जैवविविधता को मानव ने पहुंचाई है इतनी ज्यादा हानि, उबरने में लगेंगे लाखों साल

मानवजनित गतिविधियों (Human Activities) ने जलवायु से ज्यादा जैविविधता को नुकसान पहुंचाया है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

मानवजनित गतिविधियों (Human Activities) ने जलवायु से ज्यादा जैविविधता को नुकसान पहुंचाया है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

जैवविविधता (Biodiversity) को इंसानी गतिविधियों (Human Activity) ने इतना नुकसान (Devastation) पहुंचाया है कि इसकी भरपाई करने में लाखों सालों का समय लग जाएगा.

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इस समय पृथ्वी को जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से बचाने पर बहुत जोर दिया जा रहा है. इनमें से पर्यावरण को वैसे मानवजनित गतिविधियों ने बहुत नुकसान पहुंचाए हैं, लेकिन इसमें शायद सबसे ज्यादा नुकसान जैविविधिता को पहुंचा है. पूरी दुनिया 22 मई को जैविक विविधता के लिए अंतरराष्ट्रीय दिवस मना रही है. एक शोध से पता चला है कि मानवीय गतिविधियों के कारण जैविविधता को होने वाले नुकासन से उबरने के लिए लाखों सालों का समय लगेगा.

जैवविविधता दिवस

इंटरनेशलन डे फॉर बायोलॉजीकल डाइवर्सिटी दुनिया भर में जैवविविधता संबंधी  मुद्दों के प्रति जागरुकता फैलाने के लिए मनाया जाता है. इस साल की थीम ‘वी आर द पार्ट ऑफ द सॉल्यूशन # फॉर नेचर’ यानि ‘हम प्रकृति के लिए समाधान का हिस्सा हैं’ रखी गई है. इस थीम का उद्देश्य लोगों का इस बात पर ध्यान आकर्षित करना है कि जैवविवधिता आज भी बहुत सी संधारणीय विकास संबंधी चुनौतियों का समाधान है.

लाखों साल लगेंगे भारपाई में
इस अध्ययन ने दर्शाया है कि आज साफ पानी के ईकोसिस्टम जैवविविधता में गिरावट की दर है, वह क्रिटेशियस काल के अंत के महाविनाश के समय से भी ज्यादा है जिसने डायनासोर को पूरी तरह से खत्म कर दिया था. जितना विनाश कुछ सदियों से लेकर पिछले कई दशकों में  हुआ है उससे उबरने में लाखों सालों का समय लगेगा.

पृथ्वी पर छठा महाविनाश है ये

इस समय जो जैविविधता का संकट है उसे प्रायः छठा महाविनाश कहा जा रहा है. यह इस सदी की सबसे कठिन चुनौती मानी जा रही है. वैसे को किसी प्रजातियों का विलुप्त होने एक सामान्य प्रक्रिया है कि बड़ी संख्या में उनका  विलुप्त होने चिंता की बात है. अभी जो बड़ी संक्या में प्रजातियां विलुप्त हो रही है और विलुप्त होने की कगार पर हैं, वह मानव जनित गतिविधियों के का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष नतीजा है.



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जैवविविधता (Biodiversity) में हमारे संधारणीय विकास संबंधी बहुत सी समस्याओं का समाधान छिपा है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

इन कारणों से विलुप्त होने लगे जीव

आवासों का विनाश, जलवायु परिवर्तन, अधिकाधिक उपयोग, प्रदूषण और विशाशकारी प्रजातियां ऐसे कारक हैं जिनकी वजह से पृथ्वी के जीवों में बहुत ही तेजी से कमी आई है. जस्टस लेइबिग यूनिवर्सिटी गिसेन की अगुआई में हुए यह अध्ययन एक अंतरराष्ट्रीय टीम ने किया है जिसमें विकासपरक जीवविज्ञानी, जीवाश्मविज्ञानी, भूगर्भ शास्त्री और बहुत से वैज्ञानिक शामिल हुए थे.

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पिछले महाविनाश से तुलना

इस टीम ने इस विनाश क्रम को जानने और उससे उबरने के समय का अनुमान लगाने के लिए आज के संकट को पिछले यानि पांचवे महाविनाश की घटना से तुलना की. 6.6 करोड़ साल पहले हुई उस घटना एक क्षुद्रग्रह के पृथ्वी से टकराव से 76 प्रतिशत प्रजातियों का सफाया हो गया था. जिसमें डायनासोर सभी जानवर खत्म हो गए थे.

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शोध में पाया गया है कि क्रिटेशियस काल के महाविनाश (Mass extinction) की तुलना में इस बार प्रजातियों के खत्म होने की दर बहुत ज्यादा है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)

साफ पानी के जीवों पर अध्ययन

शोधकर्ताओं ने साफ पानी में रहने वाले जीवों के अध्ययन पर ध्यान केंद्रित किया और पिछले 20 करोड़ साल से दुनिया सबसे ज्यादा खतरा झेल रहे इलाके में से 3387 जीवाश्म और जीवित घोंघा प्रजातियों के आंकड़े जमा किए. वैज्ञानिको ने जीवों के प्रजातिकरण और विलुप्त होने की दर का पता लगाया जिससे वे महाविनाश की भारपाई के समय का अनुमान लगा सकें.

तेजी से खो रहे हैं प्रजातियां

इस अध्ययन के नतीजे कम्यूनिकेशन्स अर्थ एंड एनवायर्नमेंट में प्रकाशित हुए हैं और वे बहुत बड़ी चेतावनी देते दिख रहे हैं. अध्ययन में पाया गया है कि इस बार यानि छठे महाविनाश में प्रजातियों के विलुप्त होने की दर पांचवे महाविनाश से कहीं ज्यादा होगी. साल 2120 तक साफ पानी की एक तिहाई प्रजातियों विलुप्त हो जाएंगी. आज प्रजातियों के खोने की दर अब तक के दरों में सबसे ज्यादा है.

महाविनाश के बाद शाकाहारी जीवों को करना पड़ा था खुद में ये बदलाव

पांचवे महाविनाश में क्षुद्रग्रह की घटना बहुत ही कम समय में  हुई थी. लेकिन प्रजातियों के विलुप्त होने की दर करीब 50 लाख साल तक ऊंची ही रही थी. इसके बाद इसकी भरपाई का समय और भी ज्यादा था जो करीप 1.2 करोड़ साल तक चला था जबतक पैदा होने वाली प्रजातियों और विलुप्त होने वाली प्रजातियों में संतुलन की स्थिति नहीं आ गई थी. वैज्ञानिकों का कहना है कि हम इंसानों ने बहुत ही कम समय में ऐसे काम किए है जिनकी भरपाई लाखों करोड़ों साल मे हो पाएगी.

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