भारत और एशिया के जंगलों में क्यों छोटे-छोटे गैंग बना रहे हैं हाथी?

एडवांस स्टडी के राष्ट्रीय संस्थान ने एक शोध किया, जिसकी रिपोर्ट के मुताबिक़ कम उम्र के नर हाथी खुद को बचाने के लिए छोटे छोटे गैंग बना रहे हैं. जानें हाथियों के लिए क्या है खतरा और क्यों हाथी हो रहे हैं मजबूर.

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Updated: July 6, 2019, 5:20 PM IST
भारत और एशिया के जंगलों में क्यों छोटे-छोटे गैंग बना रहे हैं हाथी?
भारत में हाथियों पर संकट. फ़ाइल फोटो.
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Updated: July 6, 2019, 5:20 PM IST
हाथी सामान्य तौर से जिस तरह से जीते रहे हैं, अब उनकी जीवन शैली वैसी नहीं रह गयी. दक्षिण एशिया में हाथियों का बर्ताव और रहन सहन बदल गया है. बढ़ती उम्र में, सामान्य तौर से हाथी एक साथ एक समूह में रहा करते थे और इसी तरह वो स्वस्थ भी रहते थे, एक शोध की मानें तो अब हाथी अलग अलग होकर अपने छोटे छोटे 'गैंग' बना रहे हैं. इस बदलाव की वजह है मनुष्य! जी हाँ, मनुष्यों से खतरा भांपकर अपनी जीवन शैली छोड़ने पर मजबूर हाथी खुद को संकट में पा रहे हैं.

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एशियाई हाथी, सामान्य तौर पर, प्रजनन की उम्र तक पहुँचने तक मिक्स समूहों में रहा करते हैं. इसके बाद धीरे धीरे वो ये बड़ा समूह छोड़ते हैं और जंगल में पानी व भोजन से भरपूर एक एकांत वाला इलाका ढूँढ़ते हैं. इसकी वजह यही होती है कि वो अपने नर या मादा साथी के साथ प्रजनन करने की स्टेज में होते हैं और कहा जा सकता है कि यह उनका गृहस्थी शुरू करने का तरीका होता है. लेकिन, अब हाथियों के जीने की यह शैली खतरे में है. अपने अस्तित्व को संकट में पाकर हाथी अब बदलाव करने पर मजबूर हो गए हैं.

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एडवांस स्टडी के राष्ट्रीय संस्थान ने एक शोध किया जिसकी रिपोर्ट साइंटिफिक रिपोर्ट्स पत्र में छपी है. इस रिपोर्ट के मुताबिक़ कम उम्र के नर हाथी खुद को बचाने के लिए छोटे छोटे गैंग बना रहे हैं. इन गैंगों में सिर्फ तीन से छह हाथी तक रहते हैं. और ये सभी साथ घूमते हैं. पहले ऐसा नहीं था, क्योंकि जंगल इन हाथियों का सुरक्षित घर था और ये हाथी इस तरह नहीं बल्कि बड़े समूह में साथ रहा करते थे.

क्या है खतरा?
शोधकर्ताओं का कहना है कि उन्होंने 23 महीनों के अध्ययन के दौरान दक्षिण भारत के 248 विशिष्ट हाथियों की करीब डेढ़ हज़ार तस्वीरें लीं. जिन इलाकों में मनुष्यों का दखल ज़्यादा है, वहाँ हाथियों का बर्ताव बेहद बदला हुआ देखा गया. जंगलों में मनुष्यों ने खेत, आवास और उद्योग बना लिए हैं. इससे जंगलों का आकार घटा है और जानवरों के लिए खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है.
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काज़ीरंगा में जल स्रोत के पास हाथियों का झुण्ड. फ़ाइल फोटो.


मनुष्यों ने जिस तरह जंगलों पर कब्ज़ा किया है, उससे हाथियों को जगह का संकट तो है ही, साथ ही मनुष्यों और जानवरों के बीच संघर्ष होने से भी ये जानवर अपने अस्तित्व को संकट में पा रहे हैं. शोध में कहा गया है कि भारत में ये स्थिति ज़्यादा मुश्किल हो रही है. हर साल मनुष्यों और जानवरों के बीच होने वाले संघर्ष में औसतन 150 हाथी मारे जा रहे हैं. शोध के लेखकों ने ये भी लिखा है कि करीब दो साल के उनके शोध के दौरान ही 248 में से 10 हाथी मारे गए.

हाथियों का बदलता पैटर्न
हाथी अपने भोजन के लिए अक्सर 'हाई रिस्क' और 'हाई गेन' का फार्मूला अपनाते हैं. भोजन के लिए हाथी बड़े झुण्ड में जाते हैं, जहां उन्हें अच्छा भोजन और भरपूर पानी मिले. झुण्ड एक सामूहिक सुरक्षा की भावना की पहचान होता है. लेकिन अब ये पैटर्न बदल रहा है और हाथी अलग अलग गैंगों में इधर उधर भटक रहे हैं. इसकी एक वजह एक इलाके में ज़्यादा हाथियों के लिए पर्याप्त भोजन न मिल पाना भी हो सकता है.

शोध के प्रमुख लेखक और हाथियों के विशेषज्ञ डॉक्टर निशांत ने कहा है कि बड़े झुंडों में रहकर जीवन जीने वाले हाथियों की सेहत अकेले रहने वाले हाथियों की तुलना में अच्छी देखी गयी है. कुल मिलाकर ये हाथियों के जीवन के साथ बड़े खिलवाड़ का संकेत है.

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First published: July 6, 2019, 5:20 PM IST
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