देश में हिंसा की स्थिति में कब और कैसे सेना बुलाई जा सकती है? जानिए क्या हैं नियम

देश में हिंसा की स्थिति में कब और कैसे सेना बुलाई जा सकती है? जानिए क्या हैं नियम
दंगाग्रस्त इलाके में सेना का फ्लैगमार्च

दिल्ली में उपद्रव की खबरों के बीच जानें कि सेना या सशस्त्र बलों को तैनात करने के लिए क्या व्यवस्थाएं हैं. किस हालत में सेना को तैनात करने के लिए बुलाया जा सकता है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 26, 2020, 5:53 PM IST
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नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के समर्थक और विरोधियों के उग्र हो जाने के कारण उत्तर पूर्वी दिल्ली के इलाकों में भड़की हिंसा के बाद यह सवाल खड़ा हो रहा है कि क्या राष्ट्रीय राजधानी में सेना की तैनाती हो सकती है? इस हफ्ते इन इलाकों में खासा उपद्रव होने के बाद कुछ नेताओं ने सेना तैनात किए जाने की मांग भी की है. ऐसे में आपको जानना चाहिए कि सेना तैनाती कैसे और किन हालात में होती है.
वास्तव में, सेना की तैनाती केंद्र सरकार के गृह और रक्षा मंत्रालय के फैसले के अधीन होती है. अगर आर्मी तैनात की जानी है तो रक्षा मंत्रालय के ज़रिये करवाई जाती है और अगर केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल की तैनाती होती है तो इसका फैसला गृह मंत्रालय के अधिकार में ही होता है.

कब और क्यों बुलाया जाता है बल?
सुप्रीम कोर्ट के सीनियर एडवोकेट डॉ. ब्रह्मदत्त (पद्मश्री से सम्मानित) ने न्यूज़18 के साथ बातचीत में बताया ''अगर सवाल राष्ट्रीय सुरक्षा या हित का हो तो गृह मंत्रालय अपने अधिकार का उपयोग करते हुए सेना या बलों की तैनाती कर सकता है. राष्ट्रीय सुरक्षा एक्ट के तहत उसे ये अधिकार है. इसके अलावा सीआरपीसी की धारा 130 के तहत भी ऐसे प्रावधान हैं. लेकिन गौरतलब है कि आदर्श रूप में न्यूनतम बल इस्तेमाल करने के प्रावधान हैं.''



क्या है सीआरपीसी की धारा 130?
दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 130 के तहत सशस्त्र बलों की तैनाती के संबंध में तीन बिंदुओं में प्रक्रिया समझाई गई है. इंडियन लॉज़ पोर्टल पर दिए गए विवरण के अनुसार :


किसी जमाव को जब तितर बितर करना मुमकिन अन्य तरह से न हो, तब उच्चतम पंक्ति का कार्यपालक मजिस्ट्रेट सशस्त्र बल द्वारा उसे तितर बितर करवा सकता है.

सेना की तैनाती केंद्र सरकार के गृह और रक्षा मंत्रालय के फैसले के अधीन होती है. अगर आर्मी तैनात की जानी है तो रक्षा मंत्रालय के ज़रिये करवाई जाती है और अगर केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल की तैनाती होती है तो इसका फैसला गृह मंत्रालय के अधिकार में ही होता है.


  1. सशस्त्र बल की किसी टुकड़ी का समादेशन कर रहे किसी अधिकारी के सहयोग से भी कार्यपालक मजिस्ट्रेट यह कार्रवाई कर सकता है.

  2. जमाव को तितर बितर करने के लिए केवल इतने ही बल का प्रयोग किया जाना चाहिए, जितना जमाव को तितर बितर करने के लिए ज़रूरी हो. यानी शरीर और संपत्ति को उतनी ही हानि पहुंचाई जाए जितनी जमाव भंग करने के लिए ज़रूरी है.


कब ज़रूरी होती है बल की तैनाती?
देश के किसी हिस्से में अगर उपद्रव के दौरान ऐसी स्थिति बन जाए जो राष्ट्रीय सुरक्षा या हित के लिए खतरा हो और उसे स्थानीय या राज्य प्रशासन के स्तर पर नियंत्रित किया जाना मुमकिन न हो पा रहा हो, तब गृह मंत्रालय आवेदन पर या दखल देकर सशस्त्र बलों की तैनाती कर सकता है. और स्थिति की गंभीरता को देखते हुए रक्षा मंत्रालय के ज़रिये सेना की तैनाती तक का फैसला किया जा सकता है.

सेना तैनाती के हालिया मामले
नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में दिसंबर में जब असम में प्रदर्शन हुए तो वहां सेना तैनात करने की नौबत आई. इससे पहले जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 खत्म किए जाने के बाद बने हालात को काबू करने के लिए भारी संख्या में सशस्त्र बल तैनात किए गए थे. हिंसा या उपद्रव के अलावा कुछ और मामलों में भी सेना तैनात कर दिए जाने के उदाहरण देखे गए हैं.

अगर सवाल राष्ट्रीय सुरक्षा या हित का हो जाए तो गृह मंत्रालय अपने अधिकार का उपयोग करते हुए सेना या बलों की तैनाती कर सकता है. राष्ट्रीय सुरक्षा एक्ट के तहत उसे ये अधिकार है


क्या यह सेना का दुरुपयोग है?
कानून व्यवस्था बहाली के अलावा बोरवेल से बच्चे को निकालने या श्री श्री रविशंकर जैसी हस्तियों के निजी कार्यक्रमों तक के लिए सेना तैनात किए जाने के मामले सामने आ चुके हैं. द प्रिंट की ​एक रिपोर्ट सही सवाल खड़े करती है कि कहीं सेना तैनाती के अधिकार का दुरुपयोग तो नहीं किया जाता. यह सवाल क्यों जायज़ है, यह समझना भी ज़रूरी है.

पिछले कई सालों में भारत ने केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों का खासा विकास किया है और रिपोर्ट की मानें तो इन बलों की कुल स्ट्रेंथ भारतीय सेना की स्ट्रेंथ से ज़्यादा है. ऐसे में आंतरिक मामलों में जल्दबाज़ी में सेना की तैनाती के औचित्य पर विचार करना ज़रूरी हो जाता है.

SOP भी रहा है एक रोड़ा
असम में 2012 में हुई हिंसा के दौरान सेना की तैनाती में देर होने के कारण कई लोगों की जान चली गई थी. तब केंद्रीय गृह मंत्रालय ने रक्षा मंत्रालय से इस तरह की स्थिति में निर्दोषों को बचाने के लिए मानक संचालनात्मक प्रक्रिया (एसओपी) में बदलाव लाने को कहा था. यह असल में हिंसाग्रस्त इलाके के सर्वोच्च अधिकारी और बल तैनात करने के ज़िम्मेदार अधिकारी के बीच वार्ता की एक मानक प्रक्रिया है, जिसके चलते उस वक्त देर हुई थी, तब जानकारों के हवाले से खबरें थीं कि दंगों की गंभीर स्थिति में एसओपी को ज़्यादा वरीयता देना उचित नहीं है.

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