आपातकाल लगाने पर इंदिरा की अपनी बुआ से हुई थी खूब कहा-सुनी

यह है 19 जून 1975 का अखबार. इस दिन के महज 5 दिन बाद यानी 25 जून को देश में इमरजेंसी लागू किए जाने की घोषणा कर दी गई थी. 19 जून के इस अखबार में देखा जा सकता है कि इंदिरा गांधी कांग्रेस पार्लियामेंट्री पार्टी मीटिंग को संबोधित करने आ रही हैं. हालांकि यहां 21मार्च 1977 का अखबार भी है, जब इमरजेंसी समाप्त हुई थी.

यह है 19 जून 1975 का अखबार. इस दिन के महज 5 दिन बाद यानी 25 जून को देश में इमरजेंसी लागू किए जाने की घोषणा कर दी गई थी. 19 जून के इस अखबार में देखा जा सकता है कि इंदिरा गांधी कांग्रेस पार्लियामेंट्री पार्टी मीटिंग को संबोधित करने आ रही हैं. हालांकि यहां 21मार्च 1977 का अखबार भी है, जब इमरजेंसी समाप्त हुई थी.

राहुल गांधी ने एक इंटरव्यू में कहा है कि देश में उनकी दादी द्वारा इमर्जेंसी लगाने का फैसला सही नहीं था. उनका कहना था कि इंदिरा ने खुद भी बाद में माना था कि ये गलत फैसला था. जब 1975 में इंदिरा ने आपातकाल लागू किया तो उनकी बुआ घर आईं और इस मामले पर खूब कहा-सुनी हुई.

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कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने एक इंटरव्यू में स्वीकार किया कि देश में आपातकाल लगाना एक गलत फैसला था. उन्होंने ये भी कहा कि खुद उनकी दादी यानि इंदिरा गांधी ने भी बाद में माना कि उन्होंने इमर्जेंसी लगाकर गलती की थी. 25 जून 1975 की रात 11.30 बजे तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लगाने की घोषणा की थी. शायद इंदिरा के परिवार के ही लोग इससे खुश नहीं थे. इस बात को लेकर इंदिरा की अपनी फुफेरी बहन से काफी कहा-सुनी भी हुई.

जाने-माने पत्रकार कुलदीप नैयर की किताब "बियांड द लाइंस : एन आटोबॉयोग्राफी" में इसका विस्तार से उल्लेख है.

किताब में कहा गया, " इमर्जेंसी लागू होने के बाद प्रेस के मुंह पर ताला लगा दिया गया. किसी तरह के सकारात्मक विरोध या न्यूनतम प्रजातांत्रिक मर्यादाओं के पालन के लिए भी कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी गई. सबकुछ मनमाने और तानाशाही तरीके से किया जाने लगा. प्रशासन में हर स्तर पर अत्याचारियों की एक नई पौध उभऱ आई."



कुलदीप नैयर की किताब लिखती है कि आपातकाल लागू करने के फैसले से आमतौर पर इंदिरा के परिवार में हर कोई नाखुश था. इसमें सोनिया और राजीव भी शामिल थे, जो अब ज्यादातर अपने ही कमरों में रहते थे.

राजीव-सोनिया भी थे नाखुश 
इंदिरा गांधी के परिवार में भी संजय के अलावा कोई भी इमर्जेंसी का समर्थन नहीं कर रहा था. ऐसा माना जाता है कि राजीव और सोनिया गांधी भी इससे नाखुश थे. डायनिंग टेबल पर होने वाली राजनीतिक बातचीत से दूर ही रहते थे. वो ज्यादातर अपने कमरे में ही रहते थे.

इंदिरा गांधी की बुआ विजयलक्ष्मी पंडित आपातकाल की घोर आलोचक थीं. जब वो घर आईं तो इंदिरा से इस मामले पर उनकी जमकर कहासुनी हुई.


विजयलक्ष्मी पंडित ने खुलकर विरोध किया
नेहरू की बहन विजयलक्ष्मी पंडित खुलकर इमर्जेंसी का विरोध कर रही थीं. वो इसकी प्रखर आलोचक थीं. कहा जाता है कि जब उन्होंने इंदिरा से मिलकर अपनी नाराजगी जाहिर की तो दोनों के बीच काफी कहा-सुनी हुई थी. हालांकि इसके बाद भी विजयलक्ष्मी  बाद में जनता पार्टी के चुनाव प्रचार के लिए राजी नहीं हुईं. हालांकि जेपी और जनता पार्टी के नेताओं ने उनसे ऐसा करने का अनुरोध किया था.

विजयलक्ष्मी कभी नेहरू की प्रिय बहनों में थीं. उन्हें आजादी के बाद सोवियत संघ और अमेरिका का राजदूत बनाया गया. फिर उन्हें संयुक्त राष्ट्र संघ भी भेजा गया. वह मजबूत स्थितियों में रहीं लेकिन इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनने के बाद उनके सितारे गर्दिश में चले गए.

ये कजन भी थी आपातकाल की विरोधी
विजयलक्ष्मी पंडित की बेटी नयनतारा सहगल इमर्जेंसी की सबसे कटु आलोचकों में शामिल थीं. वो खुलकर इसके खिलाफ बोलती थीं. यूं भी इंदिरा से उनके संबंध कभी अच्छे नहीं रहे थे. नयनतारा को ये बात अक्सर अखरती थी कि इंदिरा के घर में उनका आना जाना पसंद नहीं किया जाता था.

पुपुल जयकर ने क्या लिखा
इंदिरा गांधी की पारिवारिक मित्र पुपुल जयकर ने भी इंदिरा जीवनी में ये लिखा कि वो आपातकाल के समर्थन में नहीं थीं. उन्होंने इंदिरा से सवाल भी किया कि नेहरू की बेटी ऐसा कैसे कर सकती है. तब उन्होंने जवाब दिया कि जेपी और मोरारजी देसाई किसी भी तरह उनकी सत्ता हासिल करना चाहते थे और इसके लिए कुछ भी कर रहे थे.
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