जानिए भारत के सबसे बड़े और सबसे पुराने ग्लेशियर के बारे में

सियाचिन ग्लेशियर को दुनियाभर में सबसे ज्यादा ऊंचाई पर बने युद्ध स्थल के तौर पर जाना जाता है

सियाचिन (Siachen Glacier) का अर्थ वैसे तो बिखरे हुए गुलाबों की घाटी है लेकिन इस बर्फीला ग्लेशियर में कदम-कदम पर मौत दिखती है. ध्रुवीय इलाके से बाहर ये दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा ग्लेशियर है.

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    सियाचिन ग्लेशियर को दुनियाभर में सबसे ज्यादा ऊंचाई पर बने युद्ध स्थल के तौर पर जाना जाता है. भारत-पाक नियंत्रण रेखा के पास स्थित इस ग्लेशियर का प्राकृतिक इतिहास भी है. ये भारत का सबसे बड़ा और दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा ग्लेशियर है, जो ध्रुवीय इलाके से बाहर बना है. इससे बड़ा ग्लेशियर ताजिकिस्तान का फेदचेन्को ग्लेशियर है. लगभग 78 किलोमीटर में फैला सियाचिन ग्लेशियर कई वजहों से बहुत खास है.

    हिमालय की पूर्वी काराकोरम पर्वतमाला में बने सियाचिन ग्लेशियर का नाम हमने अक्सर भारत-पाक विवाद के बीच ही सुना होगा लेकिन इससे अलग भी यहां कई बातें जानने लायक हैं. सियाचिन नाम तिब्बती भाषा बाल्टी से निकला. इसमें सिया का मतलब है गुलाब और चिन का अर्थ है बिखरा हुआ. तो इस तरह से सियाचिन का अर्थ हुआ वो जगह, जहां गुलाब बिखरे हुए होते हैं. हालांकि ये नाम इस बर्फीले रेगिस्तान की तासीर से एकदम अलग है.

    siachen glacier indian army
    थोड़ा नीचे आने पर सियाचिन मे कुछ खास बर्फीले जानवर जरूर होते हैं


    यहां चारों ओर बर्फ ही बर्फ है और लगातार अंधड़ चलता रहता है. यही वजह है कि देश के लिए सामरिक दृष्टिकोण से बेहद अहम इस ग्लेशियर को मौत की घाटी भी कहते हैं. समुद्र तल से औसतन 18000 फीट की ऊंचाई पर स्थित सियाचिन ग्लेशियर के एक तरफ पाकिस्तान की सीमा है तो दूसरी तरफ चीन की सीमा अक्साई चीन इस इलाके में है. भारत को इन दोनों देशों पर नजर रखने के लिए इस क्षेत्र में अपनी सेना तैनात करना बहुत जरूरी है.

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    साल 1984 से पहले इस जगह पर न तो भारत और न ही पाकिस्तान की सेना की उपस्थिति थी. बर्फीला रेगिस्तान मानते हुए इस ग्लेशियर को छोड़ दिया गया था. यहां तक कि सत्तर के दशक में शिमला समझौते के दौरान भी इस जगह के लिए सीमा निर्धारण नहीं हुआ था लेकिन पाकिस्तान के साथ विवाद के बीच भारत ने साल 1984 के अप्रैल में पहली बार इस ग्लेशियर में अपने सैनिक भेजे. तब से साल के 365 दिन यहां भारतीय सैनिक देश की सबसे खतरनाक सरहद की रक्षा करते रहते हैं.

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    सियाचिन की ठंड का अनुमान आप इससे लगा सकते हैं कि यहां रात के समय तापमान -70 डिग्री सेल्सियस तक चला जाता है. ये इतना कम है कि जिंदा रहने के लिए सैनिकों को दुनियाभर के कपड़े पहनने होते हैं जो खास इस सर्दी के लिए बने होते हैं. इसके बाद भी उन्हें जीने के लिए अलग मशक्कत करनी पड़ती है.

    siachen glacier indian army
    सियाचिन ग्लेशियर में तैनात भारतीय सैनिकों को जिंदा रहने के लिए खास कपड़े पहनने होते हैं (Photo- news18 English via Facebook)


    रात में अगर सैनिक लंबी नींद सोए तो उसे जान का खतरा होता है, यहां कारण है कि थोड़ी-थोड़ी देर में उन्हें जानना और हाथ-पैर हिलाने होते हैं ताकि शरीर सुचारू तरीके से काम करता रहे और फेफड़े अपना काम कर सकें. ता दें कि शरीर को जितनी जरूरी है, उसकी केवल 30 प्रतिशत ऑक्सीजन ही यहां फेफड़ों तक पहुंच पाती है. ऐसे में सैनिकों को जीवित रहने के लिए अलग ट्रेनिंग से गुजरना होता है.

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    वहीं दिन के समय सियाचिन मे जमी बर्फ सूरज की हल्की किरणों से भी इतनी तेजी से चमकती है कि अगर नंगी आंखों से बर्फ देखी जाए तो आंखों की रोशनी जा सकती है. इससे बचाव के लिए भी सैनिकों को हर समय अलग तरह के चश्मे पहनने होते हैं. वहीं रात में 100 से 200 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से बर्फीली आंधी चलती रहती है. ऐसे में सीधी हवा के संपर्क में शरीर का कोई भी हिस्सा आने पर तुरंत हाइपोथर्मिया का खतरा रहता है.

    सियाचिन ग्लेशियर में चारों और बर्फ और ऊंची-नीची जानलेवा खाइयां हैं. ऐसे में वनस्पति की तो बात की क्या की जाए लेकिन थोड़ा नीचे आने पर यहां कुछ खास बर्फीले जानवर जरूर होते हैं, जैसे बर्फीला चीता, सफेद भालू और पहाड़ी बकरी की प्रजाति का एक पशु.

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