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India-China Standoff: लद्दाख में बर्फीली सर्दी से ज्यादा गर्मी की चिंता, चीन कर रहा बड़ी तैयारी

भारत और चीन के बीच पिछले साल मई से सीमा विवाद जारी है (सांकेतिक तस्वीर)

India China Dispute: भारत के साथ अपनी 4,056 किलोमीटर की सीमा के साथ चीन अपने इंफ्रास्ट्रक्चर को भी मजबूत कर रहा है. इस महीने की शुरुआत में राष्ट्रपति शी जिनपिंग (Xi Jinping) ने सिक्किम की सीमा के उस पार निंगची से गुजरते हुए ल्हासा और चेंगदू के बीच 1,838 किलोमीटर की हाई-स्पीड ट्रेन सेवा पर चल रहे काम में तेजी लाने के निर्देश दिए हैं.

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    (प्रवीण स्वामी)

    India-China Standoff Updates: भारत और चीन (India China Dispute) के बीच पूर्वी लद्दाख में (Ladakh Boder Tension) इस साल मई से जारी हुआ विवाद फिलहाल खत्म होता नहीं दिख रहा है. वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर डिसएंगेजमेंट यानी सेनाओं को पीछे करने की कोशिश को लेकर हुई कमाडंर स्तरीय बैठक में अभी तक कोई नतीजा नहीं निकल पाया है. लद्दाख में पारा माइनस डिग्री में जाने के बाद हालात और बिगड़ गए हैं.

    भारत और चीन के बीच लंबे वक्त से चला आ रहा सीमा विवाद इस साल मई से एक बार फिर गर्माने लगा जब पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में दोनों देशों की सेनाएं आमने-सामने आई गईं. अब तक यहां दो बार हिंसक झड़प भी हो चुकी है और दोनों देशों के बीच सैन्य और कूटनीतिक बैठकें कर समाधान निकालने की कोशिश की जा रही है. वहीं, चीन से सिक्कम और अरुणाचल प्रदेश में भी खतरा बना हुआ है जहां ड्रैगन के तेवर आक्रामक बने हैं.

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    हालांकि, भारत सरकार इस बात को लेकर आशान्वित है कि लद्दाख में बर्फीली सर्दियों की तबाही के बीच जारी वार्ता से कम से कम पैंगोंग झील के आसपास की स्थिति में कुछ सुधार होंगे. चीनी सेना यहां से सैनिकों को पीछे वापस जाने को कहेगी.

    भारत के साथ अपनी 4,056 किलोमीटर की सीमा के साथ चीन अपने इंफ्रास्ट्रक्चर को भी मजबूत कर रहा है. इस महीने की शुरुआत में राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने सिक्किम की सीमा के उस पार निंगची से गुजरते हुए ल्हासा और चेंगदू के बीच 1,838 किलोमीटर की हाई-स्पीड ट्रेन सेवा पर चल रहे काम में तेजी लाने के निर्देश दिए हैं. इससे साफ समझा जा सकता है कि चीन सर्दी में भी किस तरह गतिरोध जारी रखने पर अड़ा हुआ है.


    रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2019 में चीन ने तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र (टीएआर) में सड़क, रेलवे और फाइबर-ऑप्टिक लाइनों जैसे बुनियादी ढांचे के निर्माण में करीब 9.9 बिलियन डॉलर का निवेश किया. इसके अलावा निवेशकों को आकर्षित करने के लिए 26 नए शहरों के निर्माण पर 1.3 बिलियन डॉलर खर्च किए जा रहे हैं. भारी निवेश होने पर वहां नौकरियों के अवसर भी बढ़े हैं.

    फ्रांस के जाने माने लेखक और इतिहासकार क्लाउड अरपी ने उल्लेख किया है कि ल्हासा से बाहर रेल विस्तार का एक नेटवर्क तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र की राजधानी को यतांग से जोड़ेगा. ये भूटान द्वारा दावा किए गए कुछ क्षेत्रों को भी कवर करेगा. जाहिर है कि चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी आगे जाकर भूटान के इस क्षेत्र पर भी अपना दावा करेगी. इसके बाद भूटान की चुम्बी घाटी में चीन के पास अपनी सेना तैनात करने की क्षमता भी हो जाएगी. भारत इसके पहले इस मामले पर विरोध जता चुका है.

    रसद विशेषज्ञों ने अनुमान लगाया है कि रेल और सड़कों के नेटवर्क पीएलए के 76वें और 77वें संयुक्त-शस्त्र समूह सेनाओं को एक सप्ताह के भीतर टीएआर में सात डिवीजन-आकार के फॉर्मूलेशन में स्थानांतरित करने की अनुमति दे सकते हैं. पीएलए के पास पहले से ही एलएसी के पार 31-प्रमुख मार्गों पर सभी सड़क मार्ग उपलब्ध हैं, जो कि टीएआर के पार राजमार्गों से जुड़े हुए हैं. नए रेलवे लिंक से चीन अब कभी भी बड़ी संख्या में सैनिकों को आक्रामक स्थिति में भेजने की स्थिति में आ जाएगा.


    हालांकि, इस महीने की शुरुआत में भारत और चीन की सेनाओं के बीच लद्दाख बॉर्डर पर फिंगर इलाके में सैनिकों को हटाने पर सहमति बनने के लिए बात हुई थी. इसके लिए थ्री स्टेप फॉर्मूला भी सुझाया गया था. इस वार्ता से परिचित एक अधिकारी ने News18 को बताया, 'दोनों सेनाओं को पुरानी स्थिति में वापस भेजने के लिए बात हुई थी. ताकि लद्दाख में पूर्ण रूप से संघर्ष खत्म किया जा सके, लेकिन ऐसा हो न पाया.'

    भारतीय सेना के एक अधिकारी ने कहा कि ब्लैक टॉप, गुरुंग हिल और मागर हिल के आसपास के कई स्थानों पर अगस्त में भारतीय विशेष बल ने अपनी पकड़ मजबूत कर ली थी. तब से चीन भड़का हुआ है और पीछे नहीं हटने की जिद पर अड़ा है. हालांकि, अभी कोई संकेत नहीं है कि चीन लद्दाख के डेपसांग मैदानों जैसे क्षेत्रों में अपनी सेना को वापस करने के लिए तैयार है.

    वहीं, पूर्व में डोकलाम घाटी से लेकर अरुणाचल प्रदेश के फिश टेल्स क्षेत्र तक पीएलए ने नाटकीय रूप से अपने सैन्य बुनियादी ढांचे का विस्तार किया है. भारत को इस क्षेत्र में बचाव के लिए अतिरिक्त जवान तैनात करने पड़े हैं. विशेषज्ञ सहमत हैं कि बीजिंग शायद पूर्ण विकसित युद्ध की तलाश में नहीं है. लेकिन, निश्चित तौर पर चीन अपने साम्राज्य का विस्तार चाहता है.


    यहां पर ये भी जानना हमारे लिए जरूरी है कि भारत और चीन के बीच अब तक 1993, 1996 और 2005 में समझौते हो चुके हैं, लेकिन हर बार चीन की तरफ से इनका उल्‍लंघन किया गया है. ये सभी समझौते विश्‍वास बहाली के उपाय करने और सीमा पर शांति बनाए रखने से संबंधित थे. दोनों देशों के बीच नक्‍शों के आदान-प्रदान को लेकर भी समझौता हो चुका है जिस पर 2003 में चीन ने अमल करने से इनकार कर दिया था.

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    इसके बाद भारत की पहल के बावजूद चीन एलएसी से संबंधित मुद्दों पर बातचीत से लगातार भागता रहा है. चीन के विदेश मंत्रालय ने लद्दाख को केंद्र शासित राज्‍य मानने से इनकार कर दिया है. (मूल रूप से अंग्रेजी में इस आर्टिकल को पूरा पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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