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जब भारत के बाहर लोग केवल गांधी को जानते थे या ध्यानचंद को

Sanjay Srivastava | News18Hindi
Updated: December 3, 2018, 10:23 AM IST
जब भारत के बाहर लोग केवल गांधी को जानते थे या ध्यानचंद को
हॉकी खेलते ध्यानचंद

हॉकी के महान खिलाड़ी मेजर ध्यान चंद की पुण्यतिथि पर पढ़िए उनकी ज़िंदगी के दिलचस्प किस्से.

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  • Last Updated: December 3, 2018, 10:23 AM IST
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आजादी से पहले देश की दो ही शख्सियतें विदेशों में सबसे ज्यादा लोकप्रिय थीं. भारत का नाम लेते ही लोग हमारे देश को इन दो महान शख्सियतों से जोड़कर देखते थे. उनमें से एक थे महात्मा गांधी और दूसरे ध्यानचंद. महात्मा गांधी देश की आजादी के आंदोलन में हमारे सबसे बड़े नेता थे और उनकी अंहिसा की अवधारणा दुनियाभर में प्रेरणा बन रही थी तो ध्यानचंद की हॉकी के चर्चे हर ओर फैले हुए थे.

चाहे जर्मनी हो या जापान, आस्ट्रेलिया हो या हालैंड-हर कहीं लोग ध्यानचंद को जरूर जानते थे. हिटलर से लेकर महारानी एलिजाबेथ तक उनकी हॉकी की जादूगरी की कायल थीं. सही बात ये भी है कि अपने श्रेष्ठ होने के गर्व में चूर इंग्लैंड और हिटलर के जर्मनी का दर्प किसी ने तोड़ा था तो वह अपने ध्यानचंद ही थे.

कैसे अंग्रेजों को किया पानी-पानी
पहले इंग्लैंड के वाकये का जिक्र करते हैं. भारतीय टीम को वर्ष 1928 में पहला ओलंपिक खेलने एम्सटर्डम रवाना होना था. टीम पानी के जहाज पर सवार हुई. लेकिन एम्सटर्डम जाने से पहले टीम इंग्लैंड में रुकी, जहां उसने ब्रिटेन की टीम को इतनी बुरी तरह हराया कि अंग्रेज पानी पानी हो गए. उनका चेहरा देखने लायक था, ज्यादा रुसवाई नहीं हो, इसके चलते उन्होंने अपनी टीम को ओलंपिक में ही नहीं भेजा. तो इस तरह भारत पर तब शासन कर रहे अंग्रेजों के सामने ध्यानचंद ने भारतीय गर्व की छाप छोड़ी. सारे देशवासियों को अभिमान के अहसास से भर दिया.



हिटलर के घमंड को भी किया चूर
इसी तरह का वाकया वर्ष 1936 के बर्लिन ओलंपिक का है. तब ध्यानचंद भारतीय हॉकी टीम के कप्तान थे. जर्मनी पर एडोल्फ हिटलर का शासन था. उसे लगता था कि पूरी दुनिया में जर्मनी से बेहतर न तो कोई देश है और जर्मनों सरीखी कोई नस्ल. 15 अगस्त 1936 को फाइनल में भारत ने जर्मनी को 8-1 से हराया. हिटलर इस मैच में जर्मनी को जीतते हुए देखने आया था. लेकिन जब उसने अपनी टीम को हारते हुए देखा तो बीच में उठकर चला गया.

मैच से पहले वाली रात को बर्लिन में जमकर बारिश हुई थी, इसी वजह से मैदान गीला था. भारतीय टीम के पास स्पाइक वाले जूतों की सुविधा नहीं थी और सपाट तलवे वाले रबड़ के जूते लगातार फिसल रहे थे. इसके चलते ध्यानचंद ने हाफ टाइम के बाद जूते उतारकर नंगे पांव खेलना शुरू किया. उनका खेल इस तरह का था कि जर्मनी की टीम असहाय सी हो गई थी. भारतीय टीम ने आसानी से स्वर्ण पदक पर कब्जा जमा लिया.



जब फ्यूरर का प्रस्ताव ठुकराया
अगले दिन हिटलर ने भारतीय कप्तान ध्यानचंद को मिलने के लिए बुलाया. ध्यानचंद ने हिटलर की क्रूरता के कई किस्से-कहानी सुन रखे थे. इसलिए वो हिटलर का आमंत्रण पत्र देख चिंतित हो गए कि आखिर तानाशाह ने उन्हें क्यों बुलाया है. डरते-डरते हिटलर से मिलने पहुंचे.

लंच करते हुए हिटलर ने उनसे पूछा कि वह भारत में क्या करते हैं? ध्यानचंद ने बताया कि वह भारतीय सेना में मेजर हैं. हिटलर ने उनके सामने प्रस्ताव रखा कि वह जर्मनी आ जाएं और कहीं ज्यादा बड़े पद पर जर्मनी की सेना से जुड़ जाएं.पैसा जितना चाहें ले लें. ध्यानचंद ने विनम्रता से प्रस्ताव को ठुकरा दिया, क्योंकि उनके रग-रग में देशभक्ति समाई हुई थी. बाद में भी उनके सामने कई बार बहुत अच्छे प्रस्ताव विदेशों से आए लेकिन उन्होंने इसे ठुकराया.

सही बात ये है कि हॉकी के जादूगर ध्यानचंद केवल महान खिलाड़ी ही नहीं थे बल्कि गुलामी के दौर में भारतीय स्वाभिमान के भी प्रतीक थे. तब वह असल मायनों में विदेशों में भारतीय उत्कृष्टता के राजदूत बने.

ध्यान सिंह से ध्यान चंद
ध्यानचंद का असली नाम ध्यान सिंह था. उनके दूसरे हॉकी कोच पंकज गुप्ता उनकी खेल तकनीक से इस कदर प्रभावित थे कि उन्होंने उनका नाम ध्यान सिंह से ध्यानचंद कर दिया. उनका कहना था कि जिस तरह तुम चांद की रोशनी में अभ्यास करते हो, उसी तरह हॉकी का चांद बनकर चमकोगे, इसलिए तुम्हारा नाम ध्यानचंद रहेगा. उस तरह वह ध्यान सिंह से ध्यानचंद होकर विख्यात हुए.

सेना के पहले टूर्नामेंट में मैच
ध्यानचंद ने सोचा भी नहीं था कि हॉकी उनके जीवन की दिशा बदल देगी. दिल्ली में होने वाले सेना के वार्षिक टूर्नामेंट में खेलने के लिए उन्हें चुना गया. ये पहला बड़ा मैच था, जिसे आसानी से जीत लिया गया. उनके सैनिक अधिकारियों ने इस जीत पर गर्व व्यक्त किया. इस टूर्नामेंट के बाद सेंटर फारवर्ड की पोजिशन पर उनकी जगह मानो सुरक्षित हो गई. वर्ष 1922 से 1926 के बीच उन्होंने सेना के सीमित हॉकी टूर्नामेंटों में हिस्सा लिया.



उनकी इच्छा भारतीय सैनिक हॉकी टीम में शामिल होने की थी. लेकिन वो दो बातों को लेकर शंकित थे, एक तो वह नए नए भरती हुए थे दूसरे छोटी रैंक में. किंतु उन्हें ये भी विश्वास था कि यदि उनका खेल अच्छा है तो भविष्य में उनके साथ न्याय होगा और वह टीम में मजबूती से अपनी जगह बना पाएंगे. अंग्रेज सेना अधिकारियों ने हॉकी को निष्पक्ष बनाए रखा. ध्यानचंद की प्रतिभा के साथ उन्होंने पूरा न्याय किया.

यूं बने करिश्मे के प्रतीक
ये वर्ष 1925 की बात है. ध्यानचंद उन दिनों पंजाब इंडियन इंफ्रेंटी की ओर से हॉकी खेलते थे. एक प्रमुख टूर्नामेंट में यूपी (तत्कालीन नाम संयुक्त अवध प्रांत) के खिलाफ मैच था. यूपी की टीम 2-1 से जीत रही थी. खेल खत्म होने में केवल दो मिनट बचे थे. तब कमांडिंग अफसर ने ध्यानचंद को आवाज दी-आगे बढो जवान, आगे बढ़ो जवान, कुछ तो करो ध्यान.

ध्यान चंद ने वाकई कर दिखाया. अगले चार मिनट में तीन गोल करके उन्होंने अपनी टीम को विजयी बना दिया. इसी मैच के बाद ब्रिटिश प्रेस ने पहली बार उन्हें हॉकी का जादूगर कहा. इसके बाद तो उनके खेल का ग्राफ कुछ यूं ऊपर चढता गया कि वह भारतीय हॉकी में करिश्मा के प्रतीक बन गए.

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First published: December 3, 2018, 8:34 AM IST
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