भारत से रिश्ते सुधरे तो पाकिस्तान को होंगे ये फायदे

कल से लाहौर में सिंधु जल समझौते को लेकर होने जा रही बैठक के साथ पाकिस्तान के साथ आगे की बातचीत के रास्ते खुल गये हैं लेकिन फिर भी दोनों देशों के संबंध सुधरने की संभावना कम क्यों है?

Avinash Dwivedi | News18Hindi
Updated: August 28, 2018, 2:35 PM IST
भारत से रिश्ते सुधरे तो पाकिस्तान को होंगे ये फायदे
कल से लाहौर में सिंधु जल समझौते को लेकर होने जा रही बैठक के साथ पाकिस्तान के साथ आगे की बातचीत के रास्ते खुल गये हैं लेकिन फिर भी दोनों देशों के संबंध सुधरने की संभावना कम क्यों है?
Avinash Dwivedi | News18Hindi
Updated: August 28, 2018, 2:35 PM IST
पाकिस्तान में इमरान खान की सरकार बनने के बाद भारत के  साथ संबंधों में जमी बर्फ पिघलने की उम्मीद की जा रही है. इसकी वजह इस हफ्ते होने जा रही दोनों देशों की औपचारिक बातचीत है, जिसमें सिंधु जल समझौते पर चर्चा होनी है. भारत और पाकिस्तान के बीच यह समझौता 1960 में हुआ था. सिंधु जल समझौते पर भारत-पाकिस्तान की पिछली बातचीत मार्च, 2016 में हुई थी.

भारत के राजनयिक सूत्रों ने बताया कि 29 और 30 अगस्त को लाहौर में होने वाली बैठक में पाकिस्तान  जम्मू-कश्मीर में 330 मेगावॉट के किशनगंगा हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट का मुद्दा उठा सकता है. दरअसल पाकिस्तान को चिंता है कि अगर यह बांध बन जाता है तो इससे पाकिस्तान में सिंधु नदी से आने वाले पानी की रफ्तार कम हो जाएगी. हालांकि इसके अलावा पाकिस्तान चिनाब नदी पर बनने वाले दो हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स, 1000 मेगावॉट के 'पाकल दुल' और 48 मेगावॉट के 'लोअर कलनाई' हाइड्रोलिक प्रोजेक्ट पर अपनी चिंता जता सकता है. इस मीटिंग में भारत के सिंधु जल आयुक्त पीके सक्सेना अपने पाकिस्तानी समकक्ष सैयद मेहर अली शाह के साथ 29 अगस्त को बातचीत करेंगे, जिसमें दोनों पक्ष डाटा शेयर करने, बाढ़ से जुड़ी जानकारियों और प्रशासन के बारे में भी समझौता कर सकते हैं.

यह मीटिंग कर सकती है सुधरते भारत-पाक संबंधों का शुभारंभ
यह मीटिंग दोनों देशों के बीच आगे और भी बातचीत का रास्ता खोल सकती है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इमरान खान को पिछले हफ्ते उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद लिखे पत्र में रचनात्मक और अर्थपूर्ण संबंधों की इच्छा जताई थी. इमरान खान ने भी प्रधानमंत्री बनने के बाद अपने पड़ोसियों से शांतिपूर्ण संबंध स्थापित करने की प्रतिबद्धता जताई थी. इमरान खान के भाषण का ज्यादातर हिस्सा घरेलू मुद्दों पर ही केंद्रित था, हालांकि बाद में एक प्रेस कांफ्रेस के दौरान उन्होंने कहा था कि कश्मीर, भारत और पाकिस्तान के बीच संबंधों का केंद्र बना हुआ है, ऐसे में इमरान खान ने भारत के इस मुद्दे (कश्मीर की समस्या को सुलझाने) की ओर एक कदम बढ़ाने पर खुद दो कदम बढ़ाने की बात भी कही थी.

यह भारत और नई पाकिस्तानी सरकार के बीच पहली औपचारिक बैठक है. हालांकि इसके बाद अगली बैठक भी जल्द हो सकती है. भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और उनके पाकिस्तानी समकक्ष शाह महमूद कुरैशी की अगले महीने यूनाइटेड नेशंस जनरल असेंबली में आमना-सामना होना है. पाकिस्तानी राजनयिक सूत्रों ने कहा है कि इसे दोनों मंत्रियों के बीच एक मंत्री स्तरीय वार्ता में भी बदला जा सकता है. अगर ऐसा होता है तो 2016 के बाद पहली मंत्री स्तरीय बातचीत हो सकती है. पिछली बार मंत्री स्तरीय बातचीत सुषमा स्वराज और सरताज अजीज के बीच नेपाल में हुई थी. डॉन अख़बार ने एक सीनियर पाकिस्तानी राजनायिक से बातचीत के बाद कहा है कि ऐसी मीटिंग हो सकती है लेकिन अभी तक इसपर कोई फैसला नहीं लिया गया है.

क्या है सिंधु जल समझौता?
1960 में सिंधु जल समझौता भारतीय प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और पाकिस्तानी राष्ट्रपति अयूब खान के बीच हुआ था. इस समझौते में वर्ल्ड बैंक ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी. यह जल समझौता यह तय करता है कि सिंधु और उसकी सहयोगी नदियों का जल किस तरह से दोनों देश प्रयोग करेंगे.
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सिंधु जल समझौते, 1960 के नियमों के अनुसार पूर्वी नदियों सतलुज, व्यास और रावी का पानी भारत को और पश्चिमी नदियों सिंधु, झेलम और चिनाब का पानी पाकिस्तान को दिया जाना था. हालांकि इसमें भारत को कुछ नदी जल के कुछ ऐसे प्रयोगों के लिए छूट मिली हुई है जिसमें नदी का जल खर्च नहीं होता.

पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने भी कहा, "पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के अंतिम संस्कार पर पाकिस्तान के पूर्व कानून और सूचना मंत्री का आना और भारत की विदेश मंत्री से मिलना भी सकारात्मक और रचनात्मक संबंधों की दिशा में बढ़ाया गया कदम है. पाकिस्तान दोनों देशों की भलाई के लिए एक निर्बाध बातचीत चाहता है, ताकि दोनों देशों के बीच सारे ही मसलों को सुलझाया जा सके."

इससे इतर भारत के साथ संबंधों के सुधार पर जोर देते हुए पाकिस्तान के विदेश मंत्री महमूद कुरैशी ने कहा था, "इसमें दोनों को साथ देना होगा. एक हाथ से आप ताली नहीं बजा सकते. हमने सकारात्मक रुख दिखाया है और हमें आगे के लिए बहुत सारी आशाएं हैं."

वहीं पाकिस्तान की नागरिक अधिकार मंत्री शीरीन मज़ारी ने कहा कि इस्लामाबाद में बैठी वर्तमान सरकार कश्मीर मुद्दे को सुलझाने के लिए एक प्रस्ताव पर काम कर रही है. मज़ारी ने यह बात पाकिस्तानी पत्रकार नसीम जेहरा से एक टॉक शो के दौरान कही. उन्होंने कहा कि पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी की सरकार कश्मीर मुद्दे को सुलझाने के लिए एक प्रस्ताव तैयार कर रही है जिसे एक हफ्ते के अंदर कैबिनेट में पेश किया जाना है. वे दूसरे स्टेकहोल्डर्स के साथ भी इस मुद्दे पर चर्चा करेंगे. यह प्रस्ताव लगभग तैयार है और हम आशा करते हैं कि जल्द ही इस पर बातचीत होगी.

आखिर पाकिस्तान क्यों चाहता है भारत से संबंध सुधारना?
पाकिस्तान अगले सार्क सम्मेलन की मेजबानी करना चाहता है और चाहता है कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इसमें शामिल हों.



पाकिस्तान के नए विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने अभी तक केवल एक प्रेस कांफ्रेंस की है. जिसमें उन्होंने पाकिस्तान के विदेश संबंधों के हिसाब से भारत को अफगानिस्तान के बाद दूसरी वरीयता पर रखा था. उन्होंने कांफ्रेंस में कहा था, "मेरा दूसरा संदेश भारत की सरकार के लिए है. मैं भारत की विदेश मंत्री को बता देना चाहता हूं कि हम केवल पड़ोसी नहीं हैं, हम परमाणु शक्तियां भी हैं. हमारे बहुत सारे संसाधन साझे हैं."

उन्होंने भी यह भी कहा कि कश्मीर का मुद्दा एक सच्चाई है और दोनों ही देश इसे मान चुके हैं. हम इससे मुंह नहीं मोड़ सकते.

फिर भी संबंधों के सुधरने के आसार बहुत कम
भले ही भारत के लिए भी पाकिस्तान से संबंध अच्छे करने का यह एक अवसर हो, ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के स्ट्रेटजिक स्टडीज प्रोग्राम डायरेक्टर हर्ष वी. पंत कहते हैं, "पाकिस्तानी सरकार कमोबेश सेना से ही संचालित होती रहेगी. वहीं हमारे देश (भारत) में दो शक्ति केंद्रों की बजाए हमारे पास एक ही है. और भारत सीधे सेना (पाकिस्तानी) से बात नहीं करना चाहता है. इसलिए इसमें सेना पाकिस्तानी सरकार को एक जरिए के तौर पर यूज कर सकती है."

हालांकि सारे प्रयासों के बाद भी हाल-फिलहाल शांति स्थापित होने की आशा नहीं है. क्योंकि आने वाले वक्त में पाकिस्तान के अपने घरेलू मामलों में ही घिरे रहने की आशा है और भारत में भी आम चुनावों की तारीख पास आती जा रही है. ऐसे में दोनों ही देशों के आपसी संबंधों को वरीयता देने की बजाए आंतरिक मामलों को वरीयता देने की उम्मीद की जा रही है.

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