क्या गुमनामी बाबा ही नेताजी सुभाष चंद्र बोस थे, उनके पास से मिला सामान दे सकता है जवाब

उनकी कुछ बातें नेताजी के इतने करीब हैं कि लगता है कि वो कोई नहीं सुभाष ही थे. उनसे जुड़े सवालों की जांच के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने पिछले दिनों जस्टिस विष्णु सहाय की अगुवाई में एक आयोग का गठन किया था, जिसने राज्य सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंप दी है.

Sanjay Srivastava | News18Hindi
Updated: July 25, 2019, 12:06 AM IST
Sanjay Srivastava
Sanjay Srivastava | News18Hindi
Updated: July 25, 2019, 12:06 AM IST
क्या गुमनामी बाबा ही नेताजी सुभाष चंद्र बोस थे. पिछले 30 सालों से ये बात लगातार जोर पकड़ती रही है. वो अयोध्या में करीब 15 सालों तक रहे. 1985 में यहीं उनका निधन हो गया. उनके पास जो सामान मिले, वो इशारा करते हैं कि नेताजी से गुमनामी बाबा का एक खास रिश्ता तो जरूर था. आखिर वो थे कौन? इन्हीं सब बातों की पड़ताल के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने कुछ साल पहले जस्टिस विष्णु सहाय की अगुवाई में एक आयोग का गठन किया था, जिसने अपनी रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंप दी है.

इस रिपोर्ट के विवरण और निष्कर्ष तो फिलहाल सामने नहीं आए हैं लेकिन ये बात फिर जोर पकड़ने लगी है कि हो ना हो गुमनामी बाबा ही नेताजी सुभाष चंद्र बोस थे, जो रूस से चीन होते हुए भारत आए और फिर गुमनामी की बाकी जिंदगी अयोध्या में गुजार दी.

गुमनामी बाबा के निधन के बाद भी मामला शायद इसको लेकर आवाज भी नहीं उठाते, अगर उनके पास ढेरों ऐसे सामान नहीं मिलते, जो साफतौर पर ये नहीं कहते कि ये सामान तो नेताजी सुभाष चंद्र बोस से ताल्लुक रखते हैं. उनके पास मिलने वाला हर सामान यही कहानी कह रहा था.

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शायद इसी वजह से इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच को ये फैसला देना पड़ा कि अगर फैजाबाद में रहने वाले गुमनामी बाबा, जिनके बारे में लोगों का विश्वास था कि वो नेताजी सुभाषचंद्र बोस हैं और उनके पास आने-जाने वाले लोगों और उनके कमरे में मिली तमाम वस्तुओं से इस बात का तनिक भी आभास होता है कि लोग गुमनामी बाबा को नेताजी के रूप में मानते थे तो ऐसे व्यक्ति की धरोहर को राष्ट्र की धरोहर के रूप में सुरक्षित रखा जाना चाहिए.

संग्रहालय में रखा है गुमनामी बाबा का सामान 
इसी आदेश के बाद उत्तर प्रदेश शासन ने तत्कालीन जिलाधिकारी को आदेश दिया कि गुमनामी बाबा के सामान को संग्रहित करने के लिए निर्माणाधीन राम कथा संग्रहालय का चयन किया गया है, तब गुमनामी बाबा के सामान को इस संग्रहालय में पहुंचा दिया गया है. वहां जाकर इसे देखा जा सकता है. जो भी इन सामानों को देखता है और गुमनामी बाबा से जुड़ी बातों को सुनता है, उसे लगने लगता है कि ये शख्स कोई और नहीं बल्कि नेताजी ही थे. हालांकि आधिकारिक तौर पर ये कहा जाता है कि नेताजी का निधन ताइवान में एक हवाई दुर्घटना में अगस्त 1945 में हुआ था. हालांकि इस पर बहुत से लोगों ने तात्कालिक स्थितियों के कारण कभी विश्वास नहीं किया.
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गुमनामी बाबा के पास से मिली चीजें, जिनका इस्तेमाल नेताजी सुभाष चंद्र बोस करते थे


ये कहानी तब शुरू होती है..
इस कहानी की शुरुआत 16 सितंबर 1985 से होती है. पुलिस और फौज के कुछ अफसरों और जवानों की मौजूदगी करीब दो दर्जन लोग तिरंगे में लपेट कर फैजाबाद के गुफ्तार घाट पर गुमनामी बाबा नाम से इस शख्स का दाह संस्कार करते हैं. वो गुपचुप तरीके से तड़के के सन्नाटे में किया जाता है. आमतौर पर इस घाट पर सामान्य अंतिम संस्कार नहीं होते. यहां पर गुमनामी बाबा का जो स्मारक बना, उस पर जन्मतिथि की जगह वही तारीख लिखी है, जिस दिन सुभाष बोस पैदा हुए थे. मरने के दिन को लिखने की बजाए वहां तीन प्रश्नवाचक निशान बना दिये गए.

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उनके सामान नेताजी से एक कड़ी जरूर जोड़ते हैं
इसके बाद अगला काम था गुमनामी बाबा के सामानों को देखना. यही वो कड़ी थी, जिसने नेताजी से मृत्यु से जुड़े रहस्य को और गहरा दिया या ये कहिए कि एक नई कड़ी जोड़ दी. उनके सामानों में सारे सामान ऐसे थे, जो केवल और केवल नेताजी से खास रिश्ते की ओर इशारा कर रहे थे. इसमें सुभाष बोस के माता-पिता और परिवार की तस्वीरें, नेताजी के दर्जनों गोल चश्मे, वो सिगार जो वो पिया करते थे, टाइपराइटर, उनके हाथों से लिखे गए खत, 555 सिगरेट और शराब की बोतलें, रोलैक्स के साथ वो घड़ियां, जो अक्सर नेताजी के हाथों में देखी जाती थीं. अखबारों की वो कटिंग्स, जिसमें नेताजी संबंधी खबरें थीं.

साथ ही मिलने वाले सामानों में आजाद हिंद फौज की वर्दी, जापानी, जर्मन और अंग्रेजी साहित्य, सैकड़ों टेलीग्राम, जो उन्हें भगवनजी के नाम से भेजे गए थे. शाहनवाज और खोसला कमेटी की रिपोर्ट और तमाम ऐसी बातें जो नेताजी सुभाष से ताल्लुक रखतीं थीं. दरअसल इन्हीं के बाद तमाम लोगों को लगने लगा कि गुमनामी बाबा कोई और नहीं सुभाष ही थे. जब सुभाष की भतीजी कोलकाता से आईं और उन्होंने इन सामानों को देखा, तो उनका भी कहना था कि ये सामान सुभाष और उनके परिवार से संबंधित हैं.

कहां से फैजाबाद आए...किसी को नहीं पता
फैजाबाद में वो 1970 के दशक में पहुंचे थे. कहां से आए थे ये किसी को नहीं पता था. किसी ने उनका चेहरा भी नहीं देखा. आजतक कोई ऐसा शख्स भी नहीं मिला, जिसने ये दावा किया हो कि वो गुमनामी बाबा को सामने से देख चुके हैं. हालांकि अयोध्या और फैजाबाद में उनके दो तीन ऐसे विश्वस्त लोग थे, जो उनसे मिलते थे, उसमें एक डॉक्टर भी थे, लेकिन उन्होंने हमेशा अपना मुंह बंद किये रखा.

गुमनामी बाबा के पास से मिली नेताजी की परिवारिक फोटो


गुमनामी बाबा की सेवा के लिए नेपाल की एक सरस्वती नाम की महिला रहती थी, जिसे वो जगदंबे बोलते थे, वो उनके निधन के बाद गायब हो गई. बताया जाता है कि इस महिला का ताल्लुक़ नेपाल के राजघराने से था लेकिन ये पढ़ी-लिखी नहीं थीं. कुल मिलाकर गुमनामी बाबा की कहानी में ढेर सारे रहस्यमयी मोड़ हैं. ढेर सारी कड़ियां-जो ये भी कहती हैं कि हो ना हो ये शख्स तो वही था लेकिन इस निष्कर्ष पर सवाल करने वाले भी कोई कम नहीं थे, जिन्हें लगता था कि भला सुभाष जी जैसे शख्स को ऐसी गुमनामी में रहने की क्या जरूरत होती. कुछ इस पर सवाल उठाते हैं कि क्यों कभी इस बाबा से मिलने सुभाष का कोई करीबी या उनके भाई नहीं आए.

मकानमालिकों ने भी कभी नहीं देखा
खैर 70 के दशक में जब गुमनामी बाबा पहली बार अयोध्या आए तो किसी ने उन्हें नोटिस नहीं किया. उसके बाद वो बस्ती चले गए. वहां मन नहीं लगा तो वापस अयोध्या लौट आए. पहले पहल उन्होंने वहां सब्जीमंडी के एक मकान में रहना शुरू किया. इसके बाद वो एक बड़े अहाते वाले राम भवन में चले गए, फिर निधन तक यानि करीब 15 सालों तक वहीं रहे. दिलचस्प बात ये है कि अयोध्या में वो जिन मकानों में रहे, उनके मकान मालिकों ने भी उन्हें नहीं देखा. किन्हीं असरदार लोगों के जरिए ये मकान गुमनामी बाबा को दिलाए गए थे.

रात में आते थे लोग उनसे मिलने 
आमतौर पर बाबा लोग अपने इर्द गिर्द जमावड़ा और भक्तों का हुजूम पसंद करते थे लेकिन ये बाबा अलग थे, जिन्हें ना तो अपने पास भीड़ पसंद थी और ना ही लोगों का जमावड़ा. बहुत कम लोग ही उन तक पहुंच पाते थे, वो भी वो लोग थे, जिनसे वो मिलना चाहते थे. वो हमेशा लोगों से पर्दे से पीछे मिलते थे. उनका चेहरा कोई  नहीं देख पाता था. उनसे मिलने वाले लोगों में आजाद हिंद फौज के लोग हुआ करते थे. कुछ कोलकाता और दूसरे जगहों से आने वाले परिचित, बहुत से लोग रात के अंधेरे में कारों से आते थे. कइयों के साथ उनकी घंटों गंभीर मंत्रणा होती थी.

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उनका असर ऊपर तक तो जरूर था
ये भी कहा जाता है गुमनामी बाबा का असर ऊपर तक जरूर था. क्योंकि किसी भी बाबा के लिए इतने रहस्यमय ढंग से लंबे समय तक रहना मुश्किल होता. जिस समय वो जिंदा थे, उनके गुमनाम बनकर रहने और किसी को चेहरा नहीं दिखाने की वजह से शक भी पैदा हुआ. पुलिस तक शिकायत भी पहुंची. एक बार एक पुलिस अफसर ने उनके रामभवन पर पहुंचकर जबरन कोशिश की कि वो उनके सामने आएं. गुमनामी बाबा सामने तो नहीं आए लेकिन कुछ ही घंटों में उस अफसर का तबादला जरूर हो गया. लोगों को लगता है कि बाबा के संपर्क काफी ऊंचे थे लेकिन वो कहां तक थे और किनसे थे, ये कभी किसी को मालूम नहीं हो पाया.

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साधारण बाबा कतई नहीं थे वो 
एक बात तो तय है कि वो कोई साधारण बाबा नहीं थे. इनके पास मिले सामान भी यही दर्शाते हैं. उन्होंने अपने इर्द-गिर्द जिस तरह की गोपनीयता बनाकर रखी, वो भी चकित करने वाली है. अगर ये शख्स साधारण बाबा या संत था तो इतनी फर्राटेदार अंग्रेजी और जर्मन कैसे बोलता था. ये सवाल हमेशा अनुत्तरित रहा कि उनके पास हमेशा दुनियाभर के नामचीन अखबार, पत्रिकाएं, साहित्य, सिगरेट और शराबें कौन पहुंचाता था.

हालांकि कई लोगों ने ये दावा किया वो सुभाष चंद्र बोस हैं लेकिन गुमनामी बाबा के निधन के बाद ऐसे दावे और कयास एकदम बंद हो गए. कुल मिलाकर गुमनामी बाबा ऐसे रहस्य बनाकर छोड़ गए, जिसमें ना जाने कितने सवाल है. देखना होगा जस्टिस विष्णु सहाय आयोग की रिपोर्ट इस बारे में क्या कहती है और गुमनामी बाबा और नेताजी के बीच क्या रिश्ता जाहिर करती है.

एक वर्ग ने कभी इस बात पर विश्वास नहीं किया कि नेताजी हवाई हादसे में मारे गए थे


गुमनामी बाबा के पास से मिले सामान
- सरकारी खज़ाने में जमा गुमनामी बाबा का सामान
- सुभाष चंद्र बोस के माता-पिता/परिवार की निजी तस्वीरें
- कलकत्ता में हर वर्ष 23 जनवरी को मनाए जाने वाले नेताजी जन्मोत्सव की तस्वीरें
- लीला रॉय की मृत्यु पर हुई शोक सभाओं की तस्वीरें
- नेताजी की तरह के दर्जनों गोल चश्मे
- 555 सिगरेट और विदेशी शराब का बड़ा ज़खीरा
- रोलैक्स की जेब घड़ी
- आज़ाद हिन्द फ़ौज की एक यूनिफॉर्म
- 1974 में कलकत्ता के दैनिक 'आनंद बाज़ार पत्रिका' में 24 किस्तों में छपी खबर 'ताइहोकू विमान दुर्घटना एक बनी हुई कहानी' की कटिंग्स
- जर्मन, जापानी और अंग्रेजी साहित्य की ढेरों किताबें
- भारत-चीन युद्ध सम्बन्धी किताबें जिनके पन्नों पर टिप्पणियां लिखी गईं थीं
- सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु की जांच पर बने शाहनवाज़ और खोसला आयोग की रिपोर्टें
- सैंकड़ों टेलीग्राम, पत्र आदि जिन्हें भगवनजी के नाम पर संबोधित किया गया था
- हाथ से बने हुए नक़्शे, जिनमें उस जगह को इंगित किया गया था जहां कहा जाता है नेताजी का विमान क्रैश हुआ था
- आज़ाद हिन्द फ़ौज की गुप्तचर शाखा के प्रमुख पवित्र मोहन रॉय के लिखे गए बधाई सन्देश

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First published: July 24, 2019, 11:50 PM IST
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