दुनिया में सबसे ज़्यादा भारत की गाड़ियां और चिमनियां उगलती हैं ये ज़हर

Bhavesh Saxena | News18Hindi
Updated: August 20, 2019, 10:51 PM IST
दुनिया में सबसे ज़्यादा भारत की गाड़ियां और चिमनियां उगलती हैं ये ज़हर
न्यूज़18 क्रिएटिव

वायु प्रदूषण (Air Pollution) के दिनबदिन खतरनाक होते जाने से दुनिया में हर साल 42 लाख लोग मर रहे हैं. दुनिया में वायु प्रदूषण को लेकर नासा (NASA) के डेटा के आधार पर ग्रीनपीस (Green Peace) ने डरावने आंकड़े प्रस्तुत किए हैं.

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चीन और अमेरिका (China and US) को पछाड़कर भारत (India) नंबर एक के पायदान पर पहुंच गया है, लेकिन ये कोई अच्छी खबर नहीं है क्योंकि यह रिकॉर्ड किसी सकारात्मक मोर्चे पर नहीं बना है. ये वायु प्रदूषण (Air pollution) से जुड़ा मामला है और ये खुलासा अमेरिका (USA) की अंतरिक्ष विज्ञान एजेंसी नासा (National Aeronautics and Space Administration) ने किया है. नासा की सैटेलाइट तस्वीरों के विश्लेषण के बाद जो आंकड़े सामने आ रहे हैं, उनमें कहा गया है कि सेहत के लिए खतरनाक गैस SO2 यानी सल्फर डाइऑक्साइड के मानवजनित उत्सर्जन (SO2 Emission) में भारत पहले पायदान पर है. जानिए कि ये गैस कैसे और कितनी खतरनाक है और आंकड़ों के मुताबिक भारत कैसे इस प्रदूषण को रोकने में नाकाम हुआ.

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नासा के सैटेलाइट डेटा (NASA Data) के आधार पर ग्रीनपीस ने अपनी रिपोर्ट (Pollution Report) में आंकड़े जारी किए हैं, उनके मुताबिक़ भारत में SO2 का उत्सर्जन दुनिया का 15 फीसदी है. इस ज़हरीली गैस के सबसे ज़्यादा उत्सर्जन के मामले में दूसरे नंबर पर रूस (12.3%), तीसरे नंबर पर चीन (8.6%) और चौथे नंबर पर अमेरिका (3.2%) है. आपको ये जानकर हैरत होगी कि कुछ ही साल पहले तक अमेरिका और चीन (China) इस प्रदूषण के लिए सबसे ज़्यादा ज़िम्मेदार थे. ये भी जानिए कि ऐसा क्या हुआ या कौन सी तकनीक अपनाकर इन देशों ने इस प्रदूषण को कम किया.

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नासा द्वारा जारी इस मैप से साफ है कि पिछले कुछ सालों में भारत में SO2 उत्सर्जन कितना बढ़ा है.


कैसे होता है SO2 उत्सर्जन?
पूरी दुनिया में वायु प्रदूषण को जानलेवा बनाने वाली गैस SO2 ही है. इस गैस के उत्सर्जन के प्रमुख कारण पावर प्लांट्स, उद्योग और ईंधन रूपी तेल जलाकर हवा में धुआं छोड़ने वाली गाड़ियां व अन्य मशीनें हैं. ग्रीनपीस की सीनियर विश्लेषक लॉरी मिलिविर्ता के मुताबिक़ 'कोयला, तेल और गैस जैसे जीवाश्म द्रवों को जलाने से सबसे ज़्यादा SO2 उत्सर्जन होता है. इससे वायु प्रदूषण इतना भयानक होता है कि अकाल मृत्यु की आशंकाएं बढ़ती हैं. सरकारों के लिए ज़रूरी है कि वो जीवाश्म तेलों से दूरी बनाने और उत्सर्जन के मानकों को मज़बूत बनाने की तरफ काम करें'.
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कहां कितना हो रहा है ये उत्सर्जन?
देशों के हिसाब से तो भारत इस लिस्ट में पहले नंबर पर है लेकिन अगर एक स्थान की बात करें, जहां से सबसे ज़्यादा SO2 उत्सर्जन होता है तो इस लिस्ट में रूस स्थित नॉर्लिस्क स्मेल्टर कॉम्प्लेक्स का नाम है. रिपोर्ट के मुताबिक SO2 उत्सर्जन का दूसरा सबसे बड़ा स्रोत दक्षिण अफ्रीका का पुमालंगा क्षेत्र और ईरान का ज़गरोज़ है. वहीं, मध्य पूर्व में SO2 उत्सर्जन के मामले में सबसे खराब हालत सउदी अरब की है, जहां मक्का क्षेत्र में स्थिति तेल बेस्ड पावर प्लांट्स, रिफाइनरियां और उद्योग वायु प्रदूषण बुरी तरह फैला रहे हैं.

रिपोर्ट के मुताबिक़ यूरोप में यूक्रेन, सर्बिया और बुल्गारिया उन 20 देशों की सूची में शामिल हैं जो सबसे ज़्यादा SO2 उत्सर्जन कर रहे हैं. ऑस्ट्रेलिया में अब तक इस उत्सर्जन को रोकने के लिए कोई कानूनी प्रावधान नहीं है, हालांकि चीन, अमेरिका और यूरोप ने इस दिशा में कदम उठाए हैं.

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नासा द्वारा जारी इस मैप में बताया गया है कि चीन ने पिछले सालों में SO2 उत्सर्जन कितना कम किया.


भारत में कैसे फैल रहा है ये प्रदूषण?
नासा के सौजन्य से मिली सैटेलाइट तस्वीरों और डेटा के विश्लेषण से पाया गया है कि भारत में SO2 उत्सर्जन सबसे ज़्यादा वहां होता है, जहां भारी मात्रा में कोयला जलाया जाता है. न्यूज़लॉंड्री की एक रिपोर्ट में दर्ज किया गया है कि राज्यों के हिसाब से भारत में यह प्रदूषण सबसे ज़्यादा तमिलनाडु में है. ओडिशा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र का नंबर इसके बाद है. इलाकों के हिसाब से थर्मल पावर प्लांट वाले इलाके सिंगरौली, कोरबा, झारसुगुड़ा, कच्छ, चेन्नई, रामागुंडम, चंद्रपुर और कोराड़ी वो स्थान हैं, जहां सबसे ज़्यादा SO2 उत्सर्जन हो रहा है.

चीन ने कैसे पाया काबू?
ग्रीनपीस ईस्ट एशिया के कैंपेन विशेषज्ञ सुनील दहिया के मुताबिक़ कोयले का प्रयोग कम करने की ज़रूरत है और कोयला बिजलीघरों को सख्त मानकों का पालन करना चाहिए लेकिन अब तक सरकार कोई कड़ाई नहीं कर सकी है, जो चिंताजनक है. पिछले कुछ सालों में चीन जैसे कुछ देशों ने फ्ल्यू गैस डीसल्फराइजेशन (एफजीडी) तकनीक का इस्तेमाल किया है. साल 2006 से ही चीन ने इस तकनीक से 2012 तक SO2 उत्सर्जन को करीब 40% कम किया. दावा है कि चीन के 90% से अधिक उद्योगों और बिजलीघरों में एफजीडी यंत्र फिट हैं. यह आंकड़ा अमेरिका से भी बेहतर है.

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2008 में दिल्ली की हवा में SO2 की मात्रा 5 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर थी, लेकिन 2017 तक 23.36 माइक्रोग्राम.


ये हैं सेहत के लिए खतरे
सल्फर डाइआक्साइड यानी SO2 सांस के तंत्र और फेफड़ों की कार्यप्रणाली पर बुरा प्रभाव डालने वाली गैस है. यानी वायु प्रदूषण में शामिल इसी गैस के कारण अस्थमा के मरीज़ों और बच्चों के श्वास व प्रतिरोधी तंत्र पर घातक असर पड़ता है. इसी गैस के कारण कई तरह के इन्फेक्शन भी होते हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन की गाइडलाइन से ज़्यादा वायु प्रदूषण में दुनिया की 91 फीसदी आबादी जी रही है और हर साल दुनिया में 42 लाख लोग इसके चलते मर रहे हैं. भारत में वायु प्रदूषण में SO2 की कितनी मात्रा है इसके बारे में डरावने आंकड़े ये हैं.

साल 2008 में दिल्ली की हवा में SO2 की मात्रा 5 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर थी, लेकिन दिल्ली के इकोनॉमिक सर्वे के हिसाब से 2017 तक के जो आंकड़े मिले हैं, उनके मुताबिक ये आंकड़ा 23.36 माइक्रोग्राम तक बढ़ चुका था. ये भी गौरतलब है कि आईआईटी कानपुर की 2015 की रिपोर्ट के मुताबिक़ दिल्ली के 300 किलोमीटर के दायरे में मौजूद 13 बिजलीघरों से SO2 उत्सर्जन को 90% कम करने से हानिकारक PM 2.5 की मात्रा प्रतिघन मीटर 35 माइक्रोग्राम कम हो सकती है. ऐसे समझें कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक हवा में PM 2.5 की अधिकतम सीमा सालाना 10 माइक्रोग्राम आदर्श है.

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First published: August 20, 2019, 9:04 PM IST
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