Birthday Ishwar Chandra Vidyasagar : जिन्होंने अकेले बेटे की शादी विधवा से कराई

ईश्वरचंद्र विद्यासागर, जिन्होंने महिलाओं के लिए तब बहुत काम किए, जब ये बहुत मुश्किल था
ईश्वरचंद्र विद्यासागर, जिन्होंने महिलाओं के लिए तब बहुत काम किए, जब ये बहुत मुश्किल था

देश के मशहूर समाज सुधारक और शिक्षाविद ईश्वरचंद्र विद्यासागर (Ishwar Chandra Vidyasagar) ने महिलाओं के लिए वो कर दिखाया था, जिसके लिए महिलाओं को उनका शुक्रिया अदा करना चाहिए

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 26, 2020, 9:23 AM IST
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ईश्वरचंद्र विद्यासागर (Ishwar Chandra Vidyasagar) को पूरा देश उनकी 200वीं जयंती पर 26 सितंबर को याद कर रहा है. बंगाल के विद्यासागर ने अपने जीवन में वो काम किया, जिसकी वजह से महिलाएं आज कदम से कदम मिलाकर हर काम कर रही हैं. ये वही थे जिन्होंने महिलाओं के जीवन को बेहतर बनाने के लिए ऐसा कुछ किया कि हर कोई दंग रह गया.

विद्यासागर 19वीं शताब्दी के प्रसिद्ध दार्शनिक, शिक्षाविद, समाज सुधारक और लेखक थे. उनका जन्म (Ishwar Chandra Vidyasagar Birthday) 26 सितंबर,1820 को बंगाल प्रेसीडेंसी के मेदिनीपुर जिला में हुआ था. उनका बचपन का नाम ईश्वरचंद्र बन्दोपाध्याय था. वो संस्कृत और दर्शन में महान ज्ञानी थे. उनकी बुद्धिमत्ता और ज्ञान से उन्होंने लोगों को स्टूडेंट लाइफ में इस कदर कायल किया कि संस्कृत कॉलेज ने उन्हें 'विद्यासागर' की उपाधि दे दी.

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सड़क की लाइट के नीचे बैठकर पढ़े
गांव में प्रारंभिक शिक्षा के बाद वह अपने पिता के साथ कलकत्ता आ गए थे. कहते हैं कि ईश्वरचंद्र ने अपनी पढ़ाई स्ट्रीट लाइट के नीचे बैठकर की क्योंकि उनके परिवार के पास इतने पैसे नहीं थे कि वह गैस या दूसरी कोई लाइट खरीद सके. मेधावी होने की वजह से उन्हें कई स्कॉलरशिप भी मिली थी. इसी वजह से उनको विद्यासागर की उपाधि दी गई थी.

केवल 21 साल की उम्र में संस्कृत विभाग के प्रमुख बने

वर्ष 1839 में विद्यासागर ने कानून की पढ़ाई पूरी करने के बाद 1841 में केवल 21 साल की उम्र में फोर्ट विलियम कॉलेज में संस्कृत विभाग के प्रमुख के तौर पर काम शुरू कर दिया. करीब 12 साल पढ़ाई करने के बाद कलकत्ता के 'संस्कृत कॉलेज' में उन्हें संस्कृत के प्रोफेसर की नौकरी मिल गई. लंबे समय तक वहां काम करने के बाद उन्हें प्रिंसिपल बना दिया गया.

वो ऐसे शख्स थे, जो वाकई चाहते थे कि महिलाओं का जीवन बेहतर बने. वो घर से पैर निकालें.


चाहते थे कि महिलाएं पढ़ें-लिखें और घर से बाहर निकलें
वो ऐसे शख्स थे, जो वाकई चाहते थे कि महिलाओं का जीवन बेहतर बने. वो घर से पैर निकालें. स्कूल जाकर पढ़ें-लिखें. उन दिनों देशभर महिलाओं का जीवन बहुत खराब था. खासकर अगर कोई महिला अगर विधवा हो जाती थी तो उससे बहुत खराब व्यवहार किया जाता था. उसका जीवन खासा मुश्किल हो जाता था. ये सब देखने के बाद उन्होंने विधवाओं के बेहतर जीवन के लिए काम करना शुरू किया.

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विधवाओं के पक्ष में आवाज उठाने पर हमले भी हुए
विद्यासागर ने जब विधवाओं के लिए आवाज उठानी शुरू की तो उन्हें कट्टरपंथियों का काफी विरोध सहना पड़ा. उन पर हमले भी हुए. उनकी जान पर खतरा भी आ गया. वो चाहते थे कि हर हाल में विधवा महिलाओं की फिर से शादी होनी चाहिए, आखिर उन्हें भी जीवन जीने का हक है. वो विधवा विवाह के प्रबल समर्थक थे.

विधवा पुनर्विवाह कानून बनवाया
शास्त्रीय प्रमाणों से उन्होंने विधवा विवाह को वैध प्रमाणित किया. विद्यासागर ने तत्कालीन सरकार को एक याचिका भी दी, जिसमें विधवाओं के पुनर्विवाह के लिए कानून बनाने की मांग की गई थी. हालांकि ये इतना आसान नहीं था. लेकिन वो लगे रहे. ये उन्हीं की कोशिशें थीं कि साल 1856 में विधवा-पुनर्विवाह कानून पारित हुआ.

ये उन्हीं की कोशिशें थीं कि साल 1856 में विधवा-पुनर्विवाह कानून पारित हुआ.


लोग तब दंग रह गए जब विद्यासागर ने अपने इकलौते पुत्र का विवाह एक विधवा से करवाया. ये बात भी सही है कि उनके इस कदम के बाद तमाम लोगों ने इस ओर कदम बढ़ाना शुरू किया. उनके राज्य बंगाल में विधवा विवाह को लेकर एक नया माहौल बनने लगा.

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कोलकाता में कई बालिका स्कूल खोले
विद्यासागर ने नारी शिक्षा को बढ़ावा देते हुए कोलकाता के कई स्थानों पर बालिका विद्यालय खोले. उन्होंने संस्कृत भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए भी प्रयास किया. समाज सुधारक ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने स्थानीय भाषा और लड़कियों की शिक्षा के लिए स्कूलों की एक शृंखला के साथ कलकत्ता में मेट्रोपोलिटन कॉलेज की स्थापना की. संस्कृत कॉलेज का प्रिंसिपल बनने के बाद उन्होंने सभी जाति के बच्चों के लिए कॉलेज के दरवाजे खोल दिये, जो उस जमाने में बहुत बड़ी बात थी.

गेस्ट बनकर सभा में गए और झाड़ू उठाकर सफाई करने लगे
ईश्वरचंद्र के बारे में एक बात काफी मशहूर थी कि वह समय के बड़े पक्के थे. एक बार उन्हें लंदन में सभा को संबोधित करना था. जब वे वहां पहुंचे, तो सभा के बाहर काफी लोग खड़े थे. उन्होंने बाहर खड़े लोगों से पूछा- क्या हुआ? आप लोग बाहर क्यों हैं? उन्हें जवाब मिला- हॉल साफ नहीं है, क्योंकि सफाई कर्मचारी पहुंचे नहीं है. फिर क्या था? उन्होंने झाड़ू उठायी और सफाई करने लगे और थोड़ी ही देर में पूरा हॉल साफ हो गया.
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