हिंदू-मुस्लिम जोड़े की शादी क्यों नहीं स्वीकार कर पाते लोग?

Vivek Anand | News18Hindi
Updated: September 12, 2019, 9:54 AM IST
हिंदू-मुस्लिम जोड़े की शादी क्यों नहीं स्वीकार कर पाते लोग?
सुप्रीम कोर्ट ने अंतरजातीय और अंतरधार्मिक शादियों को बढ़ावा देने की बात कही है

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने अंतरजातीय (inter caste marriage) और अंतरधार्मिक शादियों (inter religion marriage) को बढ़ावा देने की बात कही है. लेकिन क्या सच में ऐसा हो पाता है? हमारा समाज अंतरजातीय और अंतरधार्मिक शादियों को प्रोत्साहित नहीं करता. जानिए ऐसे मामलों में क्या हालात बन जाते हैं...

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एक मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने बुधवार को कहा कि अंतरजातीय (inter caste marriage) और अंतरधार्मिक शादियों (inter religion marriage) को बढ़ावा दिया जाना चाहिए. ये बेहतर समाज के निर्माण के लिए भी जरूरी है. कोर्ट ने कहा कि हमलोग अंतरधार्मिक शादियों के खिलाफ नहीं हैं. हिंदू-मुस्लिम (hindu muslim community) के बीच की शादी भी मान्य है. अगर कानूनन हिंदू और मुस्लिम जोड़े शादी करते हैं, तो इसमें दिक्कत क्या है?

जस्टिस अरुण मिश्रा और जस्टिस एमआर शाह की बेंच ने कहा कि जातीय भेदभाव खत्म होना चाहिए. अच्छा हो अगर ऊंची जाति वाले लोग निचली जातियों में शादियां करें. ये समाज में बेहतरी लाएगा. बेंच ने यहां तक कहा कि कि कोर्ट ने लिव इन रिलेशन को भी मान्यता दी है. कोर्ट सिर्फ लोगों के हितों की रक्षा करना चाहती है.

कोर्ट के ये विचार स्वागतयोग्य हैं, लेकिन इस विचार को समाज के मौजूदा हालात से मिलान करके देखना होगा. ये पता लगाना होगा कि भारत में अंतरजातीय और अंतरधार्मिक शादियों की क्या स्थिति है? क्या बदलते वक्त के साथ हमारे समाज का दिल इतना बड़ा हुआ है कि वो अंतरजातीय या अंतरधार्मिक शादियों को मान्यता दे दे? या इस मामले में शादियों के आंकड़े क्या कहते हैं?

भारत में जाति देखकर होती हैं 95 फीसदी शादियां

2005-06 के नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के आंकड़े के मुताबिक भारत में होने वाली कुल शादियों में सिर्फ 10 फीसदी शादियां ही इंटरकास्ट या अंतरजातीय होती हैं. वहीं इंटर रिलीजन यानी अंतरधार्मिक विवाह सिर्फ 2.1 फीसदी होते हैं.

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भारत में 95 फीसदी शादियां जाति देखकर होती हैं


वहीं 2016 के नेशनल काउंसिल ऑफ अप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च के सर्वे के मुताबिक भारत में होने वाली कुल शादियों में सिर्फ 5 फीसदी शादियां ही अंतरजातीय होती हैं. प्रगतिशील समाज के मानकों पर ये आंकड़ा कहीं से भी खरा नहीं उतरता है. ये आंकड़े ये बताने के लिए काफी है कि इतना वक्त बीत जाने के बाद भी हमारा समाज अंतरजातीय और अंतरधार्मिक शादियों को लेकर कितनी संकीर्ण सोच रखता है.
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अंतरजातीय विवाह में नॉर्थ ईस्ट के राज्य ज्यादा आगे हैं. मसलन मिजोरम में सबसे ज्यादा इंटरकास्ट मैरिज होती हैं. मिजोरम की 87 फीसदी आबादी क्रिश्चन है. मिजोरम के बाद अंतरजातीय विवाह करने वाले राज्यों में मेघालय और सिक्किम का नाम आता है. मेघालय में 46 परसेंट शादियां इंटरकास्ट होती हैं जबकि सिक्किम में 38 फीसदी.

अंतरजातीय शादियों में बिहार का रिकॉर्ड कहीं बेहतर
भारत में 95 फीसदी शादियां जाति देखकर की जाती है. जाति देखकर शादी करने वाले राज्यों में मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश और छत्तीसगढ़ का नाम सबसे ऊपर आता है. मध्य प्रदेश की 99 फीसदी शादियां जाति देखकर की जाती हैं. वहीं हिमाचल और छत्तीसगढ़ में 98 फीसदी शादियां सेम कास्ट में होती हैं.

2004-05 के एक आंकड़े के मुताबिक अंतरजातीय विवाह के मामले में बिहार और गुजरात का रिकॉर्ड कहीं बेहतर है. बिहार और गुजरात में 11 फीसदी शादियां इंटरकास्ट होती हैं.

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अंतरजातीय शादियों में बिहार का रिकॉर्ड कहीं बेहतर है


अंतरधार्मिक विवाह के मामलों में भारत की स्थिति और भी खराब है. खासकर हिंदू-मुस्लिम के बीच विवाह में अब और ज्यादा अड़चनें आने लगी हैं. हिंदू-मुस्लिम के बीच विवाह को लेकर लव जिहाद एक नया बवाल बनकर खड़ा हुआ है. इन दोनों धर्मों के बीच के नफरत ने प्यार के अंकुर फूटने में हर वक्त बाधा डाली है.

अंतरजातीय और अंतरधार्मिक शादियों में आड़े आती है समाज की संकीर्ण सोच
2018 के फरवरी महीने में दिल्ली के एक फोटोग्राफर की इसलिए बेहरमी से हत्या कर दी गई क्योंकि वो एक मुस्लिम लड़की से प्यार करता था. अंकित सक्सेना मर्डर केस की कहानी आपने सुन रखी होगी. 2018 की फरवरी में कर्नाटक में एक 20 साल की लड़की को इसलिए प्रताड़ित किया गया क्योंकि उसकी एक मुस्लिम लड़के से दोस्ती थी. जून 2018 में लखनऊ के तन्वी सेठ के पासपोर्ट का मामला सुर्खियों में रहा था. तन्वी सेठ ने आरोप लगाया था कि उसके पति के मुस्लिम धर्म के होने की वजह से पासपोर्ट अधिकारी ने उसका पासपोर्ट बनाने से मना किया था.

समझा जा सकता है कि भारत में अंतरधार्मिक खासतौर पर हिंदू और मुस्लिम के बीच विवाह कितना मुश्किल है. अल जजीरा ने कुछ ऐसे हिंदू मुस्लिम जोड़े से बात की, जिन्होंने विपरित परिस्थितियों के बावजूद शादियां की थीं. बातचीत में दिलचस्प जानकारी सामने आई.

अंतरजातीय और अंतरधार्मिक शादियों में हम इतने पिछड़े क्यों हैं?
एक कहानी 37 साल के मुस्लिम साइंटिस्ट वसीम और 33 साल की हिंदू महिला देवत्तिमा दत्ता की है. इनकी मुलाकात 16 साल पहले हुई थी. दोनों को शादी किए 13 साल हो चुके हैं. हालांकि शादी से लेकर अब तक के सफर में कई ऐसी यादें हैं, जो वो जिंदगीभर नहीं भूल पाएंगे.

वसीम ने बताया कि उनके घरवाले इस शादी के लिए राजी थे. मुश्किल रिश्तेदारों और आसपड़ोस वालों ने शुरू की. वसीम की बिरादरी के लोगों का कहना था कि देवत्तिमा दत्ता अपना धर्म परिवर्तन कर ले. वे लोग हिंदू धर्म की लड़की से शादी के खिलाफ थे. देवत्तिमा दत्ता की फैमिली की तरफ से भी दवाब था. आखिर में दोनों ने घर छोड़ दिया.

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हमारा समाज हिंदू-मुस्लिम के बीच शादियों को प्रोत्साहित नहीं करता


वसीम और देवत्तिमा ने स्पेशल मैरिज एक्ट 1954 के तहत शादी की. ये एक्ट दो बालिगों को धर्म की परवाह किए बिना शादी करने का अधिकार देता है. शादी के कुछ वर्षों बाद दोनों की फैमिली ने भी अपना लिया. लेकिन इसके बाद भी हालात सामान्य नहीं रहे.

वसीम और देवत्तिमा के दो बच्चे हैं. 9 साल का बेटा अंतोरिक रहमान और 7 साल की बेटी इप्शिता दत्ता. बेटी के एडमिशन के वक्त दोनों का धर्म फिर आड़े आया. दरअसल वसीम और देवत्तिमा का बेटा पहले से ही उस स्कूल में पढ़ रहा था. स्कूल का प्रिंसिपल इस बात पर हैरान था कि रहमान की सगी बहन इप्शिता दत्ता कैसे हो सकती है. वसीम को अपना मैरिज सर्टिफिकेट स्कूल में जमा करवाना पड़ा, तब जाकर उनकी बेटी का एडमिशन हो पाया.

धर्म और जाति देखकर नहीं सम्मान और समर्पण से निभाया जाता है रिश्ता
भारतीय समाज में जिस तरह की परंपरा रही है वो अंतरजातीय या अंतरधार्मिक विवाह को कभी प्रोत्साहित नहीं करती. इतना जरूर है कि प्यार और समर्पण से ऐसे रिश्ते निभाना ज्यादा मुश्किल भी नहीं है. ऐसी कई कामयाब शादियों के उदाहरण हैं. कोरा पर जूही खान ने अपनी कहानी ईद और दीवाली की तस्वीरों के साथ शेयर की है.

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अपने पति के साथ जूही खान


जूही मुस्लिम हैं और उन्होंने हिंदू राजपूत लड़के से शादी की है. वो कहती हैं कि कामयाब शादी के लिए धर्म और जाति से ज्यादा प्यार और सम्मान महत्वपूर्ण है. जूही कहती हैं कि उनकी शादी हुए 9 साल बीत गए हैं. इन वर्षों में हमने एकदूसरे को सम्मान और प्यार दिया. मैं अपने पति के लिए करवाचौथ का व्रत रखती हूं और मेरे पति ईद के दिनों में रोजा रखते हैं. हम ईद और दीवाली दोनों सेलिब्रेट करते हैं. इस तरह हम एकदूसरे का सम्मान करते हैं.

जूही बताती हैं कि उनके पति हर सुबह पूजा करते हैं और हर शाम को वो नमाज पढ़ती हैं. वे कुरान शरीफ और हिंदू देवी देवताओं को एकसाथ रखती हैं. ये ऐसे मामलों के आदर्श उदाहरण हैं. हालांकि ये उतने ज्यादा दिखते नहीं. ऐसे ही उदाहरणों को देखकर कोर्ट ने भी कहा है कि अंतरजातीय और अंतरधार्मिक विवाह जितने ज्यादा होंगे उतना ही अच्छा होगा.

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First published: September 12, 2019, 9:23 AM IST
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