इमरजेंसी की 10 कहानियां: कौन जेल में बंद हुआ, किसने सरकार को दिया चकमा

इमरजेंसी की 10 कहानियां: कौन जेल में बंद हुआ, किसने सरकार को दिया चकमा
आपातकाल की घोषणा होने के अगले दिन नेशनल हेराल्ड ने विशेष अंक निकाला

25 जून 1975 की आधी रात तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश पर आपातकाल लागू कर दिया. ये देश के लिए किसी बड़े झटके की तरह था. इस दौरान बहुत कुछ हुआ. आज इस घटना के 45 साल हो चुके हैं जब भी 25 जून आता है, तब इमरजेंसी यानी आपातकाल की यादें ताजा हो जाती हैं

  • News18Hindi
  • Last Updated: June 25, 2020, 11:16 AM IST
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1975 में लगी इमरजेंसी के दौरान तमाम बातें हुईं. इंदिरा गांधी की सरकार ने तमाम नेताओं को अलग- अलग जेलों में बंद कर दिया लेकिन कुछ नेता ऐसे भी थे, जिन्होंने भेष बदलकर सरकार को चकमा दिया और भूमिगत हो गए. आपातकाल 45 साल पहले देश में लगा था लेकिन आज भी देश उसे भूल नहीं पाया. इस दौरान क्या-क्या हुआ.

25 जून की आधी रात तक इंदिरा गांधी ने राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के दस्तखत लेकर इमरजेंसी की घोषणा कर दी. कैबिनेट से चर्चा किए बगैर ये घोषणा की गई और तीन घंटों के भीतर तमाम अखबारों की बिजली काट दी गई और विरोधी नेताओं की धरपकड़ शुरू कर दी गई.

इमरजेंसी दौरान हुई बीती घटनाओं पर नजर दौड़ाते हैं. यहां उस दौर की 10 दिलचस्प कहानियां.



1. जेटली 19 महीने के लिए जेल भेजे गए
पिछली सरकार में वित्त मंत्री रह चुके अरुण जेटली को इमरजेंसी के दौरान 19 महीने जेल में बंद किया गया था. जेटली के अलावा, भाजपा के नेताओं में इमरजेंसी के दौरान वेंकैया नायडू 17 महीनों, रविशंकर प्रसाद एक साल के लिए और प्रकाश जावड़ेकर को भी जेल भेजा गया था.

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70 के दशक में सभा को संबोधित करते अटल बिहारी वाजपेयी. फाइल फोटो


2. अटल ने जेल में लिखीं कविताएं
भाजपा के वरिष्ठ नेताओं अटलबिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी को भी जेल में बंद किया गया था. आडवाणी 19 महीनों के लिए अलग-अलग जेलों में बंद रहे. वहीं, आपातकाल के दौरान जेल में बंद वाजपेयी ने इस विषय पर 'अनुशासन के नाम पर अनुशासन का खून / भंग कर दिया संघ को कैसा चढ़ा जुनून' जैसी कविताएं लिखीं.

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3. स्वामी सरदार का वेश बनाकर भाग निकले
पत्रकार कूमी कपूर की किताब के मुताबिक भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी 1975 में तत्कालीन सरकार को चकमा देकर सरदार के वेश में भागकर अहमदाबाद रेलवे स्टेशन पहुंचे थे. वहां वर्तमान प्रधानमंत्री और तब 25 वर्षीय नरेंद्र मोदी ने छद्म वेश धरकर उन्हें सुरक्षित ठिकाने तक ले जाने में मदद की थी.

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छद्म वेश में सुब्रमण्यम स्वामी और मोदी की ये तस्वीरें सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो चुकी हैं


4. बंसीलाल ने इमर्जेंसी बढ़वाने की कोशिश की थी
इतिहासकार बिपिन चंद्रा के मुताबिक संजय गांधी के घनिष्ठ मित्र और उस वक्त रक्षा मंत्री रहे बंसीलाल ने चुनावों को टालने और इमरजेंसी की अवधि बढ़ाने के लिए कई कोशिशें की थीं. यहां तक संविधान में संशोधन कर रास्ता तक बनाने की कोशिश की थी.

5. क्या कर रहे थे विद्याचरण शुक्ल
5. संजय गांधी के एक और घनिष्ठ कांग्रेसी नेता विद्याचरण शुक्ल संजय की मनमानियों को न केवल शह देने का काम कर रहे थे, बल्कि संजय और इंदिरा सरकार के पक्ष में कला और विरोधी खेमे के कई लोगों को प्रतिबंधित करने के रास्ते बना रहे थे.

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6. किस नेता ने इंदिरा को दिया था ये आइडिया
पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री रहे सिद्धार्थ शंकर रे के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने ही विरोधियों के सुरों को दबाने के लिए इंदिरा गांधी को इमरजेंसी लगाने का आइडिया दिया था. रे ने ही संविधान संशोधन कर पूर्ण सत्ता पा लेने का रास्ता भी सुझाया था. आरके धवन ने रे को लेकर ये बातें कही थीं.

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सिद्धार्थ शंकर रे. फाइल फोटो


7. 'छोटे सरकार' की बड़ी मनमानियां
तब इंदिरा गांधी के स्वाभाविक उत्तराधिकारी माने जा रहे संजय गांधी ने राजनीतिक ताकतों का खुलकर इस्तेमाल किया और वो छोटे सरकार कहे जाने लगे. कई नीतियां और सरकारी गतिविधियां सीधे तौर पर संजय गांधी चला रहे थे, जिनमें एक था परिवार नियोजन.

8. विवादास्पद परिवार नियोजन
परिवार नियोजन का पूरा कार्यक्रम विवादास्पद हो गया क्योंकि लोगों के साथ ज़्यादतियां हुईं और दिल्ली समेत देश के कई इलाकों में लोगों की जबरन नसबंदी करवा दी गई.

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9. 83 लाख लोगों की नसबंदियां
जनसंख्या काबू करने की दलीलों के चलते 1975-76 के दौरान जहां 27 लाख से ज़्यादा लोगों की नसबंदी करवाई गई, वहीं, आलोचनाओं के जवाब में इस कार्यक्रम को और आक्रामक बनाकर 1976-77 के दौरान ये आंकड़ा 83 लाख लोगों तक पहुंच गया. इनमें से ज़्यादातर मामलों में लोगों की मर्ज़ी के खिलाफ नसबंदी कराने के आरोप लगे.

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संजय गांधी और इंदिरा गांधी. फाइल फोटो


10. सही समय पर होने लगे थे काम 
एक ओर अगर इमर्जेंसी में सियासी तौर और नसबंदी के मामलों में ज्यादती की खबरें सामने आईं तो दूसरी ओर देश में तमाम आफिस एकदम समय से खुलने लगे. काम में अनुशासन और उत्पादकता बढ़ गई तो बस से लेकर ट्रेनें एकदम सही समय से चलने लगीं. कालाबाजारियों पर भी रोक लगी.
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