क्या भगवान राम की मूछें थीं, क्यों की गई उनकी मूछों वाली मूर्ति की मांग

क्या भगवान राम की मूछें थीं, क्यों की गई उनकी मूछों वाली मूर्ति की मांग
मू्र्तियों में भगवान राम की छवि आमतौर पर ऐसी रहती है

महाराष्ट्र के एक बडे़ हिंदू नेता संभाजी ने भगवान राम की मूर्ति को मूंछों के साथ लगाने की मांग की है. इसके बाद ये चर्चाएं शुरू हो गई हैं कि हिंदू धर्म में देवताओं की मूर्ति का स्वरूप क्या रहता आया है. ज्यादातार मूर्तियों में देवताओं के मूछें नहीं होतीं. हालांकि ये सभी भगवान जिस युग में माने गए हैं, उस समय सनातन धर्म में मूछें और दाढ़ी अनिवार्य तौर पर रखने का रिवाज था

  • News18Hindi
  • Last Updated: August 4, 2020, 1:06 PM IST
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कभी राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ (RSS) के दिग्गज नेता रहे और अब अपना अलग हिंदुत्ववादी संगठन चलाने वाले महाराष्ट्र के संभाजी भिड़े ने मांग की है कि अयोध्या में बनने वाले राम मंदिर में भगवान राम की जो मूर्ति लगे, उसकी मूछें भी होनी चाहिए. उन्होंने जोर देकर कहा कि असली भगवान राम की मूर्ति तो मूंछों के साथ ही होनी चाहिए.

इसके बाद सवाल खड़ा हो गया कि क्या भगवान राम की मूछें थीं. इसे लेकर अलग अलग बातें कही जाती रही हैं.

हमारे देश में कई जगह देवताओं की मूर्तियां मूछों के साथ हैं लेकिन ज्यादातर नहीं. संभाजी ने जो पुरजोर तरीके से कहा है कि अगर भगवान राम की मूर्ति की मूछें नहीं होंगी तो सही तरीके से भगवान राम को जाहिर नहीं करेंगी.



हालांकि देश-विदेश में भगवान राम के जितने भी मंदिर और मूर्तियां हैं, वो सभी बगैर मूछों के ही हैं. उनकी मूर्ति को लेकर ये विवाद कभी खड़ा भी नहीं हुआ. ऐसा पहली बार हो रहा है.
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जिस त्रेता युग में भगवान राम को माना गया, तब क्या होता था
वैसे भगवान राम के जिस अवतार का वर्णन वेदों में हुआ है, उसमें कहीं ये उल्लेख नहीं मिलता कि उनकी मूछें थीं या नहीं थीं, लेकिन वो जिस युग में धरती पर आए, उसको त्रेता युग माना जाता है, तब आमतौर पर सनातन धर्म में मूछों और धनी दाढ़ी रखने का रिवाज था.

महाराष्ट्र के संभाजी भिडे़, जिन्होंने मांग की है कि अयोध्या में भगवान राम की मूछों वाली मूर्तियां लगाई जानी चाहिए


इंदौर में भगवान राम का मूछों वाली मूर्ति का मंदिर
हालांकि देश में एकाध जगह भगवान राम के ऐसे मंदिर जरूर हैं, जहां उनके रूप में मूछों के साथ जोड़ा गया है. मध्य प्रदेश के इंदौर में श्रीराम का एक ऐसा मंदिर है, जहां उनकी मूंछे हैं. उनके अलावा लक्ष्मण की भी मूंछें हैं. कुमावतपुरा में स्थित इस मंदिर को 150 साल पुराना बताया जाता है.

हनुमान की भी मूर्ति में मूछें
लोगों में ऐसी मान्यता है कि अगर दशरथ की दाढ़ी-मूंछें हो सकती हैं तो राम की भी मूंछें जरूर होंगीं. इसके अलावा राजस्थान के एक मंदिर में हनुमान की मूर्ति की भी मूंछें हैं. यह मंदिर हनुमानजी की इन मूंछों के कारण ही लोकप्रिय है.

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ब्रह्मा को छोड़कर अन्य देवता बगैर मूछों और दाढ़ियों के
हिंदू धर्म में ब्रह्मा को छोड़कर किसी देवता की तस्वीरों या मूर्तियों की मूछें सामान्यतः नहीं होतीं. कुछ जगहों पर शिव की मूर्तियों में मूंछें दिखाई पड़ती हैं लेकिन विष्णु, कृष्ण, राम और अन्य देवताओं की बिना मूंछों वाली मूर्तियां ही हमारी नजर में हैं. देवताओं की मूर्तियां आमतौर पर उनके चिर किशोर रूप में बनाई जाती है. इसे ध्यान में रखकर मूर्तियों या तस्वीरों में मूंछें नहीं बनाई जातीं.

ज्यादातर मंदिरों में देवताओं और देवियों के चिर-युवा स्वरूप को ध्यान में रखकर उनकी मूर्तियां लगाई जाती हैं


भगवान के युवा स्वरूप की मूर्तियों का ही चलन
कहा जाता है कि पुराने या आदिम समाजों में देवता मूंछों वाले हो सकते थे, लेकिन सभ्यता शुरू होने के बाद और नगरों के उदय के बाद मूर्तियों और पूजा की जो परंपरा रही, उसमें भगवान के युवा रूप को ही साकार माना जाता है. केवल उत्तर ही नहीं बल्कि दक्षिण भारत में भी ऐसी ही मूर्तियों का रिवाज है. बस उत्तर भारत में देवताओं की सभी मूर्तियों में उन्हें गौरवर्ण दिखाया जाता है जबकि दक्षिण भारत की मूर्तियों की शैली भी अलग है और उसमें मूर्तियों में देवता अमूमन काले रंग में होते हैं.

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तो क्या इस पर शोध की जरूरत
यह क्या राजा रवि वर्मा का असर था, जिन्होंने अपनी पसंद से देवताओं की मूंछें उड़ा दीं. इस बारे में रिसर्च की जरूरत है. फिलहाल सच यही है कि हमें अपने देव बिना दाढ़ी-मूंछ के ही भाते हैं, भले वे राम ही क्यों न हों, जिन्हें हिंदू पराक्रम का प्रतीक माना जाता है.

ऋगवेद क्या कहता है
ऋग्वेद में केवल दो जगहों पर 'राम' शब्द का प्रयोग हुआ है (१०-३-३ तथा १०-९३-१४). उनमें से भी एक जगह काले रंग के अर्थ में. शेष एक जगह व्यक्ति के अर्थ में.
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