जानिए, क्या हुआ जब एक भारतीय ने पूछा कि पाकिस्तान में भी बिंदियां मिलती हैं

बिंदी पर भारत-पाक के सोशल मीडिया यूजर आपस में उलझ रहे हैं- सांकेतिक फोटो (maxpixel)

पाकिस्तान के इस्लामाबाद में बाजार में सजने-संवरने की किस्म-किस्म की चीजें मिलेंगी लेकिन बिंदी (lack of bindi in Islamabad) नहीं. इसी बात को लेकर भारत और पाकिस्तानी (India and Pakistan social media fight) सोशल मीडिया के लोग आपस में भिड़े हुए हैं.

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    पाकिस्तान और भारत के ट्विटर यूजर्स वैसे तो अक्सर ही उलझते रहते हैं लेकिन इस बार उनका झगड़ा बिंदी को लेकर है. भारत में युवतियों के माथे पर अक्सर ही सजने वाली बिंदी पर एक भारतीय एक्टिविस्ट सोनम महाजन (Sonam Mahajan) ने ट्वीट कर दिया कि इस्लामाबाद में बिंदी नहीं मिलती. इसे तंज की तरह लेते हुए पाकिस्तानी ट्रोलर्स ये बताने में जुट गए कि बिंदी उनके यहां भी मिलती है, अगर ढंग से खोजी जाए.

    पाकिस्तानी सोशल मीडिया ने दिया ये जवाब 
    बिंदी पर भारत-पाक के सोशल मीडिया यूजर आपस में उलझ रहे हैं. इस्लामाबाद में बिंदी न मिलने को पाकिस्तानी अपनी कट्टरता से जोड़ रहे हैं और उसका जवाब दे रहे हैं. कोई-कोई ये भी बता रहा है कि इस्लामाबाद में चूंकि हिंदू आबादी कम है इसलिए वहां बिंदी नहीं दिखती. वहीं सिंध प्रांत में बाजार में आसानी से बिंदी मिल जाएगी. बहरहाल, सच जो भी हो, बिंदी के बारे में ये बात तो सच है कि दुनिया के कोने-कोने में भारतीय हिंदुओं के फैलने के साथ ही बिंदी भी हर जगह मिलती है.



    तिलक की तरह लगाई जाती थी 
    बिंदी लगाने की शुरुआत कहां से हुई, इसे लेकर इतिहास में किसी खास तथ्य या समय का हवाला नहीं मिलता. वैसे बिंदी की शुरुआत तिलक के रूप में हुई थी. माथे के बीचोंबीच इसे सिंदूर या फिर चंदन, हल्दी जैसी चीजों से बनाया जाता था. तब बिंदी धार्मिक रीति की तरह अपनाई गई थी. पुरुष जहां ऊंचा और लंबा तिलक लगाते, वहीं विवाहित स्त्रियां अपेक्षाकृत छोटे आकार का टीका लगातीं.

    आगे चलकर बिंदी काफी ग्लैमरस हो गई
    इसे भी अपनी शानोशौकत दिखाने के लिए पहना जाने लगा. जैसे अमीर घरों की महिलाएं हीरे-मोती जड़ी बिंदी लगातीं. आम महिलाएं सिंदूर का लाल टीका या बिंदी लगातीं. बिंदी पर मीना का काम भी होने लगा. पारदर्शी झलक लिए बिंदियां भी बनने लगी.

    गायत्री देवी जैसी शख्सियत ने बिंदी को बनाया विदेशों में भी खास 
    बिंदी को परंपरा से हटाते हुए फैशन से जोड़ने की शुरुआत 1930 के दशक से हुई. तब बेहद खूबसूरत महारानी गायत्री देवी किस्म-किस्म की बिंदी लगाया करतीं. उनका माथा शायद ही कभी किसी ने खाली देखा होगा. दुनियाभर के लोगों से मिलने वाली गायत्री देवी ने इस तरह से आम भारतीय महिला के रुटीन पहनावे को ग्लैमरस बना दिया.

    Gayatri Devi
    दुनिया की सबसे सुंदर महिलाओं में से एक महारानी गायत्री देवी हमेशा माथे पर बिंदी लगाया करतीं


    फिल्म इंडस्ट्री ने गोल बिंदी को एकदम अलग रूप से दिया
    पचास के दशक में हीरोइनें लंबी, गोल, किरणों वाली, कई तरह की बिंदियां लगाया करती थीं. हालांकि बिंदी के संसार में शिल्पा बिंदी ब्रांड ने इतिहास रच दिया. साल 1986 में ये बिंदी ब्रांड आया, जिसने पहली आसानी से चिपकने वाली बिंदी का विकल्प दिया. ये प्लास्टिक ऐसा होता था, कि रोज माथे पर लगाने पर भी निशान न बने. बता दें कि इससे पहले लोग या तो सिंदूर, आलता वगैरह लगाते, या फिर आटे की लोई बनाकर बिंदी को माथे पर चिपकाते.

    दूसरे देशों में रहा बिंदी का चलन 
    वैसे बिंदी दुनिया के कई हिस्सों में अलग ढंग से सेलिब्रेट होती रही है. जैसे प्राचीन ग्रीस में या फिर चीन के तेंग साम्राज्य में बिंदी चेहरे पर सजाई जाती थी. विंटेज इंडियन क्लोदिंग नाम की बेवसाइट में इसका जिक्र मिलता है. ये बात और है कि बिंदी माथे पर एक गोल टीके की तरह नहीं, बल्कि पूरे ही माथे पर छोटे-छोटे गोलों की तरह सजाई जाती थी. दक्षिण कोरिया में भी शादी की रस्मों में चेहरे पर तिलक के समान बिंदी लगाई जाती थी. भारत के पड़ोसी देश नेपाल में विवाहित महिलाएं माथे पर ऊपर की ओर बिंदी सजाती हैं.

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