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    ईरान से हथियारों की पाबंदी हटना क्या मिडिल-ईस्ट में भूचाल ला देगा?

    ईरान की आक्रामकता को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र ने उसपर पाबंदी लगा दी थी- सांकेतिक फोटो (CNN)
    ईरान की आक्रामकता को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र ने उसपर पाबंदी लगा दी थी- सांकेतिक फोटो (CNN)

    ईरान की आक्रामकता (aggression of Iran) को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र (United Nations) ने उसपर पाबंदी लगा दी थी. ये प्रतिबंध हाल ही में हटा है, हालांकि अमेरिका अब भी अपने प्रतिबंध हटाने को राजी नहीं (America to reimpose restrictions).

    • News18Hindi
    • Last Updated: October 28, 2020, 6:49 AM IST
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    कुछ दिनों पहले ही संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (United Nations Security Council) ने ईरान पर लगे हथियार प्रतिबंध को खत्म कर दिया. यानी अब ये देश युद्ध में काम आने वाले भारी हथियारों की खरीदी-बिक्री कर सकता है. इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप (Donald Trump) ने ईरान पर लगाए प्रतिबंधों को रिन्यू करने की बात की. यानी अमेरिका अब भी ईरान से अपनी दुश्मनी निभा रहा है. वैसे ईरान को मिली इस छूट के बाद मध्य-पूर्व (middle-east) में हालात काफी बदल सकते हैं, जिसका असर दूर तक जाएगा.

    कब और क्यों लगी थी रोक 
    मार्च 2007 में सुरक्षा परिषद ने ईरान पर हथियारों के व्यापार को लेकर प्रतिबंध लगा दिया था. ये वहां के परमाणु कार्यक्रम को रोकने के लिए था. इसी क्रम में साल 2010 में भी प्रतिबंध लगाया गया कि ईरान भारी हथियार नहीं खरीद सकता जैसे लड़ाकू हेलीकॉप्टर और मिसाइलें. साथ ही ये भी था कि कोई भी देश उसकी मदद करेगा तो उसे भी संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंधों का सामना करना होगा.

    ईरान को मिली इस छूट के बाद मध्य-पूर्व में हालात काफी बदल सकते हैं- सांकेतिक फोटो (Pixabay)

    इसमें साल 2015 में ढील मिली


    ओबामा के शासनकाल में अमेरिका समेत ब्रिटेन, फ्रांस, चीन, रूस, जर्मनी और ईरान के बीच में परमाणु कार्यक्रम पर एक समझौता हुआ. इस समझौते को ज्वाइंट कम्प्रिहेंसिव प्लान ऑफ एक्शन (जेसीपीओए) कहा गया. इसके तहत ईरान को अपने परमाणु कार्यक्रम सीमित करने को कहा गया और बदले में कुछ सालों की रिव्यू के बाद यूएन उसपर से पाबंदी हटाने को राजी हो गया.

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    समझौते के तहत यूएन ने ईरान से पाबंदी हटा ली
    इस बीच अमेरिका स्नैपबैक की घोषणा कर दी. यानी वो सारे प्रतिबंध जस के तस रखने वाला है. उसमें अमेरिका की तरफ से कोई छूट नहीं मिलेगी. सुरक्षा परिषद के 15 सदस्यों में से 13 सदस्य इस बात को अमान्य ठहरा चुके हैं लेकिन ट्रंप को इससे फर्क नहीं पड़ रहा. कुल मिलाकर ईरान अब अमेरिका के अलावा बाकी सारे देशों से हथियार लेने-देने के लिए आजाद है.

    ईरान से पाबंदी हटने का सबसे बड़ा असर इजरायल पर होगा-सांकेतिक फोटो (militarist)


    इजरायल डर के साये में 
    अमेरिका और ईरान के बीच दुश्मनी काफी पुरानी है लेकिन इस बीच ये समझना जरूरी है कि आखिर मिडिल ईस्ट में काफी ताकतवर इस देश पर से पाबंदी हटने के क्या नतीजे हो सकते हैं. इसका सबसे बड़ा असर इजरायल पर होगा, जो चारे ओर से मुस्लिम मुल्कों से घिरा हुआ एकमात्र यहूदी देश है. बता दें कि ईरान और इजरायल के बीच दुश्मनी में अमेरिका भी एक कारण है, जो लगातार इजरायल का पक्ष लेते हुए ईरान को अलग करने की कोशिश करता रहा.

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    क्यों है ईरान और इजरायल में दुश्मनी
    इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ईरान के पाबंदी हटने को अपने देश की सुरक्षा पर खतरा बताया. इन दोनों देशों में हमेशा से ही समस्या चली आ रही है. साल 1979 में हुई ईरानी क्रांति की वजह से उस देश में कट्टरपंथी नेता सत्ता में आ गए. तब से ही ईरान कह रहा है कि इजरायल ने मुस्लिमों की जमीन पर कब्जा कर रखा है और वो उन्हें वहां से हटाना चाहता है.

    कर रहे छद्म लड़ाइयां 
    इसके लिए सीधी जंग की बजाए ईरान उन समूहों को समर्थन देता है जो इजरायल पर वार करें, जैसे हिज्बुल्ला और फलस्तीनी संगठन हमास. इधर इजरायल भी ईरान को उसकी परमाणु शक्ति के कारण खतरे की तरह देखता है. वो मानता है कि ईरान के पास परमाणु हथियार नहीं होने चाहिए वरना वो इजरायल पर इसका इस्तेमाल कर सकता है.

    मिडिल ईस्ट के सारे ही मजबूत देश हथियारों की होड़ लगा सकते हैं- सांकेतिक फोटो (Pixabay)


    सऊदी का पलड़ा हो सकता है कमजोर 
    सऊदी अरब मिडिल ईस्ट का दूसरा मजबूत खेमा है, जो ईरान से दुश्मनी रखता है. इसकी वजह धर्म है. सऊदी जहां सुन्नी बहुल देश है, वहीं ईरान शियाओं का देश. दोनों ही देश अपना धार्मिक वर्चस्व चाहते हैं. सऊदी में चूंकि मक्का-मदीना हैं इसलिए वो खुद को बेहतर मानता है. वहीं ईरान तेल के भंडार के कारण अपने को मजबूत समझता रहा. अब ईरान के हथियारों पर छूट मिलने पर हो सकता है कि वो सैन्य तौर पर और मजबूत हो, जिससे सऊदी में डर पैदा हो सकता है. पहले से ही दोनों एक-दूसरे की सीमा पर आतंक पैदा करते रहे. ऐसे में हालात और मुश्किल हो सकते हैं.

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    मध्य-पूर्व का एक तीसरा काफी मजबूत पक्ष तुर्की और सहयोगी देश हैं. तुर्की अपने मौजूदा लीडरशिप के साथ तेजी से उभरा है. ये देश खुद को मध्य-पूर्व में सबसे ताकतवर दिखाने की कोशिश में है. यही वजह है कि वो लगातार सारे ही मुस्लिम देशों के मुद्दों पर अपना पक्ष रख रहा है. वैसे ईरान से तुर्की की सीधी दुश्मनी तो नहीं लेकिन ताकत की लड़ाई जरूर दिखती है. यूएसए टुडे की एक रिपोर्ट के मुताबिक ऐसे में हो सकता है कि इन दोनों देशों के अलावा मिडिल ईस्ट के सारे ही देश हथियारों की होड़ में लग जाएं.
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