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क्लाइमेट चेंज समिट: इस एक लड़ाई में एक-दूसरे का साथ देंगे भारत और चीन

News18Hindi
Updated: December 2, 2019, 5:49 PM IST
क्लाइमेट चेंज समिट: इस एक लड़ाई में एक-दूसरे का साथ देंगे भारत और चीन
स्पेन की राजधानी मैड्रिड में क्लाइमेट समिट की तैयारियां

हालांकि भारत लगातार कहता रहा है कि उसका प्रति कैपिटा कॉर्बन उत्सर्जन किसी भी देश की तुलना में कम है. वैसे हम दुनिया में चीन, अमेरिका और यूरोपीय के बाद चौथे कॉर्बन उत्सर्जक देश हैं.

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  • Last Updated: December 2, 2019, 5:49 PM IST
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हृदयेश जोशी
190 से ज्यादा देश स्पेन की राजधानी मैड्रिड में दो हफ्ते तक चलने वाले सालाना क्लाइमेट चेंज समिट (Climate Change Summit 2019) यानि जलवायु परिवर्तन बैठक के लिए जुट रहे हैं. इसमें गरीब से लेकर विकासशील देश होंगे, जो धनी और विकसित माने जाने देशों से अपने लिए समझौते की एक मुश्किल लड़ाई लड़ेंगे.

संयुक्त राष्ट्र की इस सालाना जलवायु कांफ्रेंस को कांफ्रेंस ऑफ पार्टीज (CoP25) के तौर पर जाना जाता है. इसमें देशों के मुखिया, वैज्ञानिक और 200 से अधिक देशों के वार्ताकार आएंगे, जो ग्लोबल वार्मिंग (Global Warming) और इसके प्रभावो के खिलाफ एक रणनीति तैयार करेंगे.

देशों के प्रतिनिधियों के अलावा यहां सारी दुनिया के सिविल सोसायटी ग्रुप्स के ऑब्जर्वर्स और मीडिया के  प्रतिनिधि होंगे, ताकि वो यहां हो रही प्रक्रिया पर नजर रख सकें.

जलवायु कांफ्रेंस मैड्रिड में 02-13 दिसंबर तक चलेगी. इसमें कई मीटिंग्स का दौर चलेगा. साथ ही प्रतिनिधि 2015 में तय किये गए प्रावधानों को अंतिम रूप देंगे. इसमें ये तय किया जाएगा कि अंतरराष्ट्रीय उत्सर्जन ट्रेडिंग सिस्टम का कामकाजी स्वरूप क्या होगा और समुद्र स्तर बढ़ने और जलवायु बदलाव के कारण होने वाले अन्य प्रभावों के चलते गरीब देशों को होने वाले नुकसान की भरपाई कैसे होगी.

पेरिस समझौता वर्ष 2020 में ग्लासगो के यूएन क्लाइमेट चेंज कांफ्रेंस के साथ ही प्रभावी हो जाएगा. इसी के जरिए भविष्य के प्रयासों की बात भी देखी जाएगी.

गंभीर होती जा रही है तस्वीर पिछले 15 महीनों में क्लाइमेट चेंज पर इंटर-गर्वनमेंट पैनल के निष्कर्षों के साथ पेश तमाम साइंटिफिक रिपोर्ट्स मौजूदा जलवायु संकट की स्थिति की खराब तस्वीर पेश करती है, जो लगातार तापमान की बढोतरी के साथ गंभीर हो रही है.

यहां पर जो समझौता तैयार होगा, उसमें ध्यान रखा जाएगा कि इस सदी में ग्लोबल तापमान दो डिग्री सेल्सियश से ज्यादा नहीं बढ़े. अगर संभव हो तो इसे 1.5 डिग्री तक ही रखा जा सके. हालांकि बहुत से वैज्ञानिक इस औसत बढोतरी से भी सहमत नहीं हैं. इसे 1.5 डिग्री सेल्सियश तक रखने के लिए बड़ी इकोनॉमीज को युद्ध स्तर पर काम करके उत्सर्जन को बड़े पैमाने पर घटाना होगा.

पहले ये समिट चिली में होने वाला था लेकिन वहां के अंदरूनी हालात खराब होने के कारण इसे स्पेन में कराया जा रहा है


पिछले साल अक्टूबर में एक खास संयुक्त रिपोर्ट जारी हुई थी, जिसमें तापमान 1.5 डिग्री से ज्यादा बढ़ने पर गंभीर परिणाम सामने आ सकते हैं, जिसमें सूखा से लेकर बारिश में बढोतरी और इसके परिणामस्वरूप लगातार बाढ़ और प्रचंड तूफान जैसी आपदाएं शामिल हैं. इससे ग्लैशियर पिघलेंगे और समुद्र का स्तर तेजी से बढ़ेगा, नतीजतन समुद्रतटीय इलाकों और शहरों के सामने बने रहने का खतरा पैदा हो जाएगा.

मैड्रिड कांफ्रेंस से तुरंत पहले संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण प्रोग्राम (UNEP) की रिपोर्ट आगाह किया गया है कि अगर 2020 से 2030 के बीच ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन 7.6 फीसदी सालाना से कम नहीं हुआ तो दुनिया तापमान को 1.5 डिग्री तापमान के लक्ष्य को गंवा देगी, जिसकी बात पेरिस एग्रीमेंट में की गई थी. इसका मतलब ये हुआ कि दुनिया की सबसे बड़ी इकोनॉमी अपने कॉर्बन उत्सर्जन को कम करने में नाकाम रहेंगे. फिलहाल ये देश बड़े पैमाने पर फॉजिल फ्यूल्स पर अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए निर्भर हैं, जिसमें बड़े पैमाने पर प्रदूषण भी होता है.

भारत की भूमिका 
भारत खुद अब बड़े पैमाने पर मौसम के कारण पैदा हो रही आपदाओं का गवाह बन रहा है. इस साल जहां देश में जबरदस्त सूखा पड़ा, वहीं जबरदस्त लू की वजह से भयंकर सूखे के हालात भी पैदा हुए. देश के कई हिस्सों में भयंकर बाढ़ तबाहियां भी आईं. इससे ना केवल कृषि सेक्टर बल्कि इकोनॉमी पर जबरदस्त असर तो दिखा ही साथ ही जानमाल की क्षति भी हुई.

भारत का भूगोल जटिल है, यहां करीब दस हजार बड़े और छोटे ग्लैशियर हैं तो 7500 किलोमीटर लंबे समुद्र तटीय हिस्से और तमाम एग्रो क्लाइमेट जो-जिसकी वजह से ये देश क्लाइमेट चेंज के कारण दिक्कत महसूस करता है. भारत का 50 फीसदी कृषि सेक्टर अब भी बारिश पर निर्भर करता है, जिस पर ग्रामीण इकोनॉमी और किसान निर्भर करते हैं, जो अब पिछले कुछ सालों से असंभावित बारिश पैटर्न से निपट रहे हैं.

भारत के पूर्वी समुद्र तटीय इलाके में बुलबुल तूफान के नुकसान के बाद की हालत


अगर हम पूर्वी समुद्र तटीय इलाकों को देखें तो ये लगातार तूफान की मार का गवाह बन रहा है, जिनकी आवृत्तियां अविश्वसनीय रूप से बढ़ रही हैं. बुलबुल तूफान जबरदस्त तबाही मचाई. बेशक भारत की आपदा प्रबंधन क्षमता बेहतर हो रही है लेकिन लगातार इन तूफानों से आने से इकोनॉमी के साथ संसाधनों पर बहुत बुरा असर पड़ता है.

एक्सपर्ट्स का कहना है कि समुद्र का तापमान बढ़ने के साथ भारत का पश्चिमी समुद्र तटीय इलाका भी प्रभावित होगा. इस ओर आबादी ज्यादा सघन है. आशंका जाहिर की जा रही है कि अब ये इलाके भी तूफान के गवाह बन सकते हैं.

ऐसे हालात में भारत जब इस यूएन क्लाइमेट चेंज समिट में हिस्सा ले रहा है तो वो यहां अपने भविष्य के एक्शन के जरिए फायदा ले सकता है. वैसे यहां भारत की भूमिका को काफी करीब से देखा भी जाएगा.

हालांकि भारत इस समिट में चीन और अन्य विकासशील देशों के साथ हाल मिलाकर यूरोपीय यूनियन और अमेरिका के साथ अन्य विकसित देशों पर दबाव बनाने की कोशिश करेगा ताकि क्लाइमेट आपदा को टालने में बड़ी भूमिका निभा सके. हालांकि उसके खुद के योगदान की भी जवाबदेही तो होगी ही. दुनियाभर में 50 फीसदी कॉर्बन उत्सर्जन भारत के अलावा चीन, अमेरिका और रूस के जरिए होता है.

हालांकि भारत तर्क दे सकता है कि प्रति कैपिटा कॉर्बन उत्सर्जन के मामले में वो किसी भी देश से बहुत कम है. लेकिन भारत का ये तर्क काम आ पाएगा, इसकी गुंजाइश बहुत कम है.

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First published: December 2, 2019, 5:19 PM IST
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