लाइव टीवी

कश्मीर विवाद के लिए कितने जिम्मेदार हैं नेहरू और पटेल...

News18.com
Updated: June 28, 2019, 4:18 PM IST
कश्मीर विवाद के लिए कितने जिम्मेदार हैं नेहरू और पटेल...
सरदार वल्लभ भाई पटेल जवाहर लाल नेहरू (नेहरू मेमोरियल म्यूज़ियम एंड लाइब्रेरी)

हर बार कश्मीर समस्या के लिए नेहरू को कठघरे में खड़ा किया जाता रहा है..क्या वाकई ऐसा है

  • News18.com
  • Last Updated: June 28, 2019, 4:18 PM IST
  • Share this:
रशीद क़िदवई
भारत को कश्मीर पर अपनी स्थिति स्पष्ट करने के लिए एक लंबा समय लगा. भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने जिस तरह से कश्मीर के मुद्दे को हैंडिल किया उसे देखकर लगता है कि उन्होंने ढिलाई बरती और इस मामले में वह शेख अब्दुल्ला पर काफी निर्भर भी रहे. कश्मीर मुद्दे को लेकर नेहरू द्वारा डिप्लोमेटिक तरीका अपनाया जाना तत्कालीन परिस्थितियों को देखते हुए सही भी लगता है.

भारत और पाकिस्तान के बीच हुए पहले युद्ध के वक्त अगस्त से अक्टूबर 1947 के बीच नेहरू और तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल के बीच कश्मीर मुद्दे पर मतभेद थे. अपनी किताब 'द इंडिया फैक्टर' में राजेंद्र सरीन ने पाकिस्तानी कैबिनेट में मंत्री रहे अब्दुल रब निश्तर और सरदार पटेल के बीच की बात का जिक्र किया है, जिसमें सरदार पटेल निश्तर से कह रहे हैं कि 'जूनागढ़ और हैदराबाद की बात छोड़िए और कश्मीर की बात कीजिए.'

जानें कश्मीर में कब रहा सबसे लंबा गवर्नर रूल और कितनी बार आई ये नौबत



किताब में सरीन सरदार शौकत हयात का भी जिक्र करते हैं, जो कि पाकिस्तान संविधान सभा के सदस्य भी थे. वह तत्कालीन वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन और पाकिस्तान के तत्कालीन पीएम लियाकत अली के बीच हुई बातचीत में मौजूद भी थे. उस मीटिंग में माउंटबेटन ने लियाकत अली को बताया कि सरदार पटेल ने कहा है कि अगर पाकिस्तान हैदराबाद से दावा छोड़ देता है तो भारत कश्मीर पर दावा छोड़ देगा. तब लियाकत अली ने कहा था, 'सरदार साहब क्या आप पागल हो गए हैं, पंजाब से भी बड़े सूबे को क्या हम कुछ पहाड़ों के लिए छोड़ देंगे.' और आज 72 सालों बाद उसी कश्मीर के लिए भारत और पाकिस्तान के बीच जंग जैसी स्थिति बनी हुई है.

तत्कालीन सेक्रेटरी ऑफ स्टेट और सरदार पटेल के विश्वासपात्र वीपी मेनन कहते हैं, 'तत्कालीन कश्मीर महाराजा हरि सिंह और लॉर्ड माउंटबेटन के बीच बैठक हुई, जिसमें माउंटबेटन ने कहा कि अगर कश्मीर पाकिस्तान के साथ जाना चाहेगा तो सरदार पटेल उसमें रोड़ा नहीं बनेंगे. तत्कालीन राजनीतिक सचिव वी शंकर ने भी इस बात का समर्थन किया है.

हालांकि नेहरू इस विचार को पसंद नहीं करते थे. उनका मानना था कि कश्मीर के विभाजन का अर्थ है द्विराष्ट्र के सिद्धांत को स्वीकार करना. आजादी के वक्त पाकिस्तान का पक्ष था कि कश्मीर मुस्लिम स्टेट है, लेकिन कश्मीरी नेशनलिस्ट व सेक्युलर कश्मीर को अलग राष्ट्र बनाना चाहते थे. सालों तक अब्दुल्ला को लगता रहा कि अमेरिका और ब्रिटेन इस मुद्दे पर उनका साथ देंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

किस कानून से कश्मीर में खत्म हुआ प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति का पद

नेहरू ने इस मुद्दे पर बात करने के लिए अब्दुल्ला से मुलाकात की. लेकिन इसी बीच 22 अक्टूबर 1947 को पाकिस्तान ने कश्मीर पर हमला कर दिया. भारत ने पहले तो कश्मीर के राजा हरि सिंह की सहायता करने से मना कर दिया, लेकिन पांच दिनों बाद कश्मीर को मुक्त कराने के पटेल की सलाह पर राजी हो गए. बीच में ही माउंटबेटन ने हस्तक्षेप किया और सुनिश्चित किया कि कश्मीर के भाग्य का फैसला जनमत संग्रह के जरिये हो. 28 अक्टूबर 1947 को नेहरू ने ऑल इंडिया रेडियो पर इस बात की घोषणा की.

आज़ादी के तीन साल बाद 1950 में पटेल के निधन हो गया. 1951 में जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव हुए. बाद में 1957 से 1962 तक देश के विदेश मंत्री रहे कृष्ण मेनन ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को बताया कि पाकिस्तान, कश्मीर के लोगों की भावनाओं का सम्मान करने में असफल रहा है और चूंकि कश्मीरी चुनाव में हिस्सा ले रहे हैं और सरकार चुन रहे हैं इसलिए यूएन रिजोल्यूशन का कोई अर्थ नहीं रह गया है. उन्होंने कहा कि किसी भी कीमत पर हम अपनी विरासत को नहीं बेच सकते. किसी भी कीमत पर हम भारत का विभाजन स्वीकार नहीं कर सकते.

News18 Hindi पर सबसे पहले Hindi News पढ़ने के लिए हमें यूट्यूब, फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें. देखिए देश से जुड़ी लेटेस्ट खबरें.

First published: June 28, 2019, 4:15 PM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर