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कोरोना से परे ये ट्राइब्स, जो खुद को दुनिया से आइसोलेट करके रखती हैं

News18Hindi
Updated: April 3, 2020, 10:53 AM IST
कोरोना से परे ये ट्राइब्स, जो खुद को दुनिया से आइसोलेट करके रखती हैं
दुनिया में कई जगह ऐसे आइसोलेटेड आदिवासी समूह हैं जो खुद को बिल्कुल अलग रखते हैं.

इन आदिवासी समूहों तक आधुनिक दुनिया का कोई खौफ नहीं पहुंचता. ये बीमारियों का इलाज भी जंगल में ही तलाशते हैं और जिंदगी जीने के लिए भोजन भी.

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  • Last Updated: April 3, 2020, 10:53 AM IST
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बीते कुछ दशकों में ग्लोबलाइजेशन का दौर बहुत तेजी के साथ बढ़ा है. हजारों किलोमीटर की दूरियां घंटों में तय की जा सकती हैं. इंटरनेट के जरिए पलक झपकते कोई ई-मेल धरती के इस कोने से उस कोने तक भेजा जा सकता है. ग्लोबलाइजेशन की काफी आलोचना भी होती रही है. इसमें एक पक्ष महामारियों के वैश्विक होने जाने का भी रहा है. जैसा कि हम आज कोरोना महामारी के रूप में देख रहे हैं.

चीन के वुहान से निकला एक वायरस पूरी दुनिया के अस्तित्व का सवाल बन गया है. लेकिन इन सबके बीच वो आदिम आदिवासी समूह आज भी ऐसी वैश्विक आपदाओं से दूर हैं. यानी कोरोना जैसी वैश्विक महामारी, जिसमें दुनिया के सबसे ताकतवर मुल्क झुलस रहे हैं, इन आदिवासी समूहों का कुछ नहीं बिगाड़ सकती. लेकिन ऐसा क्यों है? इतनी विकसित सभ्यता बनाने के बावजूद हम डरे हुए और वो निर्भय क्यों हैं?

दरअसल हम इस वक्त जिस आइसोलेशन या सोशल डिस्टेंसिंग की माला जप रहे हैं उसे इन आदिवासी समूहों ने सदियों से फॉलो किया है. अमेरिकी महाद्वीप में मौजूद इन आदिवासी समूहों को बड़ी संख्या में लोग आइसोलेटेड ट्राइब्स ही कहते हैं. इन्हें यहां का मूल निवासी भी कहा जाता है जो अपनी स्वेच्छा से आइसोलेशन में ही रहते हैं.



ये जानकर ताज्जुब होगा कि आज भी ये आदिवासी समूह देश, इकोनोमी, ग्लोबल सोसायटी जैसे शब्दों से बिल्कुल नावाकिफ और बेफिक्र हैं. इन पर किसी देश का कोई नियम नहीं चलता. अगर बाहरी दुनिया का कोई व्यक्ति इन तक पहुंचने की कोशिश करता है तो ये या तो लड़ाई करते हैं या फिर जंगलों के भीतर भाग जाते हैं. इन्हें दुनिया का आखिरी स्वतंत्र मूल निवासी माना जाता है.



दुनिया के ज्यादातर स्वतंत्र मूल निवासी आदिवासी समूह अमेजन के जंगलों में रहते हैं. इनकी लिस्टिंग करीब 6 देशों में होती है जिनमें सबसे ज्यादा संख्या ब्राजील और पेरू के हिस्से आती है. अगर इससे इतर बात की जाए तो बोलिविया और पैराग्वे के बीच में चाको के जंगलों में भी कुछ आइसोलेटेड आदिवासी समूह रहते हैं. यूरोपीय लोगों के साथ इन आदिवासियों का साबका 1920 के दशक में पहली बार पड़ा था.



उस समय की बेहद क्रूर यादें इन आदिवासी समूहों के जेहन में रह गई हैं. इनकी तकरीबन पूरी जमीन इनसे छीन ली गई. बताते हैं आखिरी बार ये समूह तब अपनी जमीन छोड़कर भागे थे जब बुल्डोजर लिए व्यावसायिक खेती के लिए इनकी जमीनों का इस्तेमाल किया गया था.

अगर दक्षिणी अमेरिकी महाद्वीप से अलग बात की जाए तो दुनिया में दो जगह ऐसी आइसोलेटेड ट्राइब्स या आदिवासी समूह मिलते हैं. एक तो हिंद महासागर के अंडमान में और दूसरी पापुआ न्यू गिनी के पश्चिमी तरफ जिसे वेस्ट पापुआ भी कहा जाता है. दक्षिण एशियाई देश इंडोनेशिया वेस्ट पापुआ में जबरदस्त नियंत्रण रखता है और इस वजह से यहां पर शोधकर्ताओं और पत्रकारों का जा पाना लगभग नामुमकिन है. इस वजह से यहां कि आइसोलेटेड ट्राइब्स के बारे में बेहद कम या न के बराबर जानकारी मौजूद है. लेकिन एक बात तय है कि अगर इंडोनेशिया इन इलाकों का विकास आधुनिक तर्ज पर करने की कोशिश करेगा तो इन आदिवासी समूहों का बच पाना मुमकिन नहीं है. अगर अंडमान में रहने वाली आइसोलेटेड ट्राइब्स का जिक्र किया जाए तो यहां पर भारत का शासन है लेकिन इसे लेकर देश के कोई बड़े प्लान नहीं हैं. भारत ने अभी इन इलाकों को बिल्कुल वैसे ही छोड़ा है. यहां ये आदिवासी समूह अपनी स्वेच्छा से रहते हैं. यहां पर रहने वाली आदिवासी समूह उन अफ्रीकी लोगों के वंशज माने जाते हैं जिन्होंने करीब 50 से 60 हजार साल पहले अफ्रीका छोड़ा था. तो अगर इस हिसाब से देखें तो इनकी भाषा और कल्चर दुनिया में सबसे पुराना है.



आइसोलेटेड ट्राइब्स के रहन-सहन के बारे में बेहद कम जानकारी मौजूद है क्योंकि ये बाहरी दुनिया के संपर्क तकरीबन नहीं के बराबर आते हैं. जनसंख्या का आंकड़ा लगाना तो पूरी तरह नामुमकिन है. इन ट्राइब्स पर जितनी ज्यादा रिसर्च होगी हमें उतना ही ज्यादा अंदाजा लग पाएगा. मोटे तौर पर ये अपना जीवन शिकार करके बिताते हैं. मछली पालन और छोटे स्तर पर खेती की जानकारी इनके पास है. ज्यादातर ये घुमंतू जिंदगी बिताते हैं और कोई स्थाई ठिकाना नहीं होता है. इनमें कुछ ऐसे भी समूह होते हैं जो अपने लिए स्थाई जगह तलाशते हैं. इन सबके बीच सबसे जरूरी बात ये है कि जंगल के इकोसिस्टम के साथ एकदम घुले-मिले होते हैं.

इन तक आधुनिक दुनिया का कोई खौफ नहीं पहुंचता. ये बीमारियों का इलाज भी जंगल में ही तलाशते हैं और जिंदगी जीने के लिए भोजन भी. हालांकि आज की आधुनिक दुनिया में पूरी तरह आइसोलेट हो पाना प्रैक्टिकली संभव नहीं है लेकिन इन आदिवासियों से आइसोलेशन के मायने सीखे जा सकते हैं. दुनिया में रहने के बावजूद तकरीबन गुमनाम बने ये लोग आज के दौर में आधुनिकता के सबक साबित हो सकते हैं.

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First published: April 3, 2020, 10:53 AM IST
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