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क्या चीन की राह पर है रूस, कानून का सहारा लेकर मुसलमानों को बना रहा निशाना

News18Hindi
Updated: May 23, 2020, 8:35 PM IST
क्या चीन की राह पर है रूस, कानून का सहारा लेकर मुसलमानों को बना रहा निशाना
मुस्लिम समुदाय को अतिवादी टैग करने के मामले में रूस अब चीन की राह पर चल रहा है.

रूस में पुतिन सरकार ने इस्लाम की नई परिभाषाएं गढ़नी शुरू कर दी हैं. दो साल पहले रूसी सरकार एक नया कानून लेकर आई जिसका नाम है Yarovaya Package. इस कानून के मुताबिक प्रशासन के लिए किसी व्यक्ति, किताब, लिटरेचर या ग्रुप को अतिवादी बताना बेहद आसान हो गया. इस कानून का इस्तेमाल मुस्लिमों के खिलाफ धड़ल्ले से किया जा रहा है.

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पिछले कुछ सालों में रूस की व्लादिमिर पुतिन सरकार ने एक नए टर्म की शुरुआत की है. ये टर्म है 'ट्रेडीशनल इस्लाम' यानी रूस का परंपरागत इस्लाम. इस शब्दावली का इस्तेमाल बेहद चालाकी पूर्ण तरीके से किया जा रहा है. इस शब्दावली का मतलब इस्लाम की एक नए तरीके की व्याख्या है और व्याख्या क्या है, ये सिर्फ पुतिन प्रशासन ही जानता है. इस शब्दावली ने रूस के मुस्लिम समुदाय में बड़े स्तर पर कन्फ्यूजन पैदा कर दिया है. क्योंकि कई इस्लामिक मान्यताओं को यह कहकर नकारा जा रहा है कि इनका देश से कोई ताल्लुक नहीं है.

राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन के मुताबिक ट्रेडीशनल इस्लाम रूस के संस्कृति का अभिन्न अंग है और ये देश की विश्वमानव वाली सोच का द्योतक भी है. पुतिन प्रशासन के इस ट्रेडीशनल इस्लाम के मुताबिक नकाब रूसी मुसलमानों की संस्कृति नहीं है और ये बाहर से आयातित परंपरा है. ये तो महज एक उदाहरण है, ऐसे और भी कई हैं. इस ट्रेडीशनल इस्लाम को लेकर रूसी मुस्लिमों में गुस्सा है. लेकिन सरकार की इस नई परिभाषा स्वरूप इतना ही नहीं है, कहानी बेहद गहरी है.

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रूस में पारंपरिक तौर पर मुस्लिम समुदाय वहां के जार राजवंश का शताब्दियों तक समर्थक रहा. 1917 में देश में कम्युनिस्ट शासन आने से पहले तक मुस्लिम जारों के समर्थक माने जाते थे. कम्युनिस्ट शासन की शुरुआत में लेनिन और फिर बाद में स्टालिन ने स्टेट एइथिजम यानी राज्य सत्ता की नास्तिकता पर जोर दिया. इस नीति का खामियाजा बड़ी संख्या में धार्मिक मुस्लिम समुदाय को उठाना पड़ा. तकरीबन 70 सालों तक सोवियत शासन के दौरान देश में यही व्यवस्था चली.

अमेरिका के साथ चले लंबे शीतयुद्ध के बाद जब सोवियत टूटा तो रूस में बनी नई सरकारों ने मुस्लिम देशों के साथ अपने संबंध बेहतर करने के लिए देश में मुस्लिम समुदाय के प्रति काफी उदारता दिखाई. इस बात को वहां के मुस्लिम समुदाय ने भी काफी पसंद किया. यही वजह है कि नई सरकारों और विशेष तौर पर व्लादिमिर पुतिन से रूस के मुस्लिमों में बड़ा लगाव रहा है.

लेकिन पिछले कुछ सालों में नई तरह की मुश्किलें सामने आईं. रूस में आर्थोडॉक्स ईसाइयों के बाद दूसरे नंबर पर सबसे बड़ी जनसंख्या मुस्लिमों की ही है. आंकड़ों के मुताबिक रूस की कुल जनसंख्या का साढ़े 7 फीसदी मुस्लिम आबादी है. हालांकि कहा जाता है कि वास्तविक संख्या सरकारी आंकड़ों से अधिक है क्योंकि रूसी सरकार ने लंबे समय से इसे लेकर सेंसस नहीं करवाया है. सोवियत सरकार की समाप्ति के बाद से ही रूसी सरकारें खुद को ऑर्थोडॉक्सी चर्च की ज्यादा करीबी दिखाती रही हैं. सरकार की इस पोस्चरिंग को ईसाई लोगों के बीच लोकप्रियता भी मिलती रही है. बीते एक दशक के दौरान इस्लाम धर्म में कन्वर्ट होने वाले ईसाई लोगों को लेकर तल्खी बढ़ी है.

रूस का मुस्लिम समुदाय पारंपरिक तौर पर वहां के जार राजवंश का समर्थक रहा था. निकोलस द्वितीय इस राजवंश के आखिरी राजा थे. अब पुतिन सरकार ट्रेडीशनल इस्लाम की याद दिलाकर समुदाय को उस वक्त की याद दिलाना चाहती है.


साल 2015 में न्यूयॉर्क टाइम्स अखबार में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक रूसी सरकार अब इन कन्वर्टेड मुस्लिम लोगों को शक की निगाह से देखने लगी है. साथ ही अतिवादी मुस्लिम जैसे शब्द ज्यादा प्रचलन में आ गए हैं. रूसी सरकार के मुताबिक देश में अतिवादी इस्लाम को बढ़ावा दिए जाने के पीछे बाहरी ताकतें हैं. इसी वजह से सरकार ने ट्रेडीशनल और एक्सट्रीमिस्ट इस्लाम के बीच फर्क करना शुरू कर दिया है. लेकिन इसकी कोई स्थाई परिभाषा नहीं है.

तकरीबन दो साल पहले रूसी सरकार एक नया कानून लेकर आई जिसका नाम है Yarovaya Package. इस कानून के मुताबिक प्रशासन द्वारा किसी व्यक्ति, किताब, लिटरेचर या ग्रुप को अतिवादी बताना बेहद आसान हो गया. इस कानून के मुताबिक सरकार के विरोध में धार्मिक जुटान करना गैरकानूनी घोषित कर दिया गया. फिर किसी भी प्रदर्शन के बाद घरों और मस्जिदों पर पुलिस की रेड की घटनाएं आम हो गईं. अब जो कुछ भी सरकार की ट्रेडीशनल इस्लाम की परिभाषा में फिट नहीं होता वो अतिवादी की श्रेणी में डाल दिया जाता है. कई संस्थाओं को अतिवादी की श्रेणी में डाल दिया गया.

रूसी सरकार की इस्लाम की नई परिभाषा ने स्थानीय मुस्लिम समुदाय को कन्फ्यूज कर दिया है.


एक रूसी कोर्ट ने कुछ समय पहले कुछ किताबों और गानों को अतिवादी घोषित कर दिया था. एक अन्य रूसी कोर्ट ने इसी कानून के आधार पर कुरान के एक ट्रांसलेशन को अतिवादी करार दे दिया था. क्रेमलिन के मुताबिक देश में अतिवाद फैलाने के बाहर से आयातित इस्लाम जिम्मेदार है. रूस के बाहर के किसी भी इस्लामिक इंस्टीट्यूशन की बातों को अतिवादी करार दिया जा सकता है.

माना जा रहा है कि रूसी सरकार के ये कदम चीन जैसे हैं. बीते सालों में चीन ने भी अपने उईगर मुस्लिम समुदाय पर बड़े जुल्म ढाए हैं. सरकार सीधे तौर पर उईगर समुदाय को निशाना बनाती रही है. अब कहा जा रहा है कि रूस के कदम भी कुछ इसी दिशा में आगे बढ़ रहे हैं.

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First published: May 23, 2020, 7:47 PM IST
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