क्या है वह खास गंध जो टिड्डियों को लाखों की तादाद में कर देती है इकठ्ठा

शोध में पाया गया कि टिड्डी एक खास तरह की गंध निकालते हैं जिसे पहचान कर वे एक दूसरे के साथ आ जाते हैं.

टिड्डियों (Locusts) पर हुए नए शोध में वैज्ञानिकों ने उस खास गंध (Scent) के बारे में पता लगाया है जिससे वे एक दूसरे के प्रति आकर्षित हो कर हजारों लाखों के झुंड (Swarms) बना लेते हैं.

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    दुनिया में कोरोना वायरस (Corona virus) ही अकेली बड़ी समस्या नहीं है.  इस साल बड़ी तादात में टिड्डियों (Locust) ने भी झुंड के झुड के बनाकर अफ्रीका (Africa) से लेकर भारत (India) तक ऐसी तबाही मचाई है, जिसने कृषि विज्ञानियों (Agriculture scientists) को खासा परेशान कर दिया है. वैज्ञानिकों ने भी अब कमर कस ली कि वे ये जानकर ही रहेंगे कि आखिरी ये कीट पतंगे  (pests)इतने विशाल और विनाशाकारी झुंड (Swarms) बना कैसे लेते हैं.

    नुकसान पहुंचाने वाला जीव नहीं होता टिड्डी
    आमतौर पर टिड्डी नुकसान पहुंचाने वाला जीव नहीं होता. लेकिन यही अकेले टिड्डी बदल सकते हैं और उनके रंग बदलने के साथ अपने जैसे बहुत सारे लाखों टिड्डियों के साथ मिल कर वे विनाशकारी बादल बन कर खेतों पर टूट पड़ते हैं और उन्हें नष्ट कर देते हैं.

    तो कैसे आता है यह बदलाव
    ऐसे में सवाल उठता है कि आखिरी इन टिड्डिया में यह बदलाव कैसे आ जाता है कि यह एक खतरनाक झुंड बना लेते हैं. बुधवार को नेचर जर्नल में प्रकाशित अध्ययन में इस परिघटना के पीछे के रहस्य को उजागर किया है. दरअसल टिड्डी एक तरह की रासायनिक पदार्थ निकालते हैं जो एक बेकाबू कर देने वाली खुशबू की तरह होता है जिससे वे अपने आसपास के इलाके में अपने जैसे ही दूसरे टिड्डियों को आकर्षित करते हैं और उनकी और आकर्षित होते हैं

    रोका जा सकता है झुंड बनने से
    इस तरह वे मिलते चले जाते हैं और उनकी संख्या हजारों से लाखों तक पहुंच जाती है. इस खोज से अब कई संभावनाओं ने जन्म लिया है जिससे उम्मीद की जा रही है कि इन टिड्डियों को बड़ी तादात बनने से रोका जा सकता है. इसमें यह भी कोशिश शामिल है कि इन टिड्डियों में जेनेटिक इंजिनियरिंग के जरिए उन रिसेप्टर्स को ही खत्म कर दिया जाए जिससे ये झुंड बनाने की प्रवृति ही खो दें और नुकसानदायक संख्या का समूह न बनें.

    locust attack threat,
    वैज्ञानिकों ने उस जीन का पता भी लगा लिया है जो इस गंध के रिसेप्टर के लिए जिम्मेदार है. (प्रतीकात्मक तस्वीर)


    क्या किया गया अध्ययन
    हाल ही में अफ्रीका से पाकिस्तान में इन टिड्डियों ने तहलका मचाते हुए भारत तक में फसलों को बर्बाद कर दिया था. इससे कई देशों में खाद्य संकट तक आ गया था. इस अध्ययन में प्रवासी टिड्डियों का खास तौर पर अध्ययन किया गया जो दुनिया की सबसे विस्तृत रूप से फैली कीड़ों की प्रजाति है. इसमें सबसे ज्यादा ध्यान टिड्डियों से निकलने वाले बहुत सारे पदार्थों के रासायनिक अध्ययन और उनके प्रभावों पर दिया गया.

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    क्या है वह पदार्थ
    यह पाया गया कि एक खास किस्म का पदार्थ 4 विनाइलएनिसोल (4-vinylanisole) है जिसे 4VA भी कहते हैं, जो टिड्डियों से निकलता है. इसी की वजह से ये कीड़े एक साथ जमा होने लगते हैं. यह अध्ययन में प्रोफेसर ली कैंग की अगुआई में चाइनीज एकेडमी ऑफ साइंसेस की एक टीम ने किया है. इस टीम ने पाया कि जब केवल इन चार ही टिड्डियों को एक पिंजरे में बंद किया गया तभी से 4VA को निकालने लगे. टीम ने इस बात का अध्ययन किया कि कैसे ये गंध को पहचानते हैं. उन्होंने पाया कि टिड्डियों के एंटीना के हिस्से से वे झुंड प्रक्रिया को भी पहचानते हैं और उसके मुताबिक काम करते हैं.

    पैदा करवा दी उन्नत प्रजाति
    शोधकर्ताओं ने उस जीन का भी पता लगाया जो इस गंध को पहचानने की प्रक्रिया के लिए आवश्यक है. इसके बाद उन्होंने टिड्डी की उन्नत प्रजाति भी पैदा करवाई जिसमें यह Or35 जीन नहीं था.

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    अध्ययन में कहा गया कि नए टिड्डी पुराने टिड्डियों की तरह 4VA के प्रति आकर्षित नहीं हो रहे थे. इस अध्ययन ने इन खतरनाक कीड़ों से निपटने के लिए कई संभावनाओं के जन्म दिया है.  जेनेटिक रूपांतरण के अलावा 4VA के उत्पादन की पहचान कर उसे रोककर विशाल झुंड बनने से रोकने जैसे कई उपाय अपनाए जा सकते हैं.

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