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क्यों बदल रही हैं मिलिट्री की वो धुन जो हम सुनते आ रहे हैं हमेशा से

भारतीय सेना (Indian Army) में बजने वाली पुरानी धुनें अब सुनाई नहीं देना बंद होने वाली हैं. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Reddees/shutterstock)

भारतीय सेना (Indian Army) में अंग्रेजों के जमाने चली आ रही कई परंपराओं (Traditions) को खत्म करने या बदलने पर मंथन चल रहा है इसमें कई बैंड धुनें (Band Tunes) भी शामिल हैं.

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    भारतीय सेना (Indian Army) अपनी बहुत सारी परंपराओं में बदलाव करने का विचार कर रही है. इसमें दशकों से बजाई जा रही है कुछ बैंड धुनें (Band Tunes), आजादी से पहले के सैन्य सम्मान (Military Awards), मेस की प्रक्रियाएं, और सैन्य अध्ययनों में भारतीय युद्ध नायकों पर ज्यादा जोर देना शामिल है.यह सब भारतीय सशस्त्र बलों में भारतीयकरण की प्रक्रियाओं के तहत करने की तैयारी है

    बहुत सी धुन अंग्रेजों के जमाने की
    फिलहाल भारतीय सेना में बहुत सारी बैंड धुनें अंग्रेजों के जमाने की हैं. इनमें से तो कई धनें लंबे समय से परंपरा बन गई हैं और खास मौकों पर ही बजाई जाती हैं. ऑल्ड लैंग सिने सभी परेड में बजाई जाती है और अबाइड विद मी सभी रिट्रीट समारोह में बजाई जाने वाली ऐसी ही धुनें हैं.

    पहले से चल रही है पड़ताल
    यह फैसला अचानक ही लिया जाने वाला फैसला नहीं है. द प्रिंट की रिपोर्ट के मुताबिक रक्षा सूत्रों का कहना है कि इस बात की पड़ताल पहले से चल रही है कि क्या कुछ धुनों को वाजिब भारतीय धुनों से बदला जा सकता है या नहीं और वे उसी तरह के संदेश देती रहें. सूत्रों का कहना है कि इनमें से कुछ धुनों की तलाश तो शुरू भी हो चुकी है और अगले साल भारत की  आजादी की 75 वीं सालगिरह तक इन्हें बदल भी जा सकता है.

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    पिछले कुछ सालों से भारतीय सेना (Indian Army) कें स्वदेशीकरण पर जोर दिया जा रहा है. (फाइल फोटो)


    पुराने सैन्य सम्मान और अवार्ड
    चर्चाएं इस बात की हो रही हैं क्या आजादी के पहले के युद्ध सम्मान को बंद करना सही होगा या नहीं जो युद्ध के दौरान यूनिट्स को असाधारण साहस का परिचय देने के लिए दिए जाते थे. इनमें से एक अहम परंपरा सशस्त्र बलों द्वारा दलों की बहादुरी का उत्सव मानना है और इन्हें लड़ाई के सम्मान दिवस के तौर पर मनाया जाता है.  इनमें बहुत सारे सम्मान ब्रिटिश इंडियन आर्मी की यूनिट को दिए जाते थे जो स्थानीय भारतीय राजा के खिलाफ लड़ाई में बहादुरी दिखाती थीं.

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    भोजनगृह की परंपराएं
    सूत्रों का कहना है कि कुछ अंग्रेजों के जमान क मेस की प्रक्रियाएं तो आजादी के बाद से बदल दी गई हैं. लेकिन अब बहुत सी प्रक्रियाओं या परंपराओं की फिर से पड़ताल की जा रही है कि क्या वाकई कई परंपराओं या प्रक्रियाओं बदलाव करने की जरूरत है और ये किस तरह से ये बदलाव किए जा सकते हैं.

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    भारतीय सेना (Indian Army) में बहुत सी परंपराएं अंग्रेजों के शासन काल से चली आ रही हैं.


    सैन्य अध्ययनों में
    देश में ज्यादातर सैन्य अध्यननों में सुन जू के लेखन का उल्लेख मिलता है जिन्होंने पुरानी चीनी सैन्य ग्रंथ आर्ट ऑफ वॉर लिखा है. इसके अलावा ब्रिटिश रणनीतिकार लिडल हार्ट और जर्मन जनरल क्लॉजविट्ज को भी संदर्भित किया जाता है. लेकिन आधुनिक समय के स्वदेशी ग्रंथ जैसे की कौटिल्य के अर्थशास्त्र के कम उल्लेख हैं. इन्हें रणनीतिक अध्ययनों में अब ज्यादा जोर दिया जाएगा.

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    भारतीयकरण केवल उपकरण और हथियारों तक नहीं
    भारतीय इतिहास में कई योद्धा ऐसे हुए हैं जिन्होंने अपने युद्ध कौशल की मिसाल कायम की है शिवाजी और महाराणा प्रताप की गोरिल्ला तकनीक और रोजा राज चोला-1 नौसैन्य युद्ध कौशल इसके शानदार उदाहरण हैं. यह सारी कवायद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राष्ट्रीय सुरक्षा प्रणाली के भारतीयकरण पर जोर देने के बाद से हो रही है. इसमें उपकरण और हथियार के देश में उत्पादन ही नहीं बल्कि विचारधारा, प्रकियाएं और परंपराएं भी शामिल हैं.