COVID-19 की वजह से बच्चों की पढ़ाई में हुआ बड़ा नुकसान, मुश्किल होगी भरपाई

एक साल से स्कूल  (School) ना जाने पर बच्चों (Children) की पढ़ाई के नुकसान (Loss of learning) की भरपाई करने बहुत मुश्किल होगा जो आगे महंगा पड़ सकता है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

एक साल से स्कूल (School) ना जाने पर बच्चों (Children) की पढ़ाई के नुकसान (Loss of learning) की भरपाई करने बहुत मुश्किल होगा जो आगे महंगा पड़ सकता है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

पिछले एक साल में कोविड-19 महामारी (Covid-19 Panemic) की वजह से देश के ज्यादातर बच्चे स्कूल (School) नहीं गए. इस वजह से उन्हें बहुत ज्यादा नुकसान हुआ है, जिसकी भरपाई बहुत मुश्किल है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 19, 2021, 3:48 PM IST
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(अनुराग बेहर) भारतीय स्कूलों (Indian Schools) में 26 करोड़ से ज्यादा छात्र हैं. पिछले साल कोविड महामारी (Covid-19 Pandemic) की वजह से इन्हें बंद हुए एक साल होने को है. कुछ राज्यों में उच्च कक्षाएं शुरू कर दी गई हैं. लेकिन अमूमन एक साल से सभी स्कूल बंद हैं. इस दौरान शिक्षा के क्षेत्र में दो अलग अलग तरह के प्रयास किए गए हैं. एक है ऑनलाइन शिक्षा (Online Classes) और दूसरी हैं मोहल्लों में खुले में कक्षाएं. लेकिन हकीकत यह है कि इनमें से कोई भी बंद स्कूलों की भरपाई नहीं कर सकी जो अब एक बहुत ही बड़ी चुनौती बन गई है.

ऑनलाइन स्कूल कितने असरदार

ऑनलाइन स्कूल मूलतः अप्रभावी रही है. ऐसा इसलिए नहीं है कि बहुत से हमारे बच्चों के पास ऑनलाइन शिक्षा के स्रोत नहीं हैं, बल्कि ऐसा ज्यादा इसलिए हैं कि बच्चों की शिक्षा और उन्हें सिखाने की प्रक्रिया ही ऐसी है जिसमें शिक्षकों और छात्रों को सामाजिक अंतरक्रियाओं के साथ पास पास रहने की जरूरत है. यह ऑनलाइन शिक्षा की अक्षमता के बारे में विस्तार से जाने की जगह नही है. इस महामारी के दौरान जो ऑनलाइन शिक्षा को लेकर उत्साह पैदा हुआ था, वह तेजी से हवा हो गया है. इस अक्षमता ने घर के साथ ही स्कूली शिक्षा में शामिल सभी लोगों को प्रभावित किया है.

मोहल्ला कक्षा का प्रयास
कई राज्यों ने बच्चों में शैक्षिक व्यस्तता के महत्व को जारी रखने और ऑनलाइन कक्षाओं की सीमाओं को पहचाना है. इसे देखते हुए उन्होंने बच्चों के पड़ोस में ही कक्षा लगाने की वस्वस्था करने का प्रयास कर एक अच्छा काम किया है. बहुत सारे सरकारी स्कूल शिक्षकों ने यह अपने समर्पण से संभव किया. ऐसी मोहल्ला कक्षाएं बच्चों में किसी तरह के संक्रमण का जोखिम भी नहीं बढ़ा रहीं थीं क्योंकि बच्चों अपने केवल आपस पड़ोस में ही मेलजोल कर रहे थे.

कितनी सफलता

राज्य सरकारों, और इन शिक्षकों के सर्वश्रेष्ठ प्रयासों और ऐसा करने के दौरान तमाम मुश्किलो के बाद भी सबसे अच्छे से आयोजित की गई मोल्ला कक्षाएं एक हफ्ते में 4-6 घंटे से ज्यादा की नहीं थीं. जबकि स्कूलों में पढ़ाई 6-8 घंटे की होती है. ध्यान देने की बात यह भी है कि ये मोहल्ला कक्षाएं पिछले साल नवंबर दिसंबर में ही शुरू हो सकीं. वावजूद इसके इन कक्षाओं ने शिक्षकों और छात्रों के बीच एक आवश्यक व्यस्तता रखने में  सफलता पाई लेकिन शिक्षा के नजरिए से यह काफी नहीं थी.



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साल भर तक बच्चों का स्कूल (School) ना लगने से वे उनकी पिछली कक्षा के ज्ञान पर भी असर हुआ है.


क्या रहा नतीजा

इस सब का नतीजा यह रहा कि बहुत से भारतीय बच्चों, सिवाय उन कम ब्चों के जिनके पास पर्याप्त साधन और घर से पूरा सहयोग था, साल भर सीखने से वंचित रह गए. यह नुकसान दो तरह का था. पहला यह कि सत्र 2020-21 में उन्हें क्या सीखना था. दूसरा यह कि जब मार्च 2020 में स्कूल बंद हुए उस समय तक जो वे जानते थे वे सब भूल गए.  पहला नुकसान जाहिर है यदि चौथी कक्षा की छात्रा साल भर कक्षा में नहीं गई हो, तो वह कक्षा 4 के लक्ष्य हासिल नहीं कर सकी होगी.

यह सबसे बड़ा नुकसान

दूसरे तरह के नुकासन को, जिसे हम शैक्षणिक प्रतिगमन (academic regression) कह सकते हैं, उतना स्पष्ट नहीं है. लेकिन ध्यान देने पर यह हैरान नहीं करता है.  मिसाल के तौर पर इसी चौथी कक्षा की छात्रा को ही लें जो साल भर कक्षा नहीं जा सकी, वह सबकुछ याद नहीं रख सकी होगी जो भी उसने तीसरी कक्षा में सीखा था. इस तरह से अब वह सीखा हुआ बहुत कुछ भूल चुकी है. इस तरह के शैक्षणिक प्रतिगमन पर पहले बहुत शोध हो चुका है. इन शोधों में गर्मी की छुट्टियों में  बच्चों का सीखा हुआ भूलना प्रायः समर स्लाइड कहता है.

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एक बहुत बड़ी चुनौती

इसलिए अब जब हमारे स्कूल फिर से खुलने जा रहे हैं हमारे सामने एक बड़ी चुनौती है. हमें उसकी पूर्ति भी करनी होगी जो हमें पिछले साल पढ़ाना चाहिए था और हमें  साथ में उसकी पूर्ति भी करनी होगी जो बच्चे पिछली कक्षाओं का पढ़ा भूल चुके हैं.

बच्चों पर खास शोध

शैक्षणिक प्रतिगमन के प्रकार और सीमा आंकलन करने के लिए हमने देश के 44 जिलों में एक शोध किया. इसमें 16067 बच्चों के नमूने का सख्त आंकलन किया. इसमें हमने दो हजार से ज्यादा शिक्षकों और हमारी टीम के 400 सदस्यों की मदद ली. इस शोध में  हमने यह जानने का प्रयास किया कि जो वे मार्च 2020 में जानते थे उसमें से वे क्या भुला बैठे हैं. इससे हमें चौंकाने वाले तो नहीं लेकिन चेतावनी देने वाले निष्कर्ष मिले.

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बच्चों (Children) को सबसे ज्यादा नुकसान गणित और भाषा में हुआ है.


क्या पता चला

80 प्रतिशत से ज्यादा बच्चे गणित की मूलभूत क्षमताएं भूल गए थे और 92 प्रतिशत से ज्यादा बच्चों ने भाषाओं की मूल क्षमताएं खो दी थीं जो वे मार्च 2020 में जानते थे. मूलभूत क्षमताओं (Foundational abilities) से तात्पर्य उन क्षमताओं से है जो आगे सीखने के लिए बहुत महत्व रखती हैं. मिसाल के तौर पर गणित में इसमें जोड़ना और घटना शामिल है, तो भाषओं में एक अनुच्छेद पढ़ने की क्षमता के साथ उसका सार बताने की क्षमता है.

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तो क्या करना होगा

यह बहुत जरूरी है कि हमारे पास इस शैक्षणिक प्रतिगमन और शिक्षा में हुए नुकसान से निपचने के लिए एक राष्ट्रव्यापी प्रतिक्रिया हो. इसके लिए सबसे पहले हमें इस विशाल चुनौती को पहचान कर उसे स्वीकरना होगा. चूंकि यह कोविड-19 महामारी की वजह से हुआ है और इसमें किसी तरह की तरह लापरवाही या कमजोरी की भूमिका नहीं है तो इस मामले में सुरक्षात्मक होने की जरूरत नहीं है. अच्छी बात यह है कि कुछ राज्य इस मुद्दे पर खुले मन से आगे बढ़ रहे हैं.

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स्कूल (School) ने जाने से सबसे अधिक असर छोटी कक्षाओं के बच्चों पर पड़ा है.


इन कदमों की भी जरूरत

इस गंभीर मुद्दे पर शिक्षकों को पढ़ाई में हुए नुकसान की भरपाई के लिए पर्याप्त समय देना होगा. इलके लिए  वर्तमान सत्र को साल 2021 तक बढ़ाना होगा. गर्मी की छुट्टियां रद्द करनी होंगी. पाठ्यक्रम फिर से बनाना होगा. कम जरूरी विषय वस्तु हटानी होगी जबकि कुछ को अगले साल के सत्र में शामिल करना होगा. पर्याप्त अधिक समय दिए शिक्षकों और छात्रों से ही इससे निपटने की उम्मीद करना अव्यवहारिक ही होगा. अतिरक्त समय में भी शिक्षकों और बच्चों को जरूरी सहायता और समर्थन की जरूरत होगी. जैसे की शिक्षकों के लिए प्रशिक्षण और उपकरण जिससे वे हर छात्र के शैक्षणिक प्रतिगमन के स्तर के जल्दी से समझ सकें.

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यदि हमने 26 करोड़ छात्रों के इस नुकसान की भरपाई के लिए कदम नहीं उठाए, यह नुकसान केवल बढ़ता ही जाएगा. इससे हमारे समाज में बच्चों के बीच असमानता की खाई और भी ज्यादा बढ़ जाएगी. इस समस्या से निपटने के लिए देश को राष्ट्रव्यापी मिशन की जरूरत है.

(अनुराग बेहर अजीम प्रेमजी फाउंडेशन के सीईओ के साथ ही विप्रो लिमिटेड के चीफ सस्टेनेबिलिटी ऑफिर और अजिम प्रेमजी यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर भी हैं. ये लेख हमारी सहयोगी वेबसाइट फर्स्ट पोस्ट से लिया गया है)
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