क्या था वो वाकया जब 77 में सिखों ने इंदिरा की फैमिली को बचाया था, जिसे राहुल गांधी ने अब याद किया

वर्ष 1977 का चुनाव हारने के बाद इंदिरा गांधी उदास थी
वर्ष 1977 का चुनाव हारने के बाद इंदिरा गांधी उदास थी

पटियाला (Patiala) में सिख किसानों (Sikh Farmers) के एक धऱने को संबोधित करते हुए कांग्रेस नेता राहुल गांधी (Rahul Gandhi) ने एक ऐसा वाकया किया, जो शायद ही किसी को मालूम हो कि 1977 में इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) की हार के बाद सिखों ने उन्हें और उनके परिवार को बचाया था. जानते हैं क्या था वो वाकया.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 8, 2020, 1:58 PM IST
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कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने दो दिन पहले पटियाला में याद किया कि किस तरह 1977 में सिखों ने उनकी दादी इंदिरा गांधी और उनके परिवार को तब बचाया था, जबकि वो चुनाव में हार गईं थी. साथ ही कांग्रेस की बुरी पराजय हुई थी. ये पहली बार था जबकि इंदिरा गांधी को चुनाव में हार का सामना करना पड़ा था.

राहुल ने धरना दे रहे पंजाब के किसानों को कहा, उन्हें वर्ष 1977 की वो घटना याद आ रही है, तब वो केवल 07 साल के थे. वो घटना ऐसी है, जिससे उन्हें लगता है कि वो सिखों के कर्जदार हैं. आखिर क्या है वो घटना है, जिसका जिक्र 43 साल बाद उन्होंने जनता के सामने किया.

राहुल ने कहा कि ये घटना उन्हें कभी नहीं भूलती कि मार्च 1977 में लोकसभा चुनाव के परिणाम आ रहे थे. उनकी दादी इंदिरा गांधी और संजय गांधी चुनाव हार गए थे. तब दिल्ली के घर में उनका परिवार अकेला था. कोई सुरक्षा नहीं थी. तब ऐसे मौके पर सिखों ने आकर ना केवल उन्हें ढांढस बंधाया बल्कि उन्हें सुरक्षित महसूस कराया.



क्या थी वो घटना 
अब जानते हैं कि असल में ये घटना थी क्या. 20 मार्च 1977 को चुनाव परिणाम अप्रत्याशित थे. हालांकि आपातकाल के बाद जब चुनाव हुए तो ये तय था कि जनता का मिजाज बदला हुआ है. वो इमर्जेंसी से खुश नहीं है. इसकी प्रतिक्रिया चुनाव परिणामों में देखने को मिल सकती है. इसे भांपते हुए बिखरे हुए विपक्ष ने खुद को एक किया और जनता पार्टी के नाम से चक्र के बीच हलधर किसान के चुनाव चिन्ह पर चुनाव लड़ा.

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इंदिरा और संजय को हार का सामना करना पड़ा था 
विपक्ष में तब एक से एक दिग्गज नेता थे, जिसमें जय प्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, जगजीवन राम, चरण सिंह, राजनारायण आदि शामिल थे. राजनारायण ने पहली बार रायबरेली में इंदिरा गांधी को हरा दिया था. वहीं अमेठी से संजय गांधी को हार का सामना करना पड़ा था.

तब इंदिरा गांधी को पहली बार चुनावों में हार का सामना करना पड़ा था.


तब इंदिरा गांधी के घर पर परिवार के अलावा कोई नहीं था
जो नतीजे आ रहे थे, वो इंदिरा गांधी के लिए निराश करने वाले थे. ऐसे में उनके घर पर कोई नहीं था. ना तो कोई कांग्रेसी, ना कोई परिचित और ना ही सुरक्षा. इंदिरा को हार के चलते जहां उदासी ने घेर लिया वहीं सुरक्षा की चिंता भी सताने लगी.

तब सिखों का एक ग्रुप उनके घर पर पहुंचा
इस बारे में टाइम्स ऑफ इंडिया ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की है, जिसमें दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के पूर्व अध्यक्ष मंजीत सिंह ने इस घटना को याद किया. तब वो 19 साल के थे. उन्होंने बताया, 20 मार्च 1977 को जब चुनाव नतीजे आने शुरू हुए तो दिल्ली के विज्ञान भवन में उनके पिता जत्थेदार संतोष सिंह के जन्मदिन पर एक कार्यक्रम हो रहा था.

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इंदिरा जमीन पर बैठी थीं, उदास थीं
इंदिरा और संजय गांधी की हार की खबर आने के बाद संतोष सिंह वहां से कुछ सिखों को साथ लेकर सीधे 01 सफदरजंग पहुंचे, जहां इंदिरा गांधी रह रही थीं. जब वो वहां पहुंचे तो उन्होंने देखा कि इंदिरा जमीन पर बैठी हैं और उदास नजर आ रही हैं.

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इंदिरा गांधी उस समय अपने 01, सफदरजंग, दिल्ली के आवास पर परिवार के साथ अकेली थीं. कोई उनके साथ नहीं था. वो उदास थीं और चिंतित भी.


सिख जत्थेदार ने उन्हें ढांढस बंधाया
तब जत्थेदार संतोष सिंह ने उन्हें ढांढस बधाया, उठ बीबी कुहरे तें क्यों बैठी हैं. तून पंडित नेहरू दी धी है, ते इक हार नहीं बर्दाश्त नहीं कर हुंदी. इन खिचड़ी सरकार है, ढाई साल च टूट जानी है, चल उठ (उठ बीबी, क्यों उदास बैठी है, तुम तो पंडित नेहरू की बेटी हो, एक हार बर्दाश्त नहीं कर सकती. ये तो खिचड़ी सरकार है, ढाई सरकार में टूट जाएगी)

तब इंदिरा को महसूस हुआ कि उन्हें चिंता नहीं करनी चाहिए
जत्थेदार संतोष सिंह की इन बातों के इंदिरा संयत हुईं. सिखों ने उन्हें भरोसा दिलाया कि वो उनके साथ हैं. उन्हें सुरक्षा की कोई चिंता नहीं करनी चाहिए.

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मंजीत सिंह ने पुरानी बातों को याद करते हुए कहा, इससे पहले पिता के साथ इंदिरा के रिश्ते अच्छे नहीं लेकिन 1974 के बाद ये सुधरने लगे. 1980 में जब फिर से चुनाव हुए और इंदिरा गांधी सत्ता में लौटीं तो उन्होंने दिल्ली और अन्य जगहों के सिखों से जुड़े मसलों को प्राथमिकता से हल किया.

22 मार्च 1977 को इंदिरा ने इस्तीफा सौंपा 
दो दिनों में इंदिरा गांधी ने खुद को फिर मजबूती से खड़ा किया. उन्होंने 22 मार्च 1977 को कार्यवाहक राष्ट्रपति बीडी जत्ती को अपना इस्तीफा सौंप दिया. जत्ती ने उनसे अगली सरकार बनने तक केयरटेकर प्रधानमंत्री के रूप में काम करने को कहा.

फिर सार्वजनिक तौर पर स्वीकार की हार 
इंदिरा गांधी ने उसके बाद सार्वजनिक तौर पर अपना पहला बयान दिया, वो चुनाव में जनता के फैसले का सम्मान करती हैं. संजय गांधी ने भी जनता से अपनी गलतियों के लिए माफी मांगी.
इसके बाद उसी दिन शाम को इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री कार्यालय के अफसरों को चाय पर आमंत्रित किया. फिर आल इंडिया रेडियो को एक रिकार्ड संदेश भेजा, चुनाव हारना या जीतना उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितनी कि देश की मजबूती. मैं और मेरे सहयोगी जनता के फैसले को स्वीकार करते हैं.

...और फिर इंदिरा ने वाकई जबरदस्त वापसी की
असल में इस वाकये ने इंदिरा को ऐसा मल्हम दिया, जिसकी उन्हें जरूरत थी. उन्हें सिखों के इस ग्रुप से मिलने के बाद महसूस हुआ कि जनता अब भी उनके साथ है और उनको पसंद करती है. सियासत में कुछ स्थाई नहीं होता. वो फिर जबरदस्त वापसी कर सकती हैं. फिर इंदिरा गांधी ने 1980 के चुनाव में बहुमत हासिल करके वापसी भी की.
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