अरुणाचल पर कब क्या रहा चीन का स्टैंड? क्या कहते हैं फैक्ट्स?

अरुणाचल पर कब क्या रहा चीन का स्टैंड? क्या कहते हैं फैक्ट्स?
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India-China Stand-Off: लद्दाख में चीन ने सीमा विवाद का बढ़ावा देकर तनाव (Border Tension) बना रखा है. दोनों देशों की सेनाएं बॉर्डर पर डटी हैं. ऐसे में, अरुणाचल प्रदेश को फिर पूरी तरह अपना बताकर चीन ने भारत के लिए पूर्वी फ्रंट (North East) पर भी चुनौती देने की कोशिश की है. जानिए पिछले 100 सालों से अरुणाचल की सीमाओं पर कैसे विवाद (India-China Border Dispute) रहा है.

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  • Last Updated: September 8, 2020, 10:33 AM IST
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अरुणाचल (Arunachal Pradesh) में पांच लोगों के लापता होने के जब भारतीय आर्मी (Indian Army) ने अंदेशा जताया कि चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (Peoples Liberation Army of China) ने इन्हें अगवा किया है तो जवाब में चीन ने खंडन करते हुए कहा कि उसने 'अरुणाचल को कभी चीन से अलग माना ही नहीं, तो अपने ही लोगों को अगवा क्यों' करेगा! अरुणाचल प्रदेश पर फिर दावा करने वाले चीन ने भारतीय राज्य (Indian State) को चीन का 'साउथ तिब्बत' (South Tibet) इलाका कहा.

अरुणाचल में आधिकारिक हवालों से कहा गया कि ऐसा होता रहता है कि लोग अनजाने में वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पार कर जाते हैं, लेकिन फिर लौट भी आते हैं. पिछली बार ऐसा जब हुआ था, तब 40 दिन बाद लोग लापता लौटे थे और सीमा पर हालात शांतिपूर्वक ही रहे थे. इस बार चूंकि लद्दाख में एलएसी पर पहले ही भारत और चीन के बीच तनाव बना हुआ है इसलिए भी चीन ने आक्रामक प्रतिक्रिया दी है. आइए, आपको बताते हैं कि अरुणाचल को लेकर चीन कब किस तरह का बर्ताव करता रहा है.

क्या है अरुणाचल प्रदेश सीमा का मुद्दा?
पहले इसे नॉर्थ ईस्टर्न फ्रंटियर एजेंसी कहा जाता था और बाद में इसे अरुणाचल प्रदेश नाम मिला. ब्रिटिश राज वाले भारत में अंग्रेज़ों और तिब्बत के बीच एक संधि हुई थी, जिसके तहत अरुणाचल भारत में शामिल माना गया और मैकमोहन रेखा खींची गई थी. लेकिन चीन ने इस संधि को यह कहकर खारिज कर दिया था कि तिब्बत उसी का हिस्सा है, अलग देश नहीं इसलिए बगैर चीन की सहमति के ऐसी कोई संधि मान्य नहीं है.
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तभी से यह सीमा विवादों में घिरी है. कभी तिब्बत भी इस संधि से मुकरता रहा, तो कभी भारत के पक्ष में सहमति जताता रहा. 1962 के युद्ध में चीनी सेना ने तकरीबन पूरे अरुणाचल को कब्ज़े में ले लिया था. इसके बावजूद शांति बहाली हुई और चीन हमेशा अरुणाचल पर अपना दावा करता रहा. जानिए कि चीन किस समय किस तरह के स्टैंड अरुणाचल पर लेता रहा.

परंपरा से तय हुई सीमा
मैकमोहन रेखा के दक्षिण में अरुणाचल पर चीन के दावे का आधार परंपरागत सीमाएं रही हैं. भारत मानता रहा है कि लद्दाख और अरुणाचल में चीन जो दावे करता रहा है, उसका कोई लिखित या दस्तावेज़ी आधार नहीं है. चीन अपने पुराने साम्राज्य के आधार पर ही दावा करता रहा है, जबकि चीन कहता है कि भारत ब्रिटिश साम्राज्य के आधार पर अरुणाचल को अपनी सीमा मानता है.

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चीन के आखिरी किंग शासन के दौरान 1912 में राज्यादेश के मुताबिक चीन के कॉंसेप्ट में मांचू, हान चीनी, मंगोल, मुस्लिम और तिब्बतियों को शामिल किया गया था. इसी तर्ज़ पर भारत धर्म या नस्ल के आधार पर तो नहीं लेकिन मौर्य और चोल वंशों की फैली सीमाओं को भी संदर्भ के तौर पर इस्तेमाल करता रहा है. लेकिन दस्तावेज़ी तौर पर भारत 1914 में शिमला समझौते से तय हुई मैकमोहन लाइन को तरजीह देता है.

1917 से 1933 के बीच घटनाक्रम
साल 1914 में शिमला समझौते के बाद चीन से इसे मानने से इनकार कर दिया था क्योंकि यह तिब्बत के साथ अंग्रेज़ों की संधि थी. 1917 से 1933 के बीच चीन सरकार ने जो एटलस प्र​काशित किए, उसमें अक्साई चीन से लेकर कुनलुन पहाड़ों तक का इलाका जॉनसन लाइन के मुताबिक दर्शाया गया. 1925 में पेकिंग यूनिवर्सिटी एटलस में भी अक्साई चीन भारत में दिखाया गया.

ब्रिटिशों ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि चीन सरकार अक्साई चीन के आसपास अपनी गतिविधयां तेज़ कर रही थी. भारत की आज़ादी तक यह इलाका विवाद में नहीं रहा क्योंकि ब्रिटिशों ने इसे महत्व नहीं दिया था. लेकिन चीन के विस्तारवादी हौसले यहां से बुलंद हो चले थे.

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1933 के बाद खोखले हुए चीन के दावे
चीन के लगातार दबाव के बाद तिब्बत के भी मुकर जाने के कारण ब्रिटिशों ने शिमला समझौते की वैधानिकता को मद्देनज़र रखते हुए मैकमोहन लाइन को 1937-38 तक नक्शे पर प्रकाशित नहीं किया था. अरुणाचल के तवांग पर तिब्बत ही प्रशासन कर रहा था और 1938 में हुई बातचीत तक तिब्बत वहां से ​हटने को तैयार नहीं था.

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दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जब भारत के इस पूर्वी हिस्से पर जापानी सेनाओं ने हमला किया, तब चीनी विस्तारवाद का भी खतरा पैदा हुआ. ऐसे समय में ब्रिटिश भारत की सेनाओं ने अरुणाचल के तवांग की हिफाज़त की थी.

भारत की आज़ादी से युद्ध तक
1950 के दशक में पीआरसी ने शि​नजियांग और पश्चिमी तिब्बत यानी लद्दाख और अक्साई चीन के पास तक 1200 किलोमीटर की एक रणनीतिक सड़क का निर्माण किया. 1957 तक भारत को इस सड़क के बारे में भनक तक नहीं थी. जब 1958 में यह सड़क चीन के नक्शे पर दिखी, तब भारत को इसका पता चला. इस पर नेहरू सरकार का साफ रुख था कि लद्दाख और अक्साई चीन भारत के अभिन्न हिस्से रहे और इन पर किसी से कोई बात नहीं होगी.

सीमा विवाद को सुलझाने के लिए नेहरू और झाउ एनलाई के बीच 1960 में समझौते को लेकर बातचीत हुई लेकिन दोनों देश सीमाओं को लेकर किसी तरह राज़ी नहीं हो सके. 1954 में नेहरू ने भारत के नक्शे पर उत्तर से पूर्व तक अपनी सीमाओं को नक्शे पर लाने के आदेश दिए. इसी बीच, तिब्बत को हड़पने के चीन के अभियान के दौरान भारत ने तिब्बत का साथ दिया, तो चीन और नाराज़ हुआ.

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पत्रकार सुधा रामचंद्रन के लेख के मुताबिक चीन ने तिब्बत के बिहाफ पर तवांग पर दावा किया लेकिन तिब्बत ने कहा कि तवांग उसका नहीं था. सीमा विवाद को लेकर चीन और भारत के बीच तनाव बढ़ने का अंजाम हुआ 1962 का युद्ध. लद्दाख के साथ ही पूर्व में मैकमोहन लाइन पर चीन ने हमला किया. चीन ने अरुणाचल के बड़े हिस्से को अपने कब्जे में लिया. हालांकि जल्द ही चीन ने इस हिस्से को भारत को लौटाया और 1963 में युद्धबंदियों को भी छोड़ दिया. यह अहम घटना थी क्योंकि हमेशा भारत के दावे से इनकार करने के बाद पहली बार था कि चीन अपने दावे से पीछे हटा था.

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तनाव तो बना ही रहा
अरुणाचल से सटे सिक्किम में एक छोटा सा हिंसक संघर्ष 1967 में भी दोनों देशों के बीच हुआ था. 1987 और 2013 में भी सीमा पर संघर्ष के कठिन हालात बने, लेकिन किसी तरह टाले गए. एलएसी को लेकर लगातार विवाद बना रहा इसी के चलते डोकलाम में भी चीनी सेना दो महीने से ज़्यादा समय तक डटी रही थी. इस साल 2020 में भी लद्दाख के​ हिस्से में चीन के साथ भारत युद्ध के मुहाने तक पहुंच चुका.

तनाव के बीच ही दोनों देश शांति बहाली की कोशिशें भी करते रहे. 1996 में एलएसी पर विश्वास बहाली के लिए एक एग्रीमेंट हुआ. फिर 2006 में चीनी राजदूत ने पूरे अरुणाचल प्रदेश को चीन का हिस्सा बताया. दोनों देशों ने एक दूसरे पर घुसपैठ के आरोप लगाए और दोनों देशों ने भारी बल सीमा पर तैनात किए. 2014 में भारत ने प्रस्ताव रखा कि चीन को 'एक भारत' नीति के तहत सीमा विवाद सुलझाना चाहिए.
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