International Labour Day 2021: कैसा था श्रमिक दिवस से पहले मजदूरों का हाल

अंतरराष्टीय श्रमिक दिवस (May Day) मजदूरों के हक और सम्मान का एक बड़ा प्रतीक है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

अंतरराष्टीय श्रमिक दिवस (May Day) मजदूरों के हक और सम्मान का एक बड़ा प्रतीक है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

एक मई (1 May) को दुनिया के मजदूर उस दिन की याद में अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस (International Labour Day) मनाते हैं जब अमेरिका में मजदूरों (Workers) को उनका हक मिला था.

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एक मई को दुनिया भर में मजदूर दिवस (International labour day) मनाया जाता है. इसकी शुरुआत साल 1886 में हुई थी जब अमेरिका में मजदूरों की बहुत सारी मांगें मान ली थीं और उनके कार्य संस्कृति (Work Culture) में आमूलचूल परिवर्तन आ गया था. तब से एक मई का दिन मजूदर क्रांति (Labour revolution) की सफलता का ही नहीं दुनिया भर में मजदूरों की हितों और उनके सम्मान के लिए मनाया जाता है. इसे या कामगार दिवस भी कहते हैं. लेकिन मजूदरों की उनके हक आसानी से नहीं मिले थे.

मिला था एक बड़ा हक

19वीं सदी में मजदूरों की हालत बहुत अच्छी नहीं थी. उन्हें अपने हक के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ा था. एक मई को ही 1886 के दिन हजारों मजदूरों ने एक साथ मिलकर हड़ताल की थी. इसमें सबसे प्रमुख मांग काम का समय 15 घंटे से घटाकर 8 घटें करने की थी. इस हड़ताल के बाद उन्हें सम्मान और हक तो मिला ही उनके एक दिन की कार्यावधि 8 घंटे कर दी गई. इसके बाद से धीरे धीरे पूरी दुनिया में एक मई को मजूदर दिवस के रूप में मनाया जाने लगा.

एक हादसे ने लगाई मुहर
यह हड़ताल आसान नहीं रही. 4 मई को शिकागों के हेमार्केट में इस हड़ताल के दौरान बम धमाका हुआ था. इस धमाके की जानकारी तो किसी को नहीं थी, लेकिन पुलिस ने प्रदर्शनकारियों से निपटने और हड़ताल खत्म करने के लिए मजदूरों पर गोलियां चला दी थी और कई मजदूर मर गए थे. इसके बाद से इस हड़ताल में आक्रोश बढ़ गया था.

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अंतरराष्टीय श्रमिक दिवस (International Labour Day) धीरे धीरे पूरे विश्व का मजदूर दिवस बन गया. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)


धीरे धीरे मई दिवस का ही हुआ चुनाव



18वीं सदी के उत्तरार्ध और 19वीं सदी औद्योगिक क्रांति का युग था. इस दौरान दुनिया के तमाम औद्योगिक देशों में मजदूरों की हालत अच्छी नहीं हुआ करती थी. उन्हें एक औजार के रूप इस्तेमाल किया जाता था और उनसे किया जाने वाला बर्ताव मानवीय नहीं कहा जा सकता था. दुनिया भर में मजदूरों की स्थिति सुधारने काम 19वीं सदी के दूसरे हिस्से में धीरे धीरे शुरू हुआ. लेकिन 4 मई की घटना ने दुनिया को हिला कर रख दिया जिसके बाद से बहुत से मजदूरों ने जान दी.

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चल पड़ा सिलसिला

1989 में पेरिस में एक अंतरराष्ट्रीय मीटिंग में तय गया है कि साल 1890 में एक मई को शिकागो प्रदर्शन को याद करते हुए मजदूर दिवस मनाया जाएगा. एक मई 1890 में अमेरिका और यूरोप में प्रदर्शन किए गए और फिर यह सिलसिला चल पड़ा. हैरानी की बात है जिस अमेरिका की एक घटना ने मई दिवस को मजदूर दिवस में बदलने में भूमिका निभाई उसी अमेरिका में मजदूर दिवस सितंबर माह के पहले सोमवार को मनाया जाता है.

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अंतरराष्टीय श्रमिक दिवस (International Labour Day) और मई दिवस दो अलग उत्सव हैं. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)


धीरे धीरे बदली मजदूरों की स्थिति

मजूदरों की स्थिति में बदलाव और दुनिया में मजूदर दिवस मनाने का सिलसिला एक ही दिन की बात नहीं थी. 20वीं सदी में मजदूरों से मानवों की तरह बर्ताव और सम्मान देखने की बातें जमीन पर दिखाई देने लगीं थी. पहले मजदूरों की स्थिति और औजारों को बेहतर केवल उत्पादन या लाभ कमाने के लिए बेहतर किया जाता था. लेकिन 20 सदी के मध्य में यह साबित हो किया गया था कि मजदूर मशीन नहीं हैं और उनसे इंसानों की तरह बर्ताव उत्पादन में भी वृद्धि कर सकता है. इसके बाद बीसवीं सदी में मानवाधिकारों मांगों के जरिए भी मजदूरों की स्थिति में काफी सुधार हुआ.

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ऐसा नहीं है कि अब दुनिया भर में मजूदरों की शोषण खत्म हो गया है. आज भी दुनिया भर में मजदूरों का शोषण किया जाता है. लिंग के आधार पर उनकी मजदूरी अलग अलग होती है. ऐसा असंगठित क्षेत्रों में ज्यादा होता है.  इसके लिए कानून जरूर बने हैं लेकिन अभी इस पर बहुत काम होना बाकी है.
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