क्या है भारत और जापान के बीच वो समझौता, जो China पर ढाएगा कहर

क्या है भारत और जापान के बीच वो समझौता, जो China पर ढाएगा कहर
भारत के साथ सीमा विवाद में जबरन उलझता चीन गुंडागर्दी के नई नमूने पेश कर रहा है- सांकेतिक फोटो (Photo-pixabay)

कई विकसित देश भारत के साथ मिलकर ‘Anti-China’ समझौता कर रहे हैं. जापान के साथ ऐसा एक सैन्य करार (military pact with Japan) हो भी चुका है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 15, 2020, 2:24 PM IST
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भारत के साथ सीमा विवाद में जबरन उलझता चीन (India-China border dispute) गुंडागर्दी के नई नमूने पेश कर रहा है. एक ओर वो साउथ चाइना सी के 80 प्रतिशत से ज्यादा हिस्से पर दावा कर रहा है, तो दूसरी तरफ गरीब देशों को कर्ज देकर उनके यहां की राजनीति तक में घुसपैठ कर रहा है. इसी चीन को घेरने के लिए अब भारत समेत कई देश लामबंद हो रहे हैं. जैसे हाल ही में जापान और भारत ने एक मिलिट्री-पैक्ट किया. इसके तहत वे एक-दूसरे को सैनिक सहायता देंगे और इसका एक कॉमन मकसद चीन के खतरे को कम करना होगा. अब फ्रांस और ऑस्ट्रेलिया भी भारत के साथ ऐसा करार कर सकते हैं.

लंबी बातचीत के बाद भारत और जापान में ये सैन्य समझौता हुआ है. इसके तहत वे एक-दूसरे के समुद्री सैन्य बेस का इस्तेमाल कर सकेंगे. इस समझौते का नाम म्यूचुअल लॉजिस्टिक सपोर्ट अरेंजमेंट (MLSA) है, जिसपर देश के रक्षा सचिव अजय कुमार और जापान के राजदूत सुजुकी सतोशी से दस्तखत किए. भारत और जापान के बीच सैन्य सहायता को लेकर इतना बड़ा समझौता पहली बार हुआ है.

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भारत और जापान एक-दूसरे के समुद्री सैन्य बेस का इस्तेमाल कर सकेंगे- सांकेतिक फोटो (Photo-pixabay)





इसके तहत भारतीय सेनाओं को जापानी सेनाएं अपने अड्डों पर जरूरी सामग्री की आपूर्ति कर सकेंगी. साथ ही भारतीय सेनाओं के रक्षा साजो सामान की सर्विसिंग भी देंगी. यह सुविधा भारतीय सैन्य अड्डों पर जापानी सेनाओं को भी मिलेंगी. युद्ध की स्थिति में ये सेवाएं बेहद अहम मानी जाती हैं.

माना जा रहा है कि समुद्री क्षेत्र में चीन की लगातार बढ़ी मौजूदगी जब आतंक में बदली, तब से ही इस समझौते पर बात हो रही थी. अब इस पैक्ट को एक तरह से एंटी-चाइना पैक्ट की तरह देखा जा रहा है जो हिंद महासागर में चीन को कमजोर बनाएगा.

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बता दें कि चीन ने समुद्री रास्ते से खुद को सुपर पावर बनाने के लिए पाकिस्तान को कर्ज देकर कमजोर बनाया. अब पाकिस्तान के कराची और ग्वादर बंदरगाहों पर उसकी सीधी पहुंच है. साथ ही चीन ने समुद्री रास्तों को हथियाने के लए कंबोडिया और श्रीलंका जैसे देशों से भी कई समझौते किए. यहां तक कि वो साउथ चाइना सी को हड़पने के लिए वहां नकली द्वीप तक बना चुका है. कोरोना के दौर में भी चीन की ये गतिविधियां बढ़ीं ही. ये देखते हुए कई पश्चिमी देश इकट्ठा हो रहे हैं और दिलचस्प बात ये है कि सबके सब भारत को अपने साथ कॉमन रख रहे हैं.

समुद्री क्षेत्र में चीन की लगातार बढ़ती मौजूदगी अब आतंक में बदल गई है - सांकेतिक फोटो


वैसे इससे पहले ही भारत के साथ फ्रांस और ऑस्ट्रेलिया का एक समझौता हो चुका है. साल 2018 में फ्रांस के साथ हुए पैक्ट के तहत इंडियन नेवी फ्रांस के नेवी पोर्ट पर ठहर सकती है और वहां सैन्य मदद भी ले सकती है. इसमें जहाजों की रिपेयरिंग से लेकर मिलिट्री प्रैक्टिस तक शामिल है.

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इसी तरह से ऑस्ट्रेलिया के साथ हुए समझौते से दोनों देशों को अपने युद्धपोत और सैन्य सेवाओं के आदान-प्रदान की छूट मिलती है. साल 2016 में भारत और अमेरिका के बीच भी ऐसा एक समझौता हो चुका है. द लॉजिस्टिक एक्सचेंज मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट (LEMOA) नाम से इस पैक्ट की वजह से भारत और अमेरिका एक-दूसरे को नौसेना से जुड़ी कई तरह की मदद दे सकते हैं. इसमें एक-दूसरे के बंदरगाहों का कुछ हद तक इस्तेमाल भी शामिल है.

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जापान का योकोहामा बंदरगाह- सांकेतिक फोटो (Photo-pikist)


यूरेशियन टाइम्स की एक रिपोर्ट की मुताबिक अब समुद्री इलाकों में चीन की धौंस रोकने के लिए फ्रांस-ऑस्ट्रेलिया और भारत मिलकर नए सिरे से कोई समझौता कर सकते हैं. फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों (Emmanuel Macron) ने कैनबरा, पेरिस और दिल्ली की सैन्य साझेदारी का इशारा भी दिया था. 9 सितंबर को इस साझेदारी पर तीनों देशों के बीच बातचीत की शुरुआत हो चुकी है.

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जैसा कि हिंदुस्तान टाइम्स में आया है, तीनों देशों के विदेश मंत्रालयों ने समुद्री साझेदारी पर बात की. इसके तहत पोर्ट्स का इस्तेमाल, हथियारों की साझेदारी और कैपासिटी बिल्डिंग यानी क्षमताओं में बढ़ोत्तरी की बात की गई. विशेषज्ञ इस तरह के समझौतों को पूरी तरह से चीन के खिलाफ गठबंधन की तरह देख रहे हैं. अमेरिकी रक्षा विशेषज्ञ डेरेक ग्रॉसमैन के मुताबिक जल्द ही क्वाड (QUAD) खुलकर चीन के खिलाफ हो जाएगा. बता दें कि क्वाड जापान, ऑस्ट्रेलिया, भारत और अमेरिका के बीच एक बहुपक्षीय समझौता है. वैसे मूल तौर पर ये इंडो-पैसिफिक स्तर पर काम कर रहा है, ताकि समुद्री रास्तों से व्यापार आसान हो सके लेकिन अब ये व्यापार के साथ-साथ सैनिक बेस को मजबूती देने पर ज्यादा ध्यान दे रहा है.
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