भारत में पहली बार आज ही के दिन भारतीय वायुसेना के एयरक्राफ्ट ने भरी थी उड़ान

भारतीय वायुसेना (Indian Air Force) के द्वितीय विश्व युद्ध में प्रभावी उपस्थिति दर्ज की गई थी. (तस्वीर: Wikimedia Commons)

भारतीय वायुसेना (Indian Air Force) के द्वितीय विश्व युद्ध में प्रभावी उपस्थिति दर्ज की गई थी. (तस्वीर: Wikimedia Commons)

1 अप्रैल 1933 को ही भारतीय वायुसेना (Indian Air Force) के पहले एयरक्राफ्ट (First Aircraft) ने उड़ान भरी थी. इसी दिन वायुसेना के पहले दस्ते का गठन भी हुआ था.

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भारतीय वायुसेना (Indian Airforce) का इतिहास की जड़ें ब्रिटिशकाल से जुड़ी हुई हैं. भारतीय वायुसेना का गठन 8 अक्टूबर 1932 को हुआ था, लेकिन उसके पहले एयरक्राफ्ट की उड़ान एक अप्रैल 1933 को हुई थी. इसी दिया पहले भारतीय वायुसेना के दस्ते का गठन हुआ था. आजादी के बाद भारतीय वायुसेना ने हर मौके पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई और 1965 के युद्ध में सक्रिय होने के  बाद कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा.

1 अप्रैल 1933 में पहला दस्ता

आजादी से पहले वायुसेना को रॉयल इंडियन एयरफोर्स कहा जाता था. उस समय इसमें 6 आरएएफ ट्रेंड ऑफिसर और 19 हवाई सिपाही के अलावा चार वेस्टलैंड वापति आईआईए सैन्य सहयोग विमान थे. उस समय सेना में पांच पायलट थे. भारतीय वायुसेना के स्थापना के समय इसे ब्रिटिश राज की सहायक वायु सेना के तौर पर बनाया था. आजादी के बाद इसमें से 'रॉयल' शब्द हटा लिया गया.

पहले पांच पायटल
पहले पांच पायलट हरीश चंद्र सरकार, सुब्रोतो मुखर्जी, भूपेंद्र सिंह, आजाद बक्श अवान और अमरजीतसिंह थे. छठे अफसर के तौर पर जेएन टंडन को शामिल किया गया था, लेकिन उनकी ऊंचाई कम होने के कारण उन्हें केवल लॉजिस्टिक ड्यूटी सौंपी गई थी. सभी पांच पायलटों को 1932 से आरएएफ कार्नवेल के लिए पायलयट ऑफिसर के तौर पर कमिशन्ड किया गया है.

द्वितीय विश्व युद्ध में भूमिका

सुब्रतो मुखर्जी बाद में भारत के पहले चीफ ऑफ एयर स्टाफ बने थे. वही द्वितीय विश्व युद्ध से पहले एस्पे इंजिनियर, केके मजूमदार, नरेंद्र, दिलजीत सिंह, हेनरी रघुनंदन, आरएचडी सिंह, बाबा मेहर सिंह, एनगोयल, पृथपाल सिंह और अर्जन सिंह को भारतीय वायुसेना में शामिल किया गया. भारतीय वायुसेना ने द्वितीय विश्व युद्ध में अहम भूमिका निभाई थी. द्वितीयविश्व युद्ध में बर्मा और थाइलैंड में स्थित जापान के एयरबेस ठिकानों पर हमलों में अहम भूमिका निभाई.



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वायु सेना ने शुरूआती युद्धों में सीमित संसाधनों के बीच पराक्रम का प्रदर्शन किया था.


रॉयल शब्द और उससे छुटकारा

1945 को भारतीय वायुसेना के द्वितीय विश्व युद्ध में योगदान को देखते  हुए किंग जॉर्ज –छह ने भारतीय वायुसेना के आगे रॉयल शब्द लगा दिया. इसके बाद से ही 1950 तक ही भारतीय वायुसेना को रॉयल इंडियन एयर फोर्स के नाम से ही जाना गया. 1950 भारत के गणतंत्र बनते ही रॉयल शब्द हटा और वायुसेना को भारतीय वायुसेना नाम मिल गया.

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कश्मीर में पहली बार जरूरत

भारतीय वायुसेना की आजादी के फौरन बाद ही उसकी बहुत ज्यादा जरूरत हुई जब पाकिस्तान के कबाइलियों ने जम्मू कश्मीर पर हमला बोल दिया. जैसे ही कश्मीर के राजा हरिसिंह ने भारत के साथ विलय पर हस्ताक्षर किए. भारतीय वायुसेना से फौरन श्रीनगर में भारतीय सैनिकों को पहुंचाने का काम किया जो इस युद्ध में एक निर्णायक कदम साबित हुआ.

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1965 के युद्ध के बाद से भारतीय वायुसेना ने पीछे मुड़कर नहीं देखा. (Pic- ani)


1965 के युद्ध में पहली सक्रिय भूमिका

गणतंत्र के बाद से भारतीय वायुसेना ने कई मौकों पर देश के लिए अपने उपयोगिता सिद्ध की. 1962 के भारत-चीन युद्ध में भारतीय वायुसेना का व्यापक उपयोग नहीं हो सका. 1965 के भारत-पाक युद्ध में पहली बार भारतीय वायुसेना सक्रिय रूप से युद्ध में शामिल हुई. इसके बाद भारतीय वायुसेना ने पीछे मुड़कर नहीं देखा.

पहली बार- जब पूर्वोत्तर में घुसकर आजाद हिंद फौज ने फहराया तिरंगा

1965 के युद्ध के बाद 1971 में बांग्लादेश की आजादी, 1984 में ऑपरेशन मेघदूत के जरिए सियाचिन ग्लेशियर पर कब्जा, 1999 में कारगिल युद्ध में भारतीय वायुसेना ने हर मौके पर देश के सेना के साथ देते  हुए अपनी शानदार उपस्थिति दर्ज कराई. इसके अलावा देश में बाढ़ भूकंप जैसी आपदाओं में भी भारतीय वायुसेना ने उम्मीद से बढ़कर देशवासियों की सेवा की है.
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