भारत में आज पहली बार- जब पूर्वोत्तर में घुसकर आजाद हिंद फौज ने फहराया तिरंगा

रंगून में आजाद हिंद फौज की एक तस्वीर

रंगून में आजाद हिंद फौज की एक तस्वीर

19 March 1944 को पूर्वोत्तर में आजाद हिंद फौज (Indian National Army) भारत में प्रवेश किया और देश की आजाद जमीन पर अंग्रेजों से जमीन छीन कर पहली बार तिरंगा (Tricolour) फहराया गया था.

  • News18Hindi
  • Last Updated: March 19, 2021, 6:51 AM IST
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1944 का साल देश ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लिए उथल पुथल वाला साल था. लेकिन भारत (India) के लिए भी यह कई परिवर्तनों की नींव डालने वाला साल था. देश आजादी की ओर बढ़ रहा था तो वहीं नेताजी सुभाष चंद्र बोस (Subhash Chandra Bose) के नेतृत्व वाली आजाद हिंद फौज (Indian National Army) ने देश के पास आ गई थी. 19 मार्च को ही इस फौज ने अंग्रेजों से अपने देश की जमीन लड़ कर छीनते हुए उस पर तिरंगा (Tricolour) फहराने का गौरव हासिल किया था. इस युद्ध में यह अंग्रेजों से लड़ते हुए अपने देश की जमीन हासिल करने का पहले मौका था.

आजाद हिंद फौज को मिला था नेताजी का नेतृत्व

द्वितीय विश्व युद्ध को नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने एक मौके की तरह देखा और देश को अंग्रेजों से मुक्त कराने के लिए जापान से जा मिले जो उस युद्ध में अंग्रेजों का दुश्मन था. नेताजी ने जर्मनी जाकर हिटलर से हाथ मिलाया और उसके बाद सिंगापुर जाकर आजाद हिंद फौज की कमान संभाली. और जापानी सेना की मदद से पूर्व की ओर से भारत में प्रवेश करने का प्रयास किया.

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आजाद हिंद फौज के सिपाहियों ने पहली बार देश में 1944 को 19 मार्च के दिन झंडा फहराया दिया. कर्नल शौकत मलिक ने कुछ मणिपुरी और आजाद हिंद के साथियों की मदद से पूर्वोत्तर में देश की जमीन में प्रवेश किया और वहां राष्ट्रीय ध्वज फहराया था. कर्नल शौकत अली मलिक ने इस लड़ाई में आजाद हिंद फौज की बहादुर रेजिमेंट के नेतृत्व किया था. बाद में मोइरंग में 14 अप्रैल को कर्नल मलिक ने तिरंगा फहराने का गौरव हासिल किया.

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आजाद हिंद फौज (Indian National Army) को खत्म किया जा रहा था, लेकिन नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने आकर इसमें जान फूंकी थी. (तस्वीर: Wikimedia Commons)

फिर लौटने को मजबूर हुई फौज



मणिपुर और इंफाल की लड़ाई आजाद हिंद फौज के लिए बहुत खास रही, मोइरंग को  आजाद हिंद फौज का मुख्यालय बना दिया गया. लेकिन भारी बारिश ने आजाद हिंद फौज की मुश्किलें बढ़ा दीं. रसद आपूर्ति और संचार में बहुत दिक्कतों को सामना करना पड़ा. जंग का रुख पलट गया और आजाद हिंद फौज को जापानी सेना के साथ पीछे हटना पड़ा. इसके बाद अंग्रेजों का पलड़ा भारी ही होता गया.

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‘पहली बार’ का मतलब?

रोचक बात यह है कि 18 मार्च को तिरंगा फहराने की घटना कई लिहाज से पहली नहीं है. आजाद भारत की सरजमीं पर यह पहला तिरंगा नहीं माना जाता है क्योंकि इससे पहले नेताजी ने 30 दिसंबर पर 1943 को  अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में खुद अपनी सरकार के तले तिरंगा फहराया था. इसके बाद मोइरंग को 14 अप्रैल वाले दिन कर्नल शौकत मलिक के ध्वजारोहण को दूसरी घटना माना जाता है.

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19 मार्च 1944 को मणिपुर में यह तिरंगा (Tricolour) फहराया गया था. (फाइल फोटो)

किस तरह का था वह तिरंगा

लेकिन यह झंडा वह तिरंगा झंडा नहीं था जो आज हमारे देश की पहचान है. आज़ाद हिंद फ़ौज के इस झंडे में नारंगी, सफेद और हरे रंग की तीन पट्टियां थीं, लेकिन बीच की सफेद पट्टी बाकी दोनों से दोगुनी मोटी थी. और बीच की सफेद पट्टी पर एक उछलता बाघ दर्शाया गया. इसके अलावा पहली नारंगी पट्टी पर आज़ाद लिखा था और निचली हरी पट्टी पर हिन्द.

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लेकिन आजाद हिंद फौज के जवान 19 मार्च की तारीख की अहमियत नहीं भूले और देश आज भी 19 मार्च को न  केवल आजाद हिंद के देश में प्रवेश को बल्कि देश की सरजमीं पर अंग्रेजों से जीत कर पहली बार तिरंगा फहराने की तारीख को याद करता है.

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