भारतीय वैज्ञानिकों ने विकसित किया स्वदेशी खगोलीय उपकरण, कीमत है 60 प्रतिशत कम

यह पहली बार है कि टेलीस्कोप के लिए स्वदेशी डिजाइन वाला स्पैक्ट्रोग्राफ (Spectrograph) बना है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)

यह पहली बार है कि टेलीस्कोप के लिए स्वदेशी डिजाइन वाला स्पैक्ट्रोग्राफ (Spectrograph) बना है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)

भारतीय वैज्ञानिकों (Indian Scientists) ने स्वदेशी तकनीक और डिजाइन की कम कीमत वाले प्रकाशीय स्पैक्ट्रोग्राफ (Optical Spectrograph) विकसित करने में सफलता हासिल की है.

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भारतीय वैज्ञानिकों (Indian Scientists) ने एक स्वदेशी डिजाइन (Indigenous Design) का कम लागत वाला प्रकाशीय स्पैक्ट्रोग्राफ (Optical Spectrograph) विकसित किया है. इस स्पैक्ट्रोस्कोप का खासियत यह है कि यह सुदूर क्वासेर और ब्रह्माण्ड की युवा गैलेक्सी (Galaxy) के आने वाले धुंधले प्रकाश के स्रोतों, सुपरमासिव ब्लैकहोल और कॉस्मिक विस्फोटों के पास के इलाकों की पहचान भी कर सकता है.

महंगे पड़ते थे अब तक स्पैक्ट्रोस्कोप
अभी तक इस तरह के स्पैक्ट्रोस्कोप ऊंचे दामों पर आयातित किए जाते थे. भारतीय स्पैक्ट्रोस्कोप को एरीज-देवस्थाल फेंट ऑब्जेक्ट स्पैक्ट्रोग्राफ एंड कैमरा (ADFOSC) नाम दिया गया है. एडफोस्क का की कीमत चार करोड़ रुपये रखी गई है. जो कि आयातित उपकरणों का 40 प्रतिशत दाम है.

किसने किया विकसित
एडफोस्क को आर्यभट्ट रिसर्ट इंस्टीट्यूट ऑफ ऑबजरवेशनल साइंसेस (ARIES) नैनीताल ने डिजाइन और विकसित किया है. यह देश में उपलब्ध खगोलीय स्पैक्ट्रोग्राफ में से अपनी तरह का सबसे उपकरण है. इसे नैनीताल के पास 3.6 मीटर देवस्थल ऑप्टिकल टेलीस्कोप (DOT) पर स्थापित किया गया है.



कितना सक्षम है यह एडफोक्स
DOT के लिए आधार बनकर एडफोस्क बहुत ही धुंधले खगोलीय स्रोतों का अवलोकन एक फोटोन प्रति सेकेंड की कम दर वाले स्रोतों का भी पता लगा सकता है. यह बहुत सारे लेंस की जटिल व्यवस्था का उपयोग करता है जो बहुत ही पॉलिश किए हुए खास लेंस होते हैं जिससे आसमान की साफ तस्वीर बन पाती है.

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आर्यभट्ट रिसर्ट इंस्टीट्यूट ऑफ ऑबजरवेशनल साइंसेस (ARIES) 1954 से देश को अपनी सेवाएं दे रहा है. (तस्वीर: Wiki commons)


कैसे करता है उपकरण काम
सूदूर खगोलीय स्रोतों से आने वाले फोटोन टेलीस्कोप में आते हैं और स्पैक्ट्रोग्राफ उनमें से अलग-अलग रंगों को छांटने का काम करता है जो अंततः एक इलेक्ट्रॉनिक रूप से रिकॉर्ड किए जा सकने वाले संकेतों में बदले जाते है. इसके लिए स्वदेश में विकसित किया गया चार्ज कपल्ड डिवाइस (CCD) कैमरे का उपयोग किया जाता है. यह कैमरा -120 डिग्री सेंटीग्रेड तक के अत्यंत कम तापमान में रखा जाता है.

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व्यापक उपयोग है स्पैक्ट्रोस्कोप का
स्पैक्ट्रोग्राफ और कैमरा के प्रकाशीय, यांत्रिकी और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम पर शोधकर उसे विकसित करने वाली तकनीकी और वैज्ञानिक टीम की अगुआई डॉ अमितेश ओमर ने की है. अब इस स्पैक्ट्रोग्राफ का उपयोग देश विदेश के खगोलविद सुदूर क्वासेर, जो कि बहुत ही अधिक ऊर्जा का उत्सर्जन करते हैं, उच्च ऊर्जा गामा विकिरण बर्स्ट करने वाली गैलेक्सी, युवा और विशालकाय तारों और धुंधले बौने तारों के अध्ययन के लिए किया जाएगा.

इस उपकरण से अब सुदूर गैलेक्सी (Galaxies) का अध्ययन करने में आसानी होगी. (तस्वीर: NASA ESA T. Brown S. Casertano and J. Anderson)


इन संस्थानों का रहा योगदान
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान इसरो सहित विभिन्न राष्ट्रीय संस्थानों और मझले छोटे उद्यमों के विशेषज्ञों का इस उपकरण और हिस्से विकसित करने या उसकी समीक्षा करने में योगदान रहा है. एडफोस्क के बाद अब एरीज की योजना और ज्यादा जटिल उपकरणों को विकसित करने की है जिसमें निकट भविष्य में डीओटी पर स्पैक्ट्रो पोलरिमीटर उच्च स्पैक्ट्रल विभेदन स्पैक्ट्रोग्राफ लगाना शामिल है.

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भारत के विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय के मुताबिक एरीज के निदेशक प्रोफेसर दीपांकर बनर्जी  का कहना है कि खगोलविज्ञान और एस्ट्रोफिजिक्स के क्षेत्र में एडफोस्क जैसे जटिल उपकरण स्वदेशी तकनीक से बनाना भारत के आत्मनिर्भर कार्यक्रम का अहम हिस्सा है. एरीज यानि आर्यभट्ट रिसर्ट इंस्टीट्यूट ऑफ ऑबजरवेशनल साइंसेस साल 1954 में नैनीताल, उत्तराखंड में स्थापित किया गया था. इसें 3.6 और 1.3 देवस्थल ऑप्टिकल टेलीस्कोप, 1.04 सेमी संपूर्णानंद टेलीस्कोप, एक सौर टेलीस्कोव, 4 मीटर का इंटरनेशनल  लिक्विड मिरर टेलीस्कोप, बोकर नन स्मिथ टेलीस्कोप और स्ट्रैटोस्फियर ट्रोपोस्फियर राडार लगा है.
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