भारत में आज ही के दिन हुई थी मुजफ्फरपुर की वो घटना, जानिए इसकी पूरी कहानी

खुदीराम बोस (Khudiram Bose) और प्रफुल्ल चाकी (Prafulla Chaki) की लोकप्रियता से इस घटना का महत्व पता चलता है. (फाइल फोटो)

खुदीराम बोस (Khudiram Bose) और प्रफुल्ल चाकी (Prafulla Chaki) की लोकप्रियता से इस घटना का महत्व पता चलता है. (फाइल फोटो)

खुदीराम बोस (Kudiram Bose) और प्रफुल्ल (Prafulla Chaki) चाकी ने मुजफ्फरपुर (Muzaffarpur) में किंग्सफोर्ड के मजिस्ट्रेट की हत्या करने के लिए बम फेंका था जिसकी चपेट में आकर दो बेगुनाह मारे गए थे.

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 30, 2021, 12:24 PM IST
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भारत की आजादी में क्रांतिकारियों का योगदान कम नहीं है. भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में कई ऐसी घटनाएं हैं जिनमें भारतीय क्रांतिकारियों के साहस की कहानी है. ऐसी ही एक घटना है मुजफ्फरपुर कांड जिसमें भारत के दो क्रांतिकारियों, खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी ने मजिस्ट्रेट पर बम फेंका था. उनका यह प्रयास सफल ना हो सका, लेकिन 30 अप्रैल 1908 की यह कहानी इतिहास में जगह दर्ज कराने में कामयाब हो गई.

एक जज को मारने के लिए विस्फोट

1857 में के विद्रोह के बाद अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ कोई भी बड़ी चुनौती नहीं दी गई थी. लेकिन अंग्रेजों का जुल्म कम नहीं हुआ था. अंग्रेजों प्रति आक्रोश का ही नतीजा था कि  30 अप्रैल 1908 के हुए एक बम धमाके ने अंग्रेजों हुकूमत को हिलाकर रख दिया था.  इसे अंजाम देने का काम खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी ने किया था. मुजफ्फुर क्लब के सामने दमनकारी जज किंग्सफोर्ड को मौत देने के लिए यह विस्फोट किया गया था.

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क्यों फेंका गया था बम

कोलकाता में चीफ प्रेसिडेंसी मजिस्ट्रेट किंग्सफोर्ड क्रांतिकारियो को अपमानित करने और उन्हें कठोर दंड देने के लिए कुख्यात हो गया था. क्रांतिकारियों ने किंग्सफोर्ड को जान से मारने का फैसला किया और उसे मारने की जिम्मेदारी प्रफुल्ल चाकी और खुदीराम बोस को सौंपी गई. लेकिन अंग्रेजों को किंग्सफोर्ड के प्रति जनता के आक्रोश की भनक लग चुकी थी. इसलिए उन्होंने उसे सेशन जज बनाकर मुजफ्फरपुर भेज दिया था.

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प्रफुल्ल चाकी (Prafulla Chaki) को भारत सरकार ने एक बड़े क्रांतिकारी का दर्जा दिया है. (तस्वीर: Wikimedia Commons)




क्या हुआ था उस दिन

बोस और चाकी भी किंग्सफोर्ड के पीछे पीछे  मुजफ्फरपुर पहुंच गए. वहां उन्होंने किंग्सफोर्ड को मारने की योजना बनाई और देखा कि जब किंग्सफोर्ड यूरोपियन क्लब से बाहर निकल आता है. दोनों ने इस मौके का फायदा उठाने का फैसला किया. 30 अप्रैल को  दोनों ने बग्घी पर बम फेंका लेकिन उस बग्घी में किंग्सफोर्ड नहीं बल्कि दो यूरोपीय महिलाएं शामिल थी. इस हमले में दोनों ही मारी गईं.

प्रफुल्ल चाकी का बलिदान

इस बम धमाके के बाद बोस और चाकी को लगा कि वे अपनी योजना में सफल हो गए और दोनों ही बम धमाका होते ही भाग गए. प्रफुल्ल चाकी समस्तीपुर पहुंचे और वहां से रेलगाड़ी में बैठ गए, लेकिन उसी ट्रेन में एक पुलिस सबइंस्पैक्टर था जिसने चाकी को पहचान लिया और अगले स्टेशन को सूचना देती. गाड़ी रुकते हुए चाकी पुलिस देख भागे लेकिन जल्द ही चारों तरफ घिरने पर उन्होंने खुद को गोली मार दी.

खुदीराम बोस (Khudiram Bose) ने कम उम्र में ही देश के लिए खुशी-खुशी फांसी को गले लगा लिया था. (प्रतीकात्मक तस्वीर: विकीीपीडिया)


खुदीराम बोस की गिरफ्तारी और फांसी

दूसरी तरफ बोस भी गिरफ्तार हो गए और उन पर मुकदमा चलाने के बाद उन्हें फांसी की सजा सुना दी गई. दो बार तारीख बदलने के बाद अंततः बोस को 11 अगस्त 1908 को फांसी दी गई. उस समय उनकी आयु केवल 18 साल ही थी. फांसी के बाद खुदीराम बंगाल में बहुत लोकप्रिय हो गए. विद्यार्थियों सहित बहुत से लोगों ने उनकी फांसी का शोक मनाया था.

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कितनी अहम थी यह घटना

यह घटना देखने में आम देशद्रोह की घटना की तरह लगती है. लेकिन इसने अखबारों के जरिए हिंदुस्तान से लेकर इंग्लैंड और यूरोप में हलचल मचा कर रख दी थी. किंग्सफोर्ड ने भी डर के मारे नौकरी छोड़ दी. इस घटना के बाद चाकी और बोस की लोकप्रियता जैसी फैली. भारतीय जनमानस में यह एक प्रभावशील घटना मानी जाने लगी.
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