9:20 PM IST
अगर भारत ने खरीद लिया होता ये इलाका तो पाकिस्तान होता बेहद कमजोर!
1947 में जब भारत-पाकिस्तान का बंटवारा हुआ तब ग्वादर पोर्ट का इलाका ओमान का हिस्सा हुआ करता था.

माना जाता है कि भारत ने इस इलाके में दिलचस्पी न दिखाकर गलती की थी. अगर भारत (India) ने तब इस इलाके की खरीद में दिलचस्पी दिखाई होती तो न सिर्फ पश्चिमी एशिया (West Asia) की गतिविधियों पर बेहतर निगाह रखी जा सकती थी बल्कि रणनीतिक तौर पर भी भारत बेहतर जगह खड़ा होता.

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पाकिस्तान के निवासी और कनाडा के नागरिक तारेक फतेह (Tarek Fateh) अक्सर टीवी डिबेट्स में कहते पाए जाते हैं कि ग्वादर पोर्ट (Gwadar Port) को पाकिस्तान ने चीन को बेच दिया है, अगर भारत चाहता तो ये पोर्ट उसके पास होता. भारत-पाक-चीन के संबंधों की जब भी चर्चा होती है ग्वादर पोर्ट पर जरूर बात होती है. चीन भी इस पोर्ट पर गंभीरता से ध्यान दे रहा है. वो इसे पाकिस्तान के साथ आर्थिक गलियारे के तौर पर विकसित करना चाहता है. वहीं दूसरी तरफ ईरान के साथ मिलकर भारत चाबहार पोर्ट विकसित कर रहा है. इसे चीन को भारतीय रणनीतिक जवाब माना जाता है. क्या वाकई में ऐसा है कि अगर भारत चाहता तो आज ग्वादर पोर्ट उसके पास होता? इस तर्क में दम तो है लेकिन भारत ने इसे लेने से क्यों मना कर दिया, इसके पीछे क्या वजह थी?

भारत-पाकिस्तान की आजादी और ग्वादर
1947 में जब भारत-पाकिस्तान का बंटवारा हुआ तब ग्वादर पोर्ट का इलाका ओमान का हिस्सा हुआ करता था. पाकिस्तान बनने के बाद इस इलाके को ओमान के सुल्तान बेचना चाहते थे. दूसरी बात यह भी थी कि यहां के स्थानीय लोगों ने पाकिस्तान में शामिल होने के लिए प्रदर्शन तेज कर दिया था. ओमान के सुल्तान को इन प्रदर्शनों की चिंता थी. भारत और ओमान के संबंध अच्छे हुए करते थे. कहा जाता है कि ओमान के सुल्तान चाहते थे कि इस इलाके को भारत खरीद ले. लेकिन भारत के लिए मुश्किल ये थी कि वो देश की सीमा से करीब 700 किलोमीटर की दूरी पर पड़ता था और बीच में पाकिस्तान था. पाकिस्तान इस इलाके में किसी भी वक्त विद्रोह को हवा दे सकता था क्योंकि आम लोगों के बीच पाकिस्तान को लेकर सेंटिमेंट ज्यादा प्रभावी थे.



पाकिस्तान के लिए ये इलाका एक तरीके से प्रतिष्ठा का प्रश्न भी था. ये बातचीत चल रही थी लेकिन कोई आम सहमति नहीं बन पा रही थी. 1957 में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने फिरोज शाह नून. फिरोज शाह पेशे से बैरिस्टर थे और ब्रिटेन में पढ़ाई की थी. मुहम्मद अली जिन्ना के साथ पाकिस्तान बनाने वालों में फिराज शाह नून भी एक बड़े नाम थे. ग्वादर पोर्ट के इलाके में उन्होंने तेजी के साथ दिलचस्पी ली. फिरोज शाह ने ग्वादर का इलाका खरीदने के लिए तब ओमान की यात्रा की थी. भारत की दिलचस्पी कम देखते हुए ओमान के सुल्तान ने पाकिस्तान के साथ इस इलाके पर डील कर ली. 1958 के आखिरी में दोनों देशों के बीच इस इलाके को लेकर समझौता हो गया. पाकिस्तान ने इस इलाके को करीब 3 मिलियन डॉलर की रकम अदाकर खरीद लिया. बताते हैं इस डील में पाकिस्तान के पीछे अमेरिका का भी साथ था. तब इस इलाके को पाकिस्तान के मकरान जिले का हिस्सा घोषित कर दिया गया. ये इलाका उस जिले की एक तहसील है.

अंग्रेजों ने पोर्ट के तौर पर किया था विकसित
1857 में भारत के पहले स्वतंत्रता संग्राम को दबा देने के बाद अंग्रेजों ने ओमान की तत्काली राजशाही के ग्वादर इलाके के इस्तेमाल की इजाजत मांगी थी. ये इजाजत राजशाही से उन्हें आराम से मिल गई. इस इलाके की रणनीतिक पोजीशन का ध्यान रखते हुए अंग्रेजों ने यहां पर छोटा पोर्ट विकसित किया था जहां छोटे जहाज और स्टीमर चला करते थे.पाकिस्तान के खरीदने के बाद की स्थिति
पाकिस्तान द्वारा इस इलाके को खरीद लेने का बाद भी ये इलाका कई दशक तक दरकिनार ही पड़ा रहा जब तक कि चीन की एंट्री नहीं हुई. दरअसल साल 2013 में पाकिस्तान ने चीन को यह इलाका 40 सालों के लिए बेच दिया. अब चीन इस पोर्ट को अपने हिसाब से विकसित कर रहा है. माना जा रहा है कि भविष्य में चीन के लिए बड़ा रणनीतिक केंद्र साबित होगा. पाकिस्तान के इस कदम की आलोचना उसके देश के भीतर भी होती है लेकिन माना जाता है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चीन के सहयोग को देखते हुए पाकिस्तान ने ये फैसला किया. इसके एवज में पाकिस्तान चीन से समय-समय पर मदद मांगता रहता है.

ग्वादर इलाके में ऐसी स्थिति बनने के बाद भारत ने भी ईरान के साथ मिलकर चाबहार पोर्ट को विकसित करना शुरू किया है. ये भारत के लिए रणनीतिक तौर पर बड़ा कदम माना जाता है. ग्वादर से चाबहार की दूरी 170 किलोमीटर की है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि यहां पर मौजूदगी के जरिए भारत चीन की गतिविधियों पर निगाह रख पाएगा.

जब ग्वादर को लेकर बातचीत चल रही थी भारत के प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू थे.
जब ग्वादर को लेकर बातचीत चल रही थी भारत के प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू थे.


अगर भारत ने खरीदा होता ये इलाका!
माना जाता है कि भारत ने इस इलाके में दिलचस्पी न दिखाकर गलती की थी. अगर भारत ने तब इस इलाके की खरीद में दिलचस्पी दिखाई होती तो न सिर्फ पश्चिमी एशिया की गतिविधियों पर बेहतर निगाह रखी जा सकती थी बल्कि रणनीतिक तौर पर भी भारत बेहतर जगह खड़ा होता. पाकिस्तान पर भी निगाह रखने के लिए ये इलाका बेहतरीन साबित होता. चीन की इस इलाके में एंट्री के बाद भारत के लिए जो मुश्किलें खड़ी हुई हैं, वो शायद न होतीं. लेकिन यह भी सच है तब भारत के लिए उस इलाके पर नियंत्रण रख पाना भी आसान नहीं था. आजादी के ठीक बाद भारत आर्थिक, सामाजिक और सामरिक रूप से मजबूती के प्रयासों में लगा था. साथ ही पाकिस्तान इलाके में विद्रोह पनपाने में कोई कसर नहीं छोड़ता. इस इलाके पर नियंत्रण रखना आसान नहीं था.
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First published: January 15, 2020, 9:13 PM IST
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