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आज है 70 साल पुराने नेहरू के सपनों के इस शहर का हैप्पी बर्थडे!

News18Hindi
Updated: October 17, 2019, 8:23 PM IST
आज है 70 साल पुराने नेहरू के सपनों के इस शहर का हैप्पी बर्थडे!
फरीदाबाद के संघर्ष को देखते हुए ही इस किताब का नाम ये रखा गया था. (फोटो एलसी जैन की किताब से साभार)

भारत-पाक विभाजन (India-Pakistan partition) के बाद पाकिस्तान से आए 50 हजार हिंदू शरणार्थियों (Hindu Refugee) के लिए बसाया गया था नया फरीदाबाद (Faridabad). इसे बसाने में जवाहरलाल नेहरू (jawaharlal nehru), डॉ. राजेंद्र प्रसाद (Dr. Rajendra Prasad) और सरहदी गांधी (Frontier gandhi) का था सबसे बड़ा योगदान

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  • Last Updated: October 17, 2019, 8:23 PM IST
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नई दिल्ली. जब देश का बंटवारा (partition) हुआ तो पाकिस्तान (Pakistan) से लाखों लोग भारत (India) आए. अकेले 50 हजार लोग तो इसी शहर में बसाए गए थे. इसे देश का सबसे बड़ा रिफ्यूजी कैंप (Refugee Camp) भी कहा गया था. इतना ही नहीं पाकिस्तान से जान बचाकर आने के बाद उन्हें बसाने के लिए भी लंबी लड़ाई लड़ी गई. तब कहीं जाकर नया फरीदाबाद (Faridabad) आबाद हुआ था. इसे बसाने में सबसे बड़ी भूमिका पंडित जवाहरलाल नेहरू (Jawaharlal nehru), डॉ. राजेंद्र प्रसाद (Dr. Rajendra Prasad) और सरहदी गांधी (Frontier gandhi) कहे जाने वाले खान अब्दुल गफ्फार खान यानी बादशाह खान की थी. पाकिस्तान से आए हिंदुओं के लिए 17 अक्टूबर 1949 को यह शहर बसना शुरू हुआ. आज इसका 70वां जन्मदिन है.

पाक के इन इलाकों से आए थे रिफ्यूजी
जानकार बताते हैं कि बंटवारे के वक्त जो रिफ्यूजी आए थे वो पाकिस्तान के पेशावर, हजारा, मर्दाना, कोहाट, बन्नू एवं डेरा इस्माइल खान आदि इलाकों से अपना सब कुछ छोड़कर आए थे. उस समय पुराना फरीदाबाद मेहंदी के बागान के रूप में मशहूर हुआ करता था. पुराने शहर को जहांगीर के खजांची शेख फरीद ने बसाया और नए को आजादी के बाद आबाद किया गया.

पहले अलवर में बसाने की थी योजना

दस्तावेजों और शहर में बसे पुराने जानकारों के मुताबिक तो पहले पाक से आए इन रिफ्यूजियों को राजस्थान के अलवर या भरतपुर में बसाने की योजना थी. लेकिन पहले से ही लुटे-पिटे लोग रेगिस्तान में क्या करते. जिंदगी गुजर करने को हाथ में कुछ था नहीं. और जो भी करना था नए सिरे से करना था. यह तर्क देते हुए रिफ्यूजियों ने अलवर या भरतपुर जाने से इनकार कर दिया. बादशाह खान के नेतृत्व में यह लड़ाई लड़ी गई कि शरणार्थियों को दिल्ली के आसपास कहीं बसाया जाए. उनके साथ सुखराम सालार और सरदार गुरबचन सिंह ने भी लंबी लड़ाई लड़ी. नारा लगाया गया- नहीं जाना सरकार अलवर नहीं जाना.

पहला शहर है जहां एक साथ बसाए गए 50 हजार लोग
स्वतंत्रता सेनानी एवं योजना आयोग के सदस्य रहे एलसी जैन ने फरीदाबाद के बसने पर एक किताब भी लिखी है. इस किताब का नाम है 'द सिटी ऑफ होप'. किताब का ये नाम रखने के पीछे एलसी जैन का तर्क था कि यहां बसने वाले लोग खाली हाथ आए थे. लेकिन आज जो फरीदाबाद है वो सबके सामने है. उनके जज्बे और जिजीविषा को देखते हुए ही ये नाम रखा गया था.
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नए फरीदाबाद पर रिसर्च कर चुकीं डॉ. रचना मेहरा के मुताबिक फरीदाबाद देश में एकमात्र ऐसा उदाहरण है जहां बाहर से आए हुए 50 हजार लोगों को एक साथ बसाया गया हो. इसके बाद तो फरीदाबाद में दूसरे लोग आकर बसते रहे. ये भी एक बड़ी बात है कि यहां बसने वाले लोग आए तो खाली हाथ थे, लेकिन आज ये शहर हजारों परिवारों की झोली भर रहा है.

4700 एकड़ में बसा था फरीदाबाद
फरीदाबाद निवासी विश्वबंधु शर्मा के पूर्वज इस शहर को बसाने वालों में शामिल थे. वो बताते हैं कि सही मायनों में तो इस शहर को बसाने में पंडित जवाहरलाल नेहरू, देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद और बादशाह खान का बड़ा योगदान रहा है. ये उनके सपनों का शहर है. उस वक्त इस शहर के लिए 4700 एकड़ जमीन अधिग्रहित की गई थी. नेहरू जी ने जर्मन आर्किटेक्ट ओटो एच. कोनिंग्जबर्गर से इसका नक्शा तैयार करवाया था.

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First published: October 17, 2019, 1:46 PM IST
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