भारतीय वैज्ञानिकों का दावा- ईजाद की शुरुआती कैंसर पकड़ने वाली तकनीक

वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि इस खोज से 25 तरह के कैंसर (Cancer) का पता चल सकेगा. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि इस खोज से 25 तरह के कैंसर (Cancer) का पता चल सकेगा. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

भारतीय वैज्ञानिकों (Indian Scientists) की टीम ने दावा किया है कि एक बड़ी खोज के तहत उन्होंने ऐसी तकनीक ईजाद कर ली है जिससे एक ब्लड टेस्ट (Blood Test) के जरिए कैंसर (Cancer) के शुरुआती चरण का पता चल सकेगा.

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भारतीय वैज्ञानिकों (Indian Scientisits) की एक टीम का कहना है कि उन्होंने कैंसर (Cancer) के शुरुआती निदान में उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल की है. टीम ने दावा किया है कि उनकी खोज कोशिका जीवविज्ञान के विवादित हिस्से से संबंधित है. अगर इस खोज की वैधता शुरुआती परीक्षणों में प्रमाणित हो जाती है तो इस खोज से बनी खून की जांच (Blood Test) तकनीक बाजार के अरबों डॉलर के सालाना कारोबार पर कब्जा कर सकती है.

सधारण सी लेकिन कारगर जांच

इस खोज से कैंसर के शुरुआती चरण में ही बीमारी का एक साधारण सी खून की जांच से पता चल जाएगा जिसकी कारगरता करीब 100 प्रतिशत की है. अभी इसे केवल एक हजार लोगों पर क्लीनिकल अघ्ययन हुआ है यह स्टेम सेल रीव्यू एंड रिपोर्ट्स नामके जर्नल में में प्रकाशित हुआ है जो हाल ही में ऑनलाइन उपलब्ध हुआ है.

25 तरह के कैंसर की पहचान
इस खोज की सबसे खास बात यह है कि यह 25 अलग-अलग तरह के कैंसर की पहचान कर सकती है. कई लिहाज में तो यह ट्यूमर के विकसित होने से पहले ही कैंसर की पहचान कर सकती है. कैंसर के इलाज में सबसेअहम बात यही होती है कि यह जितना देर से पता चलता है कि मरीज के मरने की संभावना उतनी ही ज्यादा होती है.

किसने विकसित किया है इसे

यह टेस्ट HrC कहलाता है जिसे मंबई की बायोटेक्नोलॉजी फर्म एपीजेनेरस बायोटेक्नोलॉजी प्राइवेट लिमेटेड और सिंगापुर की जार लैब प्राइवेट लिमेटेड ने मिलकर विकसित किया है. मुंबई के नैनोटेक वैज्ञानिक विनय कुमार त्रिपाठी और उनके परिवार की इन कंपनिओं में बड़ी हिस्सेदारी  है जार लैब के प्रमुख कार्यकारी आशीष त्रिपाठी का कहना है कि यह कैंसर के लिए दुनिया का पहला पूर्वाभासी टेस्ट है.



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यह एक खून की जांच (Blood Test) होगी जो साल में एक बार करवानी होगी. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

साल में एक ही बार टेस्ट की जरूरत

इससे यह भी पता चल सकता है कि भविष्य में व्यक्ति को कैंसर होने का कितना खतरा है. कंपनी ऐसी दुनिया की कल्पना कर रही है जहां हर व्यक्ति को साल में केवल एक ही बार HrC टेस्ट कराना होगा और स्टेज1 या उससे पहले ही कैंसर का पता लगाया जा सकेगा. HrC  टेस्ट का नाम आशीष के दामाद और मुंबई पुलिस के पूर्व वरिष्ठ अफसर हिमाशू रॉय के नाम पर रखा गया है जिन्हों ने कैंसर जूझते हुए 2018 में आत्महत्या कर ली थी.

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बड़े पैमाने पर इसकी जरूरत

इसकी टेस्ट किट इस साल सितंबर अक्टूबर में भारतीय बाजार में आने की संभावना है. इसके लिए नियामक अनुमति हासिल करने और लैब का नेटवर्क स्थापित करने पर काम चल रहा है.  पहली लैब मुंबई में बनेगी. अमेरिकन कैंसर सोसाइटी के मुताबिक दुनिया में हर छह मौतों में एक कैंसर से होती है. 2017 में एक करोड़ 70 लाख लोगों को कैंसर हुआ था. वहीं नेशनल इंस्टीट्यूटऑफ कैंसर प्रिवेंसशन एंड रिसर्च नोएडा का अनुमान है कि भारत में 22 लाख से ज्यादा कैंसर मरीज हैं और हर साल 11 लाख और जुड़ जाते हैं.

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बड़ी गेमचेंजर साबित होगी तकनीक

दुनिया भर के दवा और चिकित्सकीय समुदाय के साथ निवेशक इसके ट्रायल केनतीजों का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं कई विशेषज्ञों का मानना है कि साबित होने पर यह एक बहुत बड़ी खोज साबित होगी. कैंसर के शुरुआती चरण में पहचान करने वाला कोई भी टेस्ट गेमचेंजर साबित होगा. इस टेस्ट में स्टेम सेल तकनीक काउपयोग किया गया है. स्टेम सेल शरीर की वे कोशिकाएं होती हैं जिनमें खुद की प्रति बनाने की क्षमता होती है और वे दूसरी तरह की कोशिकाओं में बदल सकती है. जैसे बोन मैरो में स्टेम सेल लाल और सफेद रक्त कोशिकाएं और प्लेटलेट्स भी बना सकती हैं.

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स्टेम सेल पर आधारित कैंसर (Cancer) के लिए यह खोज दुनिया में तहलका मचा देगी. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)

स्टेम कोशिकाओं से जांच

ऐसी स्टेम कोशिकाओं की बहुत ज्यादा अहमियत होती है. त्रिपाठी और उनकी टीम की इसी तरह की कोशिका जिसे वेरी स्मॉल एंब्रियोनिक लाइक स्टेम सेल (VSEL) कहते हैं. इसी के आधार पर  टीम ने शरीर में दौड़ने वाले खून से संबंधित एक ऐसी स्केल का निर्माण किया जो 104 कैंसर मरीजों के समूह के आधार पर थी. इसके बाद शोधकर्ताओं ने एक हजार लोगों पर परीक्षण किया जिसमें से आधे कैंसर मरीज थे. परीक्षण पूरी तरह से सफल रहा. यह टेस्ट जेनेटिक सिग्नेचर की पहचान कर कैंसर का पता लगता है.

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VSEL जिनसे तुलना पर यह टेस्ट आधारित है. उन्हें ही अलग करना आसान नहीं है क्योंकि ये बहुत ही छोटी होती हैं. VSEL का ही अस्तित्व विवादित है और बहुत कम लोग इसे अलग करने का दावा कर सके हैं. इस बहस के बीच कंपनी अपने टेस्ट को बाजार में लाने के लिए सभी जरूरी काम कर रही है.

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