भारत-मलेशिया की 'नई दोस्ती' तो हो गई है लेकिन जाकिर नाईक का प्रत्यर्पण नहीं आसान

भारत-मलेशिया की 'नई दोस्ती' तो हो गई है लेकिन जाकिर नाईक का प्रत्यर्पण नहीं आसान
मलेशिया के मलय मुसलमानों में बेहद लोकप्रिय है जाकिर नाईक.

भारत ने मलेशिया से एक बार फिर जाकिर के प्रत्यर्पण की रिक्वेस्ट की है. भले ही भारत को नई उम्मीद जगी हो लेकिन अभी जाकिर का प्रत्यर्पण बेहद मुश्किल है. जानिए क्यों...

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भारत और मलेशिया के संबंध हमेशा से मधुर रहे हैं. मलेशिया के पूर्व प्रधानमंत्री मोहम्मद महातिर की आक्रामक बयानबाजी के कारण भारत के साथ संबंधों में कुछ खटास जरूर आई थी. लेकिन जब से देश के प्रधानमंत्री मोहिउद्दीन यासीन बने हैं, भारत के साथ मलेशिया के संबंध एक बार फिर पटरी पर लौट रहे हैं. भारत के साथ प्रगाढ़ होते संबंधों के बीच विवादित धर्म प्रचारक जाकिर नाईक के प्रत्यर्पण की भारतीय उम्मीदें भी मजबूत हुई हैं. मलेशिया के स्थानीय अखबारों के मुताबिक बीती 14 मई को भारत की तरफ से जाकिर नाईक के प्रत्यर्पण के लिए रिक्वेस्ट भेजी गई है. जाकिर नाईक मलेशिया में साल 2017 से रह रहा है. उसे वहां पर परमानेंट रेजीडेंट स्टेटस दिया गया है.

माना जा रहा है कि मलेशिया के नए प्रधानमंत्री भारत की इस रिक्वेस्ट पर विचार कर सकते हैं और जाकिर नाईक को भारत लाना जल्द ही संभव होगा. लेकिन सच ये है कि अब भी जाकिर नाईक को भारत लेकर आना एक टेढ़ा काम है. भारत और मलेशिया के बीच साल 2010 में ही प्रत्यर्पण संधि हुई थी. इसके बावजूद अगर जाकिर का प्रत्यर्पण नहीं हो पा रहा है तो वहां के राजनीतिक हालातों पर नजर डालनी होगी.

2014 में मलेशिया में हुए आम चुनावों के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री मोहम्मद रज्जाक और फिर बाद में प्रधानमंत्री बने मोहम्मद महातिर दोनों ने जाकिर नाईक की मलेशिया में लोकप्रियता को भुनाया था. दरअसल मलेशिया की कुल आबादी का 60 फीसदी हिस्सा मलय मुसलमानों का है. जाकिर नाईक मलय मुसलमानों में बेहद लोकप्रिय है. मलय मुसलमानों की देश की सरकार बनवाने में बड़ी भागीदारी होती है. ऐसे में अगर वहां की नई सरकार जाकिर नाईक के प्रत्यर्पण पर राजी होती है तो उसे इसका खामियाजा भी चुकाना पड़ सकता है.



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मलेशिया के पूर्व प्रधानमंत्री म​हातिर ने भारत के खिलाफ प्रतिक्रिया दी थी. फाइल फोटो.

क्यों मोहम्मद महातिर ने नहीं किया जाकिर का प्रत्यर्पण
मोहम्मद महातिर ने भारत से अच्छे संबंधों के बावजूद जाकिर नाईक का प्रत्यर्पण नहीं किया था. मोहम्मद महातिर मलेशिया के शीर्षस्थ नेताओं में शुमार किए जाते हैं. वो 1981 से 2003 तक लगातार मलेशिया के प्रधानमंत्री थे. भारत के खिलाफ सख्त शब्दों का इस्तेमाल और जाकिर नाईक का प्रत्यर्पण न करने के पीछे मोहम्मद महातिर की राजनीतिक मजबूरियां थीं. दरअसल मोहम्मद महातिर जिस राजनीतिक गठबंधन के मुखिया के तौर पर मलेशिया के प्रधानमंत्री थे उसका नाम है- Pakatan Harapan (Coalition of Hope).

इस गठबंधन से मलेशिया के मलय मुस्लिम चिढ़ गए थे. गठबंधन में जिस डेमोक्रेटिक एक्शन पार्टी का असर था उसके ज्यादातर नेता चाइनीज मलेशियन नस्ल से ताल्लुक रखते हैं. डेमोक्रेटिक एक्शन पार्टी ने अपने प्रधानमंत्री मोहम्मद महातिर की आलोचना करना शुरू कर दिया था. आरोप था कि जाकिर नाईक को हमने मलेशिया में क्यों शरण दी हुई है? अब महातिर के पास मलय मुस्लिमों की सहानुभूति हासिल करने का एक ही रास्ता था. फिर उन्होंने कश्मीर में भारत के कदम के खिलाफ सख्त लहजे का इस्तेमाल किया और जाकिर नाईक के प्रत्यर्पण के खिलाफ खड़े हो गए. लेकिन ये सब कुछ करने के बावजूद महातिर अपनी कुर्सी नहीं बचा सके.

मलेशिया के नए प्रधानमंत्री मोहिउद्दीन यासिन.


क्या नई सरकार कर पाएगी प्रत्यर्पण
भले ही अब ये उम्मीद लगाई जा रही हो कि जाकिर नाईक का भारत प्रत्यर्पण आसान होगा लेकिन ये बहुत मुश्किल काम है. इसका कारण ये है कि वर्तमान में जो गठबंधन मलेशिया पर शासन कर रहा है, उसके कई नेता जाकिर नाईक के खिलाफ कठोर कदम न उठाने के पक्ष में रहे हैं. यहां तक कि मोहम्मद महातिर सरकार को प्रत्यर्पण के लिए एक बार इस गठबंधन की तरफ से मना भी किया जा चुका है. वर्तमान रूलिंग गठबंधन देश के बहुतायत मलय मुस्लिमों का सपोर्ट चाहता है क्योंकि इसी समुदाय की बदौलत देश में सरकारें तय होती हैं. ऐसे में मोहिउद्दीन यासिन की सरकार जाकिर नाईक के प्रत्यर्पण का कदम उठाएगी, ये कहना बेहद मुश्किल है.

मलेशिया में लोकप्रिय है जाकिर नाईक
इस्लाम के अतिवादी वहाबी सेक्ट का समर्थक जाकिर नाईक मलेशिया में काफी मशहूर है. मलय मुसलमान उसके धार्मिक भाषणों को बेहद गहराई के साथ फॉलो करते हैं. कई मलेशियाई एक्सपर्टस् का मानना है कि जाकिर नाईक ने बड़ी ही चालाकी के साथ मलेशियाई लोगों को आपस में बांट दिया है. उसकी लोकप्रियता की वजह से 1 प्रतिशत हिंदू आबादी, 0.9 प्रतिशत ईसाई आबादी और चाइनीज मूल का मलेशियन समुदाय डरा हुआ महसूस कर रहा है.

मलेशिया में छिप कर रह रहा है विवादास्पद इस्लामिक प्रचारक जाकिर नाईक


गौरतलब है कि साल 2016 में बांग्लादेश की राजधानी ढाका के एक कैफे में आतंकवादी हमलावर जाकिर नाईक से प्रेरित बताए जाते हैं. इस घटना के बाद मलेशिया में जाकिर नाईक की उपस्थिति को लेकर बड़े सवाल खड़े किए गए थे. लेकिन महातिर सरकार मलय मुस्लिमों के गुस्से से खौफ खा गई थी.

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