जानिए भगवान कृष्ण के मोरपंख को क्यों पूजते हैं अरब देशों के 'यज़ीदी'

Aditya Prakash | News18Hindi
Updated: August 23, 2019, 10:40 AM IST
जानिए भगवान कृष्ण के मोरपंख को क्यों पूजते हैं अरब देशों के 'यज़ीदी'
यज़ीदी धर्म अपने आप में बेहद खास और रहस्यमय हैं. इस धर्म के रीति-रिवाज और पारंपरा हिंदू धर्म से काफी मिलते-जुलते हैं. कहा जाता है कि इस धर्म का निर्माण सनातन धर्म से प्राभवित होकर ही किया गया था.

दावा किया जाता रहा है कि 'यज़ीदी' (Yazidi) हिंदू धर्म (Hinduism) की ही एक शाखा है, यज़ीदियों के मंदिरों (Temple) में दीपक जलाने और हवनकुण्ड के रूप में अग्नि पूजा करने का रिवाज भी हिंदु धर्म के जैसा ही है.

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आज जन्माष्टमी (Janmashtami) का दिन है. आज ही के दिन भगवान कृष्ण पृथ्वी पर अवतरित हुए थे. पूरे भारत में ये पर्व बड़े ही धूम-धाम से मनाया जाता है. भगवान कृष्ण का सबसे पसंदीदा पक्षी मोर है, जिसके पंख को वो अपने पास अपनी बांसुरी में रखते हैं और दूसरा अपने मुकुट में. आपने भी कई बार इन मोर पंखों को भगवान के मुकुट में देखा होगा. लेकिन क्या आपको पता है कि भारत से हज़ारों कोस दूर अरब (Arab) देशों में मोर को पूजा जाता है.


कितनी दिलचस्प बात है कि हम कृष्ण भगवान की पूजा करते हैं और वहां के लोग उनके मुकुट पर लगने वाले मोर पंख की पूजा करते हैं. वो भी उस धरती पर जो इस्लाम (Islam) का गढ़ है. जहां इस्लाम की शुरुआत हुई. वो इलाक़ा जो हमेशा जेहाद और जंग का मैदान बना रहा. अरब के देशों में मोरपंख की पूजा करने वाले उस समुदाय का नाम है 'यज़ीदी'(Yazidi).



आख़िर वो हिंदू धर्म से संबंधित मोर पंख की पूजा क्यों करते हैं? इस सवाल का जवाब ढूंढने से पहले हम चलते हैं उस वाक़ये पर जिससे पूरी दुनिया में खलबली मच गई और अरब में सनातन संस्कृति की छाप दिखाई देने लगी.



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यज़ीदियों के सबसे बड़े मंदिर में भारतीय महिला की तस्वीर


आज से तकरीबन एक दशक पहले एक महिला की तस्वीर लोगों के बीच कौतूहल का सबब बना हुआ था. इस चौंकानेवाली तस्वीर में यज़ीदियों के सबसे पवित्र स्थल लालिश की भीतरी दीवार पर एक महिला दीपक जला रही है.  दरअसल ये एक पेन्टिंग है, जो यज़ीदियों के सबसे पवित्र मंदिर के दीवार पर बनाई गई है. इस पेन्टिंग में दीपक से ज्यादा खास है उस महिला का भारतीय भेषभूषा. महिला की शक्ल किसी दक्षिण भारतीय महिला से मेल खाती है. उस पेन्टिंग में एक महिला मौजूद है, उसकी साड़ी हरी है और उसका ब्लाउज़ नारंजी है. इस तस्वीर के सामने आने के बाद ये दावा किया जाने लगा कि यज़ीदी हिंदू धर्म की ही एक शाखा है. हालांकि ये एक विवादित विषय है. इसके बाद यज़ीदी महिलाओं की दूसरी तस्वीर भी चार साल पहले ख़ूब वायरल हुई थी, जिसमें उन्हें दिवाली मनाते हुए देखा गया था. दूसरी तस्वीर के आने से उन लोगों के दावे को बल मिलने लगा जो यजीदियों का देवदूत 'मलक ताउस' को मुरुगन (भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय) मानते हैं और जिनकी सवारी मोर है.​


कौन हैं यज़ीदी और वो मोरपंख को क्यों पूजते हैं?

 दुनिया में कई तरह के धर्म हैं. पर जो प्रमुख धर्म हैं वो दो तरह के हैं, एक 'अब्राहमिक' और दूसरा 'धार्मिक'. इसाई, यहूदी और मुसलमान 'अब्राहमिक' धर्म में अंदर आते हैं और हिंदू, सिख, बौध और जैन 'धार्मिक' हैं. इन सबके अलावा इस दुनिया में कई ऐसे धर्म और समुदाय भी मौजूद हैं, जिनके बारे में बहुत ही कम लोग जानते हैं. इसलिए इन समुदायों ताल्लुक न तो किसी खास वर्ग से है और न ही खास मुल्क से. इन धर्मों पर बहुत कम ही बात की जाती है. वजह है उनकी कम आबादी और उनके कम प्रभाव का होना. इन्हीं अनसुने समुदायों में से एक है यज़ीदी समुदाय. यज़ीदी समुदाय के लोगों का अपना एक अलग धर्म है, उनकी अपनी मान्यताएं हैं और अपने रीति-रिवाज हैं.



श्रीकृष्ण




 यजीदी उत्तर-पश्चिमी इराक, उत्तर-पश्चिमी सीरिया और दक्षिण-पूर्वी तुर्की में रहते हैं

 यज़ीदी धर्म अपने आप में बेहद खास और रहस्यमय हैं. इस धर्म के रीति-रिवाज और परंपरा हिंदू धर्म से काफी मिलते-जुलते हैं. कहा जाता है कि इस धर्म का निर्माण सनातन धर्म से प्राभवित होकर ही किया गया था. मुख्य रूप से यजीदी उत्तर-पश्चिमी इराक, उत्तर-पश्चिमी सीरिया और दक्षिण-पूर्वी तुर्की में अल्पसंख्यक समुदाय के रूप में रहते हैं. यजीदी धर्म विश्व की सबसे पुरानी धार्मिक परंपराओं में से एक है. यजीदियों की धार्मिक किताबों की माने तो ये परंपरा छह हज़ार साल पुरानी है. 'यजीदी' का शाब्दिक अर्थ 'ईश्वर को पूजने वाला' होता है. ये शब्द मूल रूप से पर्शियन भाषा से है. यजीदी अपने ईश्वर को 'यजदान' कहते हैं.


 क्या 'यज़ीदी' हिंदू धर्म का ही एक शाखा है?

 यजीदियों की कई मान्यताएं हिन्दूओं से मिलती-जुलती हैं. उनकी धार्मिक किताबों के मुताबिक यजदान के सात अवतार हैं. जिनमें मयूर देवता हैं जिन्हें 'मलक ताउस' कहा जाता है. मयूर देवता को बाक़ी सभी अवतारों से की तुलना में ज्यादा शक्तिशाली माना जाता है. यजीदी ईश्‍वर को इतना पवित्र मानते हैं कि उनकी सीधे तौर पर उनकी पूजा तक नहीं करता हैं. उनके मुताबिक यजदान पूरे मानव सृष्टि का रचयिता हैं, लेकिन सृष्टि की रखवाली वो नहीं करते बल्कि ये काम उनके अवतार के द्वारा की जाती है. जिनमें मोर देवता प्रमुख हैं. यज़ीदी मोर देवता के साथ-साथ उनके मोरपंख को भी पूजते हैं. इस देवता वो भारत में दो भगवानों से जोड़कर देखा जाता है. भगवान श्री कृष्ण और दक्षिण भारत के प्रसिद्ध देवता मुरुगन.




यज़ीदियों के देवता 'मलक ताउस'



यजीदियों में जल का महत्व है. धार्मिक परंपराओं में जल से अभिषेक किए जाने की परंपरा है. यजीदी भी हिंदुओं की तरह ही पुनर्जन्म में विश्वास करते हैं. यजीदी दिन में पांच बार ईश्‍वर की प्रार्थना करते हैं. सूर्योदय और सूर्यास्त में सूर्य की ओर मुंह करके प्रार्थना करते हैं. प्राथना के तुरंत बाद वो दीप जला कर आरती करते हैं.


हिंदु धर्म की तरह ही वो कर्मों के हिसाब से स्वर्ग और नरक में जाने की पद्धति को मानते हैं. हिंदुओं की तरह ही धार्मिक संस्कार जैसे मुंडन, निराहार व्रत, मंदिर में विवाह जैसी परंपरा है. यजीदियों में धार्मिक मेलों और उत्सव मनाने की परंपरा भी है. यजीदी मंदिर में इश्वर के अवतारों की तस्वीर के सामने उनकी पूजा करते हैं. मृत्यु के बाद यजीदियों में मृतक की समाधि बनाने की परंपरा है. यजीदियों की धार्मिक भाषा कुरमांजी है. जो प्राचीन इरानी भाषा की एक शाखा है. पृथ्वी, जल व अग्नि में थूकने को पाप समझते हैं. यजीदी धर्म परिवर्तन नहीं करते. यजीदी के लिए धर्म निकाला सबसे दुर्भाग्यपूर्ण माना जाता है, क्योंकि ऐसा होने पर उसकी आत्मा को मोक्ष नहीं मिलता.


ISIS के आतंक का शिकार हो रहे यजीदी


 इनकी मौजूदा आबादी लगभग पांच लाख है. ISIS के आतंक का शिकार हो रहे यजीदी समुदाय के लोग लगातार सीरिया और इराक़ से पलायन कर रहे हैं. इस्लामिक स्टेट के द्वारा पिछले दशक में हुए नरसंहार की वजह से यजीदियों की आबादी में भारी गिरावट दर्ज़ की गई है.


यजीदी एक ऐसा धर्म हैं जिनमें धर्मांतरण की सुविधा उपलब्ध नहीं है. इस समुदाय का कोई इंसान धर्मांतरण के जरिए ना तो ये धर्म छोड़ सकता है और न ही यजीदी धर्म का हिस्सा बन सकता है. जिसने इस धर्म में जन्म लिया है वो आजीवन इस धर्म का हिस्सा रहेगा और जिसने इस धर्म में जन्म नहीं लिया वह किसी भी रूप में यजीदी नहीं बन सकता.


यजीदी पुनर्जन्म की अवधारणा पर यकीन रखते हैं


हिंदुओं की तरह ही यजीदियों की मान्यता है कि आत्मा कभी मरती नहीं. वो सिर्फ़ एक शरीर से दूसरे शरीर में दाखिल होती है. इसलिए यजीदी पुनर्जन्म की अवधारणा पर यकीन रखते हैं. यजीदी धर्म को मुख्य रूप से 12वीं सदी में स्थापित किया गया. अदी इब्न मुसाफिरने इसे स्थापित किया. नए धार्मिक नियम कायदे बनाए गए. वो एक धार्मिक गुरू थे.


हिंदुओं की तरह ही पुजारी के हाथों जल छिड़क कर बच्चों का धर्मिक संस्कार 'बप्तिस्मा' करते हैं. ये संस्कार बिल्कुल मंडन की तरह की होती है. विवाह के दौरान यजीदी धर्म में रोटी को दो टुकड़ों में बांटकर पति-पत्नी को खिलाया जाता है. हिन्दू धर्म की तरह विवाह के समय स्त्रियां लाल जोड़ा पहनती हैं और मंदिर में जाती हैं. दिसंबर माह में यजीदियों का दीपक त्योहार मनाया जाता है जिसमें लोग तीन दिन का उपवास रखते हैं.


हिंदुओं की तरह ही वे भी प्रकृति के उपासक हैं


यजीदी भी किसी पैगम्बर में यकीन नहीं करते बिल्कुल हिंदुओं की तरह. हिंदुओं की तरह ही वे भी प्रकृति के उपासक हैं. बहुत सारे कर्मकाण्ड बिल्कुल आदिम काल के पुरातन धर्मों की तरह ही उनमें भी पूरे किए जाते हैं जो आज तक सनातन हैं. यज़ीदियों के मंदिरों में दीपक जलाने और हवनकुण्ड के रूप में अग्नि पूजा करने का रिवाज भी हिंदु धर्म के जैसा ही है.


मोसुल के उत्तर में बसे शहर लालेश में यजीदियों का सबसे बड़ा धार्मिकस्थल मौजूद है. जहां उनके सबसे बड़े धार्मिक गूरू आदी की समाधि है. उसी समाधि पर एक बड़ा सा मंदिर बना हुआ है. ये मंदिर नदी के ठीक बगल में स्थित है. हर साल 15-20 सितंबर के बीच यहां यजीदियों का सबसे बड़ा धार्मिक उत्सव मनाया जाता है. इस त्योहार में यजीदी एकठ्ठे होकर नदी में पहले नहाते हैं फिर मंदिर जाकर पूजा करते हैं.


यजीदियों के लिए 'मलक ताउस' भगवान का ही स्वरूप हैं इसलिए वे मोर की शक्ल में उनकी पूजा करते हैं. यजीदियों की धार्मिक ग्रंथों के मुताबिक वो एक ही देवता को मानते हैं, चाहे वो यजदान हों या उनके अवतार. जैसे हिंदु धर्म में भगवान विष्णु के दस अवतार हैं, ठीक उसी तरह यजीदियों के भगवान यजदान के सात अवतार हैं. यजीदी उन सातों अवतारों वाले देवताओं को भगवान यजदान का ही रूप मानते हैं. उनके मुताबिक ईश्वर एक हैं, और ईश्वर के रूप अनेक हैं.


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First published: August 23, 2019, 10:36 AM IST
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