भारत में आज पहली बार लॉन्च हुआ था दोबारा उपयोग होने वाला स्वदेशी प्रक्षेपण यान

इसरो के RLV-TD का सफल परीक्षण एक बहुत बड़ी उपलब्धि माना गया था. (तस्वीर: ISRO)

23 मई 2016 को भारत (India) के इसरो (ISRO)ने पहली बार स्वदेश (Indigenous) में ही विकसित दोबारा उपयोग में लाए जा सकने वाले प्रक्षेपण यान RLV_TD का प्रक्षेपण किया था.

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    भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने दुनिया में अंतरिक्ष अनुसंधान (Space Research) के लिहाज से बहुत ही खाज जगह बनाई है. पिछले कई दशकों ने इसरो ने ऐसी उपलब्धियां हासिल की है जिसमें वह दुनिया के उन चुनिंदा देशों में शामिल हो सका है जो अंतरिक्ष अनुसंधान में सबसे आगे हैं. इसी कड़ी में 23 मई का दिन इसरो इतिहास में विशेष स्थान रखता है. साल 2016 में इसरो ने पहली बार स्वदेश में ही विकसित दोबारा उपयोग किया जा सकने वाला प्रक्षेपण यान (RLV-TD) को लॉन्च किया था.

    क्या लक्ष्य था इसका
    आरएलव-टीडी यानि रीयूजेबल लॉन्च व्हीकल टेक्नोलॉजी डेमोन्स्ट्रेशन प्रोग्राम का मुख्य लक्ष्य पृथ्वी की कक्षा में उपग्रह पहुंचाना और फिर वायुमंडल में दोबारा प्रवेश करना था. इस स्पेस शटल की लंबाई 6.5 मीटर और वजन 1.75 टन था. इस कार्यक्रम में हाइपर सॉनिक रॉकेट के साथ हवा की सांस लेने वाले इंजन और एक रीयूजेबल लॉन्च व्हीकल शामिल था.

    2006 से चल रहे थे इसके परीक्षण
    इस कार्यक्रम के इंजन का परीक्षण साल 2006 से चल रहा था. साल 2012 में इसे RLV-TD नाम मिला था. इसके उद्देश्य कई तरह के पहलुओं की जांच करना था जिसमें हाइपरसॉनिक उड़ान, ऑटोलैंड, शक्तियुक्त क्रूज उड़ान आदि था. इसमें हाइपरसॉनिक उड़ान प्रयोग (HEX), लैंडिंग प्रयोग (LEX), वापसी उड़ान प्रयोग (REX), स्क्रैमजैट प्रपल्शन प्रयोग (SPEX) की योजना शामिल थी. जिसमें 2016 की 23 मई की तारीख को एचईएक्स प्रयोग किया गया जिसमें पूरी सफलता मिली.

    पंखों का उपयोग
    RLV-TD को 750 इंजीनियर्स की टीम ने विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर, नेशनल एरोनॉटिकल लैबोरेटरी और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस ने मिलकर विकसित किया था. इसके पंखों की चौड़ाई 3.5 मीटर थी और यह पहली बार था जब इसरो ने किसी पंख युक्त यान का उपयोग किया था. भारत फिलहाल दुनिया में अकेला देश है, जो अंतरिक्ष में पंखों वाला यान भेज रहा है. अमेरिका ने अपने स्पेस शटल को 2011 में बंद कर दिया था. वहं रूस ने सिर्फ 1989 में एक बार ऐसा अंतरिक्ष में अपना यान भेजा था.

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    RLV-TD को तैयार करने में इसरो के 750 इंजिनियरों ने काम किया था. (तस्वीर: ISRO)


    लागत में फायदा
    इस अभियान की उस समय कुल लागत 95 करोड़ रुपये थी. वैसे एक अंतरिक्ष यान की लॉन्चिंग में 30 अरब रुपये का खर्च आता है. लेकिन इसरो ने इस यान को 1 अरब रुपये से भी कम में अपना यान बना लिया है. उस समय भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए ये काफी अहम अभियान माना गया था. इस लॉन्च की मदद से इसरो को पृथ्वी की कक्षाओं में सैटेलाइट्स को स्थापित करने के लिए मध्यम से भारी वजन के रॉकेटों को बनाने और और इस्तेमाल पर होने वाले खर्च को कम करने में मदद भी मिली थी.

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    वायुमंडल में पुनःप्रवेश
    यह यान आवाज की गति से 5 गुना तेज स्पीड से अंतरिक्ष में छोड़ा गया था. आमतौर पर अंतरिक्ष यान धरती पर लौटते हुए वातावरण के दबाव की वजह से पूरी तरह जल जाते हैं. लेकिन भारतीय वैज्ञानिकों ने इस यान में सिरेमिक टाइल्स लगाए, जिनकी वजह से ये स्पेस शटल पूरी तरह से सुरक्षित रहा और बंगाल की खाड़ी में गिर सका.

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    RLV-TD अभीयान अपनी सभी अपेक्षाओं पर खरा उतरा था. (तस्वीर: ISRO)


    खाड़ी में गिरना नहीं था योजना का हिस्सा
    इस अभियान की सबसे खास बात यह रही कि स्प्लैशडाउन से पहले यानि कि यान के बंगाल की खाड़ी में गिरने यह यान पूरी तरह से निगरानी और नियंत्रण में था और जहां इसके गिरने की उम्मीद थी वह वहीं गिरा. इसके स्प्लैशडाउन यानि खाड़ी में गिरने की प्रक्रिया को नियंत्रित करना योजना का हिस्सा नहीं था.

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    हाल ही में इसरो ने फिर से रीयूजेबल रॉकेट फिर से विकसित करने की योजना पर काम करने जा रहा है. इसरो की इस दशक की योजनाओं में से एक योजना यह भी है. फिलहाल अमेरिकी कंपनी स्पेसएक्स ने रीयूजेबल रॉकेट का संपूर्ण सफल परीक्षण किया है. इसरो ने निजी क्षेत्र के इन्ही प्रयासों को देखते हुए इस तरह की घोषणा की है.