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US-Iran Tension : जब 444 दिनों तक ईरान के चंगुल में छटपटाता रहा था अमेरिका

Vivek Anand | News18Hindi
Updated: January 8, 2020, 6:17 PM IST
US-Iran Tension : जब 444 दिनों तक ईरान के चंगुल में छटपटाता रहा था अमेरिका
ईरान ने अमेरिकी नागरिकों को 444 दिनों तक बंधक बनाए रखा था

ईरान (Iran) ने 1979 में अमेरिका (America) के साथ जो किया, उसकी याद से आज भी अमेरिकी सिहर जाते हैं...

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  • Last Updated: January 8, 2020, 6:17 PM IST
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दुनियाभर में अमेरिका-ईरान जंग (America Iran War) की चर्चा है. हर पल ये अंदेशा बना हुआ है कि दोनों देश एकदूसरे के खिलाफ प्रतिक्रिया में क्या कदम उठाते हैं. एक तरफ दुनिया का सबसे ताकतवर मुल्क अमेरिका है तो दूसरी तरफ ईरान को भी कम समझना भूल साबित होगी. ईरान ने 1979 में अमेरिका के साथ जो किया, उसकी याद से आज भी अमेरिकी सिहर जाते हैं.

1979 में दुनिया का सबसे ताकतवर मुल्क पूरे 444 दिनों तक ईरान के चंगुल में छटपटाता रहा था. अमेरिका ने अपनी पूरी ताकत से लेकर रणनीति और कूटनीति सब आजमा ली, संयुक्त राष्ट्र से शांति के प्रस्ताव भिजवाए, ईरान का समर्थन करने वाले देशों से समझौता करवाने की कोशिश करवाई, लेकिन सारी कोशिशें बेकार गईं. ईरान ने 1979 में अमेरिकी सरकार और वहां की सेना की नाक रगड़वा दी थी.

1979 में ईरान ने ऐसा क्या किया था अमेरिका के साथ
1979 में अमेरिकी सरपरस्त ईरान की शाह की सत्ता को इस्लामिक नेता अयातुल्लाह खामनेई के नेतृत्व में वहां की जनता ने उखाड़ फेंका. शाह को भागकर अमेरिका की शरण लेनी पड़ी. ईरान में शाह मोहम्मद रजा पहलवी के खिलाफ इतनी नाराजगी थी कि अयातुल्लाह खामनेई के नेतृत्व वाली इस्लामिक सरकार ने अमेरिका से कहा कि वो शाह को ईरान के हवाले कर दे.  लेकिन अमेरिका ने ऐसा करने से इनकार कर दिया. इसके बाद ईरान में इस्लामिक सत्ता स्थापित करने वाले आंदोलनकारियों ने अमेरिका पर कहर बरपा दिया. पूरे 444 दिनों तक अमेरिका ईरान के हाथों छटपटाता रहा.



4 नवंबर 1979 को ईरान में आंदोलनकारियों ने तेहरान के अमेरिकी दूतावास पर धावा बोल दिया और वहां के करीब 98 अधिकारियों- कर्मचारियों को बंधक बना लिया. आंदोलनकारियों ने इसके दूसरे दिन यानी 5 नवंबर 1979 को ब्रिटेन दूतावास को भी अपने कब्जे में ले लिया. हालांकि बाद में उन्होंने ब्रिटिश दूतावास को खाली कर दिया. 4 नवंबर 1979 से ईरान में शुरू हुआ बंधक संकट पूरे 444 दिनों तक चला. इस दौरान अमेरिका में सत्ता परिवर्तन तक हो गया. इतिहास में ये अब तक का सबसे बड़ा बंधक संकट है.



iran hostage crisis in 1979 when america was in the clutches of iran for 444 days
ईरान का बंधक संकट पूरी दुनिया में चर्चित रहा था


अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर नहीं खत्म करवा पाए बंधक संकट
ईरान के आंदोलनकारियों ने आरोप लगाया था कि अमेरिकी दूतावास के राजनयिक और कर्मचारी अमेरिकी जासूसी यूनिट का हिस्सा हैं और उन्हें दूतावास में इस बात के सबूत मिले हैं. उस वक्त के अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने ईरान के बंधक संकट को खत्म करने की तमाम कोशिशें कीं लेकिन वो सफल नहीं हो पाए.

जिमी कार्टर ने ईरान से तेल का आयात करना बंद कर दिया. कार्टर के आदेश पर अमेरिका में ईरान की सारी संपत्ति जब्त कर ली गई. अमेरिका में ईरान के सारे 183 राजनयिकों को हटा दिया गया. यहां तक की यूएन की सिक्योरिटी काउंसिल ने 31 दिसंबर 1979 को एक प्रस्ताव पारित किया. इसमें ईरान को 7 जनवरी तक की मोहलत दी गई कि वो अमेरिकी बंधकों को छोड़ दे, वरना उस पर कई तरह के प्रतिबंध लगाए जाएंगे. लेकिन ईरान बंधकों को छोड़ने पर राजी नहीं हुआ.

अयातुल्लाह खामनेई के कहने पर कुछ बंधकों को रिहा किया गया
ईरान सिर्फ अमेरिका को तड़पते हुए देखना चाहता था. हालांकि उसने थोड़ी रहमदिली भी दिखाई. इस दौरान कुछ बंधकों को रिहा भी किया गया. पहली बार 15 नवंबर 1979 को एक इटैलियन कुक को रिहा किया गया. इसके बाद 17 नवंबर 1949 को अयातुल्लाह खामनेई ने कहा कि बंधकों में से सभी महिलाओं, बच्चों और अश्वेत नागरिकों को रिहा कर दिया जाए, अगर वो जासूसी के आरोपी नहीं हैं तो.

इसके अगले दिन आंदोलनकारियों ने ऐलान किया कि वो 13 बंधकों रिहा कर देंगे. इसमें 8 अश्वेत नागरिक और 5 महिलाएं थीं. अगले दो दिन में उन्होंने ऐसा किया भी. इसके बाद 22 नवंबर 1979 को 5 गैर अमेरिकी नागरिकों को भी रिहा कर दिया गया. लेकिन बाकी बचे 52 अमेरिकी बंधक आंदोलनकारियों के कब्जे में रहे.

फिल्मी स्टाइल में ईरान की कैद से आजाद हुए 6 बंधक
इस दौरान 6 अमेरिकी बंधक फिल्मी स्टाइल में आंदोलनकारियों के कब्जे से फरार हो गए. उन्हें आजाद करवाने में कनाडा की सरकार ने मदद की थी. 4 नवंबर को जब आंदोलनकारी अमेरिकी दूतावास को अपने कब्जे में ले रहे थे, 6 अमेरिकियों को कनाडा दूतावास ने अपने यहां छिपा लिया. कनाडा की सरकार ने उन्हें अपना नागरिक बताते हुए फर्जी पासपोर्ट बनवाए और उन्हें ईरान से निकाला. ईरान को इसका पता दो महीने बाद चला. इसमें अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए का बड़ा रोल था. इस पूरे वाकये पर 2012 में अर्गो नाम की फिल्म भी बनी.

iran hostage crisis in 1979 when america was in the clutches of iran for 444 days
बंधक संकट खत्म करने की सारी कोशिशें फेल रही थीं


जब बंधक संकट खत्म करने के लिए अमेरिका ने चलाया ऑपरेशन ईगल क्लॉ
बंधक संकट खत्म करने के लिए अमेरिका ने तमाम तरह की कोशिशें कीं. ईरान के राजनयिकों को देश से निकाल दिया. ईरान पर आर्थिक समेत कई तरह के प्रतिबंध लगा दिए. 9 अप्रैल 1980 को अमेरिकी सरकार ने सैन्य कार्रवाई के संकेत दिए. वाशिंगटन की तरफ से नेवल अटैक के संकेत दिए गए. इसके जवाब में ईरान ने धमकी दी कि अगर अमेरिका ने किसी भी तरह की सैन्य कार्रवाई की तो वो अमेरिकी दूतावास में आग लगाकर सभी बंधकों को मार डालेंगे.

अप्रैल 1980 तक जिमी कार्टर की सरकार पूरी तरह से हताश और निराश हो चुकी थी. आखिर में अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने एक रिस्की रेस्क्यू ऑपरेशन की प्लानिंग की. अमेरिकी सेना ने इसे ऑपरेशन ईगल क्लॉ का नाम दिया. इस प्लान के मुताबिक अमेरिकी वायुसेना के सैनिकों को दूतावास के कंपाउंड में उतारा जाना था और वहां से अमेरिकी सेना के जांबाजों को बंधकों को छुड़ाकर ले जाना था.

लेकिन जिस दिन इस ऑपरेशन को अंजाम देना था, रेगिस्तान में भयावह आंधी-तूफान उठा. इसकी चपेट में आकर अमेरिका के कई विमानों में तकनीकी गड़बड़ी आ गई. एक बहुत बड़ा ट्रांसपोर्ट प्लेन C-130 टेक ऑफ करते ही क्रैश हो गया. इस हादसे में 8 अमेरिकी सैनिक मारे गए. जिमी कार्टर को ऑपरेशन ईगल क्लॉ को कैंसिल करना पड़ा.

ईरान को ऑपरेशन ईगल क्लॉ के दौरान मारे गए 8 अमेरिकियों के शव मिल गए थे. उन्होंने उनके शवों को अमेरिकी दूतावास के कंपाउंड में रखवा दिया.

बंधकों ने सुनाई थी टॉर्चर की रूह कंपा देने वाली कहानी
इस पूरे बंधक संकट में जिन अमेरिकियों को आंदोलनकारियों ने अपने कब्जे में रखा था. उन्होंने बाद में रूह कंपा देने वाली कहानी सुनाई थी. बंधक बनाए गए अमेरिकियों की आंखों पर पट्टी बांधकर रखा जाता था. उन्हें एकदूसरे से बात करने की इजाजत नहीं थी. टीवी चैनलों के सामने आंखों पर पट्टी बांधकर ही उनकी परेड करवाई जाती.

बंधकों के लिए एक-एक दिन भारी गुजरता. उन्हें नहीं पता था कि वो कभी आजाद हो भी पाएंगे या नहीं. अगर बात बिगड़ी तो उन्हें किस तरह की मौत दी जा सकती है? पूरे 444 दिन अमेरिकी बंधकों ने नर्क से भी बदतर जिंदगी बिताई.

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444 दिन बाद खत्म हुआ था ईरान का बंधक संकट


444 दिन बाद कैसे हुई बंधकों की रिहाई
बंधक संकट की सुनवाई इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस में हुई. 24 मई 1980 को कोर्ट ने कहा कि ईरान बंधकों को रिहा करे, बदले में अमेरिका, ईरान की जब्त की गई संपत्ति को वापस लौटाएगा. लेकिन ईरान ने इस फैसले को मानने से इनकार कर दिया. हालांकि इस्लामिक नेता अयातुल्लाह खामनेई ने यहां थोड़ी नरमी और दिखाई और 10 जुलाई 1980 को 28 साल के एक बीमार बंधक रिचर्ड क्वीन को रिहा कर दिया. इस दौरान शाह के बेटे की गोली मारकर हत्या कर दी गई और अमेरिका के अस्पताल में कैंसर का इलाज करवाते हुए शाह भी चल बसा.

12 सितंबर 1980 को ईरान के शीर्ष नेता अयातुल्ला खामनेई ने कुछ शर्तों के साथ बंधकों की रिहाई कबूल की. उनकी शर्तें थीं- अमेरिका शाह की सारी संपत्ति ईरान को लौटाएगा, ईरान पर वो किसी भी तरह का दावा नहीं करेगा, अमेरिका में जब्त की गई ईरान की संपत्ति को वापस करेगा और ईरान में किसी भी तरह का हस्तक्षेप न करने की गारंटी देगा. एक शर्त अमेरिका के माफी मांगने की भी थी. लेकिन बाद में उसे हटा दिया गया.

2 नवंबर 1980 को अमेरिकी संसद ने बंधक संकट को खत्म करने के लिए खामनेई की शर्तों को मानने का प्रस्ताव मंजूर कर लिया. इसके अगले दिन अयातुल्लाह खामनेई ने आंदोलनकारियों से अमेरिकी बंधकों को ईरान की सरकार को सौंपने की अपील की. अमेरिका ने इसे बड़ी कामयाबी माना.

जब खत्म होते-होते फिर अटक गया बंधक संकट
बंधक संकट खत्म करने के लिए अमेरिका और ईरान के बीच अल्जीरिया ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई. 21 दिसंबर 1980 को ईरान की तरफ से कहा गया कि अमेरिका अल्जीरिया के बैंक में 24 बिलियन डॉलर की रकम और शाह की दौलत के बराबर सोना बंधकों को छोड़ने के एवज में रखे. अमेरिका ने ऐसा करने से इनकार कर दिया.

4 जनवरी 1981 को ईरान की सरकार ने दावा किया कि बंधक अब सरकार के कंट्रोल में सुरक्षित हैं. इस बीच ईरान ने 24 बिलियन डॉलर की जिद छोड़ दी. लेकिन अमेरिका और ईरान के बीच बंधकों को छोड़ने के लिए एक फाइनेंशियल एग्रीमेंट हुआ. रोनाल्ड रीगन के अमेरिका के राष्ट्रपति बनने के बाद 20 जनवरी 1981 को अमेरिकी बंधकों को ईरान ने छोड़ा. पूरे 444 दिन बाद.

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First published: January 8, 2020, 5:16 PM IST
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