Coronavirus : क्या स्कूल खोलने का सही वक्त आ चुका है?

Coronavirus : क्या स्कूल खोलने का सही वक्त आ चुका है?
बच्चे अधिकतर मामलों में वायरस के काफी मजबूत कैरियर यानी वाहक होते हैं- सांकेतिक फोटो (Photo-pixabay)

कई देश बच्चों को कोरोना वायरस (coronavirus in children) से सेफ मानते हुए स्कूल खोलने (school reopening) की जल्दबाजी में हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: August 25, 2020, 11:56 AM IST
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कोरोना का ग्लोबल आंकड़ा 2 करोड़ 38 लाख से ऊपर जा चुका है. इसी बीच ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने स्कूल खोलने की बात की है. पेरेंट्स से अपील करते हुए पीएम ने कहा कि बच्चों को स्कूल भेजना सकारात्मक बदलाव लाएगा. वैसे इससे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी स्कूल खोलने का दबाव बना चुके हैं. कुछ राज्यों में स्कूल खोले भी गए लेकिन नतीजा चिंताजनक रहा. अब ब्रिटेन भी इसी रास्ते पर है. जानिए, क्या ये स्कूल खोलने के लिए सही समय है.

ब्रिटेन में पिछले 5 महीने से ज्यादा समय से स्कूल बंद हैं. इसी दौरान सोमवार को पीएम ने पेरेंट्स से कहा कि बच्चों को स्कूल से दूर रखना वायरस से भी ज्यादा खतरनाक होगा. उन्होंने ये बात डॉक्टरों की इस बात के हवाले से कही जिसके मुताबिक बच्चों में कोरोना का खतरा अपेक्षाकृत कम होता है. पेरेंट्स से बच्चों को स्कूल भेजने की अपील में जॉनसन ने ये भी कहा कि स्कूल जाने से घरों में बंद बच्चों में अच्छा बदलाव आएगा. माना जा रहा है कि उनकी ये अपील अगले महीने से स्कूल खोजने की योजना के बाद आई है.

स्कूल खोलने की बात पर वजन के लिए पब्लिक हेल्थ इंग्लैंड (PHE) ने एक स्टडी भी की- सांकेतिक फोटो (Photo-pixabay)




स्कूल खोलने की बात पर वजन के लिए पब्लिक हेल्थ इंग्लैंड (PHE) ने एक स्टडी भी की. 1 जून से 31 जुलाई तक की समय सीमा के बीच हुई इस स्टडी में इंग्लैंड के कुछ ऐसे स्कूलों को शामिल किया गया, जो प्रतिबंधों के साथ खुल चुके हैं. स्टडी में 198 कोरोना संक्रमण के केस दिखे, इनमें 70 बच्चे भी थे. यानी बच्चों में संक्रमण का डर कम दिख रहा है.
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हालांकि इस स्टडी का दूसरा पक्ष भी है. बच्चे भले ही कोरोना के माइल्ड संक्रमण का शिकार हों लेकिन अधिकतर मामलों में वे वायरस के काफी मजबूत कैरियर यानी वाहक होते हैं. ऐसे में स्कूल से कोरोना लेकर आए बच्चों से अनजाने में पेरेंट्स या घर के बुजुर्गों को संक्रमण का डर होता है. खासकर बड़ी उम्र के लोगों या पहले से बीमार लोगों के लिए संक्रमण खतरनाक हो सकता है.

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अमेरिका का मामला देखा जाए, तो स्कूल खोलने के नतीजे काफी भयावह रहे. वहां मिसिसिपी, टेनेसी और जॉर्जिया समेत कई स्टेट्स में प्रतिबंधों के बीच स्कूल खोले हुए. स्कूल की स्ट्रेंथ 25 से 30 प्रतिशत के आसपास रही. बच्चों और स्टाफ को तापमान की जांच के बाद ही अंदर आने की अनुमति मिलती थी. सारे लोग मास्क में थे और सैनटेशन का भी जितना हो सके, पालन हो रहा था. इसके बाद भी 4 ही हफ्तों में बच्चों में कोरोना संक्रमण में 90% की बढ़ोतरी हुई. सीएनएन की एक रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिकन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स ने ये स्टडी की. इसके बाद से विशेषज्ञ स्कूल न खोलने की राय दे रहे हैं.

भारत में ये खतरा इसलिए ज्यादा है क्योंकि यहां सुविधाओं का अभाव है- सांकेतिक फोटो (Photo-pixabay)


भारत में ये खतरा इसलिए ज्यादा है क्योंकि यहां सुविधाओं का अभाव है. जैसे अगर सरकार स्कूल खोलने के आदेश जारी कर दे और पेरेंट्स भी बच्चों को स्कूल भेज दें तो ज्यादातर स्कूलों में हाइजीन की समस्या होगी. जैसे हाथ धोने या सैनटेशन के लिए कई परेशानियां होंगी. यही देखते हुए UNICEF ने एक स्टडी भी की. इसकी रिपोर्ट काफी डराने वाली है. इसके मुताबिक दुनिया के करीब 24 प्रतिशत स्कूलों में हाथ धोने के लिए न पानी उपलब्ध है और न ही साबुन. जबकि 19 प्रतिशत स्कूलों में पानी तो है लेकिन साबुन की सुविधा नहीं है. यानी दुनिया के हर पांच में से दो स्कूलों में साबुन से हाथ धोने की सुविधा उपलब्ध नहीं है, जो कोरोना से बचाव के लिए काफी जरूरी है.

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ग्रामीण इलाकों में हालात और खराब है. ऐसे में अगर स्कूल खोल दिए गए तो 80 करोड़ से भी ज्यादा बच्चों के संक्रमित होने का डर होगा. बच्चों से ये संक्रमण घर के बड़ों तक जाएगा. इससे वैक्सीन आने से पहले ही महामारी का दूसरा चरण आ सकता है.

अमेरिका में भी भारत के मिड-डे मील की तरह ही नेशनल स्कूल लंच प्रोग्राम चलता है- सांकेतिक फोटो (Photo-pixabay)


वैसे यहां ये समझना भी दिलचस्प है कि खतरे के बाद भी सरकारें स्कूल खोलने को इतनी उतावली क्यों है. असल में ये सारा मामला राजनैतिक माना जा रहा है. खासकर अमेरिका में चुनाव के मद्देनजर स्कूल खोलने की बात हो रही है. यहां तक कि ट्रंप स्कूल न खोलने पर फंडिंग रोकने की बात कर रहे हैं. अपने ट्वीट में उन्होंने जर्मनी, डेनमार्क जैसे कई देशों का हवाला देते हुए लिखा कि वहां स्कूल खुल चुके हैं और कोई समस्या नहीं है. यहां विपक्षी पार्टी के डेमोक्रेट चाहते हैं कि स्कूल नवंबर में चुनाव से पहले न खुलें. लेकिन ये बच्चों और उनके परिवारों के लिए जरूरी है. ऐसा न हो तो फंडिंग रोकी जा सकती है.

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ट्रंप के स्कूल खोलने के दबाव के साथ एक और वजह भी है. अमेरिका में भी 30 मिलियन बच्चे स्कूलों के लंच पर काफी हद तक निर्भर हैं. बता दें कि अमेरिका में भी भारत के मिड-डे मील की तरह ही नेशनल स्कूल लंच प्रोग्राम चलता है. इस पर तो असर पड़ ही रहा है, साथ ही बहुत से पेरेंट काम या कई दूसरी वजहों से बच्चों की देखभाल सही तरह से नहीं कर पाते. ऐसे में स्कूल खुलने पर बच्चों के साथ पेरेंट्स को भी मदद मिल सकेगी. हालांकि स्कूल खुलने पर तमाम एहतियात के बाद भी ये डर भी है कि कोरोना और तेजी से बढ़ेगा.
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