अगर आपातकाल नहीं लगाकर इंदिरा देतीं इस्तीफा तो ये तीन नेता हो सकते थे पीएम

हाईकोर्ट का फैसला आने के बाद इंदिरा गांधी पद से इस्तीफा देने के बारे में सोचने लगी थीं

हाईकोर्ट का फैसला आने के बाद इंदिरा गांधी पद से इस्तीफा देने के बारे में सोचने लगी थीं

वर्ष 1975 के जून महीने में घटनाक्रम जिस तरह से बदल रहे थे. उसमें इंदिरा गांधी ने इस्तीफा देने का फैसला भी किया था. ऐसे में तीन कांग्रेसी नेता प्रधानमंत्री बन सकते थे. जिनके नाम खुद इंदिरा गांधी ने भी सोचे थे. कौन थे ये तीन चेहरे.

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कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने पहली बार सार्वजनिक तौर पर एक इंटरव्यू में देश में इमर्जेंसी लगाए जाने को गलत फैसला बताया. उन्होंने कहा कि ये सही फैसला नहीं था. दरअसल वर्ष 1975 के जून महीने में जिस तरह घटनाक्रम नाटकीय तरीके से बदले, उसमें इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक फैसले के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा के इस्तीफा देने तक की नौबत आ गई. माना जाता है कि उस समय उन्होंने इस्तीफा देने के बारे में सोच लिया था बल्कि ये भी मन बना लिया था कि किसको प्रधानमंत्री बना दिया जाना चाहिए.

12 जून 1975 को न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा ने इंदिरा गांधी के लोकसभा चुनाव को रद्द कर दिया. उन्हें 06 वर्ष तक किसी भी संवैधानिक पद के लिए अयोग्य घोषित कर दिया. ये फैसला 1971 के चुनावों में रायबरेली में इंदिरा गांधी के हाथों पराजित उम्मीदवार राजनारायण द्वारा दायर याचिका पर सुनाया गया था. इसमें ये आरोप सही पाया गया कि उन्होंने अपने चुनाव प्रचार में सरकारी तंत्र का इस्तेमाल किया.

इस फैसले के खिलाफ इंदिरा सुप्रीम कोर्ट में अपील कर सकती थीं. उच्चतम न्यायालय छुट्टी पर होने के कारण अवकाशकालीन न्यायाधीश जस्टिस कृष्णा अय्यर के पास ये मामला पहुंचा. उन्होंने फैसले में कहा, अपील का फैसला आने तक वह प्रधानमंत्री बनी रह सकती हैं  लेकिन सदन में मतदान नहीं कर सकतीं.



जाने माने पत्रकार कुलदीप नैयर की किताब "बियांड द लाइंस - एन आटोबायोग्राफी" कहती है कि इलाहाबाद हाइकोर्ट के फैसले के बाद इंदिरा इस्तीफा देने की सोचने लगी थीं. लेकिन दो व्यक्तियों ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया, वो  थे संजय गांधी और पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धार्थशंकर बसु.
क्या वो कमलापति त्रिपाठी को पीएम बनाना चाहती थीं 
किताब कहती है, इंदिरा सचमुच इस्तीफा देने के बारे में सोच रही थीं. उन्होंने इस बारे में कमलापति त्रिपाठी से बात भी कर ली थी, जो सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने तक प्रधानमंत्री पद का पदभार संभाल सकते थे.

कुलदीप नैयर की किताब कहती है कि इंदिरा गांधी ने कमलापति त्रिपाठी से उनकी जगह प्रधानमंत्री बनने की बात कर ली थी.


इंदिरा ने मन ही मन क्या तय किया था
सागरिका घोष की किताब इंदिरा के अनुसार, इलाहाबाद के निर्णय के बाद उन्हें लगने लगा कि उनके पास तत्काल इस्तीफा देने के अलावा कोई राह नहीं है. लेकिन अंदर से शायद वो ऐसा नहीं भी करना चाहती थीं. किताब कहती है कि सिद्धार्थ शंकर रे तब इंदिरा के बुलावे पर दिल्ली आए. रे बाद में अपने तत्कालीन सचिव भास्कर घोष से कहा, इंदिरा पद छोड़ने पर अटल थीं. उन्होंने मन ही मन तय कर लिया था.

जगजीवन राम भी थे दावेदार
इंदिरा ने इस फैसले को तब बदला, जब कांग्रेस के बुजुर्ग नेता जगजीवन राम ने कहा, मैडम आप इस्तीफा बिल्कुल भी मत दीजिए,लेकिन अगर देती हैं तो अपने उत्तराधिकारी का चुनाव हम पर छोड़ दें. उनके इतना कहते ही इंदिरा की भावभंगिमा बदल गई. उन्हें लग गया कि अगर उन्होंने इस्तीफा दिया तो सत्ता से पूरी तरह हाथ धो बैठेंगी.

इंदिरा गांधी के मन में एकबारगी सबसे पहले जगजीवन राम को भी अपनी जगह गद्दी देने का विचार आया था. बाद में उन्होंने इसे त्याग दिया. हालांकि जगजीवन राम खुद भी तब पीएम बनने के इच्छुक थे.


शायद जगजीवन को लग रहा था कि सबसे बुजुर्ग नेता होने के कारण वो प्रधानमंत्री बन सकते हैं. बाद में उन्होंने इसे स्पष्ट भी किया. उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा, उनकी वफादारी केवल इंदिरा के लिए आरक्षित थी, यदि किसी अन्य उत्तराधिकारी का सवाल उठा तो उनका दावा अधिक प्रबल था.

इंदिरा को भी पहले ये लगा कि जगजीवन राम को पीएम बनाएं
किताब आगे कहती है, हाईकोर्ट के फैसले के बाद के हालात में इंदिरा को ही सबसे पहले ये सूझी कि बाबू जगजीवन राम को प्रधानमंत्री बनाया जाए और अपना मामला सुलटने तक इंतजार किया जाए. लेकिन उनके मन में डर बैठा हुआ था कि अगर एक बार पद छोड़ा तो फिर ये कभी वापस नहीं मिलेगा. फिर जब मीटिंग में जगजीवन राम ने उनसे वो बात कही तो उन्होंने तय कर लिया कि वो पद पर डटी रहेंगी.

पीएम के लिए सीनियर कांग्रेसजनों की ओर से जो नाम उभरा था, वो सरदार स्वर्ण सिंह थे, जो गैरविवादास्पद छवि वाले नेता थे.


तीसरा नाम इस सीनियर लीडर का उभरा था
हालांकि एक तीसरा नाम भी उस समय प्रधानमंत्री पद के लिए उभरा, वो थे तत्कालीन रक्षा मंत्री स्वर्ण सिंह का. रामचंद्र गुहा कि किताब इंडिया आफ्टर नेहरू में लिखा है, 23 जून को जब सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी और कहा कि फैसला आने तक वो पद पर बनी रह सकती हैं, तब 23 जून को इंडियन एक्सप्रेस ने छापा कि इसका मतलब ये हुआ कि प्रधानमंत्री को व्यक्तिगत और देश के हित में जरूर इस्तीफा दे देना चाहिए.

स्वर्ण सिंह गैर विवादास्पद नेता थे
किताब के अनुसार, अब तक कुछ सीनियर कांग्रेसी नेता भी सोचने लगे थे कि पार्टी के हित में श्रीमती गांधी को इस्तीफा देना जरूरी है. अगर वह संसद में मतदान नहीं कर सकतीं तो प्रभावशाली तरीके से देश का नेतृत्व कैसे करेंगी. उन्हें सलाह दी गई कि जब तक सुप्रीम कोर्ट उन्हें आरोपमुक्त नहीं कर देता, तब वो तात्कालिक तौर पर इस्तीफा दे दें. अपने किसी मंत्री को प्रधानमंत्री की गद्दी सौंप दें. प्रधानमंत्री पद के लिए उन्हें स्वर्ण सिंह का नाम सुझाया गया, जो एक गैर विवादास्पद नेता थे.

बाद में राजनीति में किनारे खिसकते गए
स्वर्ण सिंह लाहौर में एक कालेज में फिजिक्स के लेक्चरर थे. बाद में वकालत की पढ़ाई के लिए उन्होंने वो नौकरी छोड़ दी. वो भारत के सबसे लंबे समय तक केंद्रीय मंत्री रहने वाले नेता भी हुए. नेहरू के दौर से लेकर इंदिरा के प्रधानमंत्री रहने तक वह 24 सालों तक केंद्रीय मंत्री रहे. आपातकाल लागू होने के कुछ ही महीने बाद उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया. उसके बाद सक्रिय राजनीति से किनारे खिसकते गए.
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