रात में इमर्जेंसी लग चुकी थी, सुबह 06 बजे इंदिरा ने सभी मंत्रियों को तलब कर लिया

इंदिरा गांधी 25 जून की आधी रात से आपातकाल लागू कर चुकी थीं लेकिन इसका नोटिफिकेशन 26 जून को जारी हुआ.

Emergency 1975 : देश में आपातकाल लगाने की घोषणा आज के ही दिन 46 साल पहले की गई थी. इस दिन को भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में आज भी काला अध्याय ही माना जाता है. लोगों के नागरिक अधिकार, प्रेस की आजादी सभी छीन ली गईं थीं. जेलों में बड़े पैमाने पर राजनीतिक कैदी बंद कर दिए गए थे.

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25 जून की शाम 05.30 बजे तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद से मिलीं. रात 11.30 बजे उन्होंने देश में आपातकाल लागू कर दिया. अगले दिन सुबह करीब 05.00 बजे उनके सभी मंत्रियों के घरों में फोन की घंटियां बजने लगीं. सुबह ठीक 06.00 बजे इंदिरा गांधी ने अपने मंत्रियों की बैठक बुला ली थी. सरकार के कई सीनियर मंत्री तक घबराए हुए थे.

25 जून की शाम इंदिरा गांधी के पास पर्याप्त समय था कि वो कैबिनेट की बैठक बुलाकर आपातकाल पर उनसे सलाह ले सकती थीं लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. उनका कहना था कि उन्हें इसके लिए समय नहीं मिला. 26 जून की सुबह जब उन्होंने कैबिनेट की बैठक बुलाई, उससे जाहिर हो गया कि 90 मिनट की नोटिस पर कैबिनट मीटिंग आयोजित की जा सकती है.

मंत्रियों को जेल में डाले जाने की आशंका थी
कैबिनेट की मीटिंग के बाद जब मंत्री वापस घर लौटे तो वो आशंकाओं में ग्रस्त थे. कुछ घबराए हुए थे. पत्रकार कुलदीप नैयर ने अपनी किताब "बियांड द लाइंसःएन ऑटोबॉयोग्राफी" में इस बारे में विस्तार से लिखा. वो लिखते हैं, "इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला 12 जून को आया. इसके बाद 22 जून 1975 को ही इंदिरा गांधी इमर्जेंसी लागू करने की योजना बना चुकी थीं."

चव्हाण और जगजीवन राम घबराए हुए थे
नैयर ने लिखा, "26 जून 1975 को मैं आईबी चव्हाण और जगजीवन राम से मिलने उनके घर गया. मैने देखा गुप्तचर एजेंसियों के अधिकारी उनसे मिलने वालों के नाम और गाड़ियों के नंबर नोट कर रहे थे. चव्हाण मुझसे मिलने से ही डर रहे थे. जबकि जगजीवन राम एक मिनट की मुलाकात के दौरान बहुत घबराए हुए दिखाई दिए. जगजीवन राम ने तो यहां तक कहा कि उन्हें अपनी गिरफ्तारी का अंदेशा था. जब वो ये बात कह रहे थे तो इससे पहले ही उन्होंने अपने फोन का रिसीवर उठाकर एक तरफ रख दिया, क्योंकि उन्हें पता था कि उनका फोन टेप किया जा रहा था."

जगजीवन राम आपातकाल की घोषणा के दौरान घबराए हुए थे. उन्हें आशंका थी कि उनका फोन टेप किया जा रहा है. बाद में वह जनता पार्टी में शामिल हो गए.


जगजीवन राम से दिलाया गया आपातकाल का प्रस्ताव
बाद में जगजीवन राम की जीवनी में इंदिरा गांधी पर आरोप लगाया गया कि वो उनपर भरोसा नहीं करती थीं. "बापू जगजीवन रामः एक जीवनी" वर्ष 2010 में प्रकाशित हुई. इस किताब में आरोप लगाया गया कि कि इंदिरा ने उन्हें कभी बेहतर विभाग नहीं दिया, क्योंकि वो उन पर भरोसा नहीं करती थीं. इमरजेंसी से पहले बाद में उन्हें शक के दायरे में रखा गया. केंद्रीय जासूसी एजेंसियां उन पर कड़ी नजर रखे हुए थीं. उनकी वरिष्ठता के बावजूद उनसे कोई सलाह नहीं ली जाती थी. जब कैबिनेट की बैठक में आपातकाल का प्रस्ताव पास कराना था तो उनसे ये काम कराकर उन्हें बलि का बकरा बनाया गया. इमरजेंसी हटने के कुछ ही समय बाद जगजीवन राम जनता पार्टी में शामिल हो गए थे.

इंदिरा सरकार में तत्कालीन मंत्री केसी पंत आपातकाल को लेकर चिंतित थे


केसी पंत और कर्ण सिंह थे चिंतित
जब कैबिनेट की मीटिंग चल रही थी तब स्वर्ण सिंह ने ये बात उठाई थी कि जब देश में पहले से ही इमरजेंसी लगी हुई थी तो फिर दूसरी इमरजेंसी की क्या जरूरत थी. दो अन्य मंत्रियों केसी पंत और कर्ण सिंह ने कैबिनेट की मीटिंग के बाद आपस में ये चिंता जाहिर की थी कि इमरजेंसी से देश का नाम बदनाम होगा. लेकिन अब दोनों डर के मारे संजय गांधी का हुक्म बजाने के लिए मजबूर थे. मंत्रियों की मीटिंग में जब स्वर्ण सिंह ने इमरजेंसी को लेकर सवाल उठाया तो उन्हें मंत्रिमंडल से बाहर कर दिया गया.

जब गुजराल ने संजय गांधी को दो-टूक जवाब दिया
लेकिन कुछ मंत्री अलग तरह के भी थे. जब संजय गांधी ने तत्कालीन सूचना और प्रसारण मंत्री इंद्र कुमार गुजराल को फोन करके प्रेस को दुरुस्त करने का हुक्म दिया तो गुजराल अपना संयम खो बैठे. उन्होंने कहा कि वो उनकी मां के सहकर्मी हैं, न कि उनके घरेलू नौकर. 28 जून को ही गुजराल का योजना आयोग में तबादला कर दिया गया. उनका सूचना और प्रसारण मंत्रालय विद्याचरण शुक्ल को सौंप दिया गया. इंदिरा गांधी के प्रमुख सचिव रह चुके पी एन हक्सर पहले ही अपना मुंह खोलने की सजा भुगतते हुए हाशिए पर जा चुके थे.

आपातकाल लगाने के बाद इंदिरा गांधी का तर्क था कि ये कदम देश के हित में उठाया गया है. उन्होंने देशवासियों से अपने संबोधन में कहा कि घबराने की जरूरत नहीं है.


इंदिरा खुद शुरू में घबराई हुई थीं
इंदिरा गांधी शुरू में खुद थोड़ी घबराई हुई थीं. उन्हें लगता था कि अभी ये नहीं कहा जा सकता कि सबकुछ ठीक ठाक हो गया था. फिर भी ज्यादातर मुख्यमंत्रियों की रिपोर्ट थी कि स्थिति नियंत्रण में है.

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