इजरायल में है दुनिया की सबसे खतरनाक खुफिया एजेंसी, कहलाती है किलिंग मशीन

इजरायल में है दुनिया की सबसे खतरनाक खुफिया एजेंसी, कहलाती है किलिंग मशीन
मोसाद दुनिया की सबसे ज्यादा तेज-तर्रार और खूंखार खुफिया एजेंसी मानी जाती है (Photo-pixabay)

इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद (Mossad is national intelligence agency of Israel) के एजेंट इतने तेज होते हैं कि दुनिया के किसी भी कोने से अपने दुश्मन को खोज निकालते और उसे खत्म करके ही दम लेते हैं. इसके लिए वे कोई भी प्रोटोकॉल तोड़ सकते हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: July 18, 2020, 12:19 PM IST
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भारत-चीन तनाव के बीच लगातार ये बात हो रही है कि भिड़ंत की नौबत आ ही जाए तो कौन सा देश किस पाले में होगा. कई देशों खुले तौर पर भारत के पक्ष में हैं. दूसरी ओर पाकिस्तान और नॉर्थ कोरिया चीन के साथी दिख रहे हैं. हालांकि उन देशों के बारे में पक्के तौर पर कुछ कहा नहीं जा सकता, जो भारत और चीन दोनों के मित्र हैं. इनमें इजरायल का लगातार जिक्र हो रहा है. इसके दोनों ही देशों से संबंध हैं. वैसे भारत से इजरायल का रिश्ता व्यापारिक आधार पर ही नहीं, बल्कि कई दूसरे मामलों में भी दिखता है. जैसे इस देश की खुफिया एजेंसी मोसाद ने हमारे यहां की इंटेलिजेंस रॉ को शुरुआती ट्रेनिंग में मदद दी. बता दें कि मोसाद दुनिया की सबसे ज्यादा तेज-तर्रार और खूंखार खुफिया एजेंसी मानी जाती है, जो कई मामलों में खास है.

क्या है मोसाद
इजरायल चारों ओर से 13 मुस्लिम देशों से घिरा है, जो उससे चिढ़े रहते हैं. ऐसे में छोटे से इस देश को जिंदा रहने के लिए ही काफी जतन करना होता है. खुफिया एजेंसी मोसाद भी इन्हीं में से एक है. ये इतनी ताकतवार है कि इसे इजरायल की किलिंग मशीन तक कहा जाता है. चारों ओर दुश्मनों से घिरे इस देश की ये एजेंसी अपनी तेजी और खतरनाक ऑपरेशन की वजह से दुनिया की सबसे तेज इंटेलिजेंस भी कही जाती है. इसका मुख्यालय तेल अवीव शहर में है. दिसंबर 1949 को बनी ये एजेंसी देश की नेशनल इंटेलिजेंस एजेंसी हैं, ठीक वैसे ही जैसे भारत की रॉ है.

इजरायल चारों ओर से मुस्लिम देशों से घिरा है, जो उससे चिढ़े रहते हैं- सांकेतिक फोटो (Photo-pixabay)

क्या खास है मोसाद में


इस एजेंसी के बारे में कहा जाता है कि इसके एजेंट इतने तेज होते हैं कि दुनिया के किसी भी कोने से अपने दुश्मन को खोज निकालते और उसे खत्म करके ही दम लेते हैं. इसके लिए उनकी खास ट्रेनिंग होती है. लेकिन ट्रेनिंग से पहले कड़ी परीक्षा होती है. इस दौरान एजेंसी से जुड़ने के इच्छुक को शरीर के साथ दिल और दिमाग की ताकत भी दिखानी होती है. वैसे तो अरब में दुश्मनों से घिरा हरेक इजरायली अपने-आप में सैनिक होता है लेकिन इस एजेंसी के एजेंट्स की बात कुछ और होती है.

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मिलती है ट्रेनिंग
वे हर तरह के हथियार चलाने में ट्रेंड होते हैं. दुनिया के अत्याधुनिक से लेकर ट्रेडिशनल चीजों तक के इस्तेमाल से वे दुश्मन का सफाया कर देते हैं. मोसाद के लिए काम करने वाले एजेंट को पहले ही बता दिया जाता है कि अगर वो पकड़े गए तो इजरायल उन्हें न तो पहचानेगा, न अपनाएगा. उन्हें बरसों तक परिवार से दूर रहना हो सकता है. हालांकि अगर ऑपरेशन में एजेंट मारा जाए तो देश उसे पूरा सम्मान देता है.

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ऑपरेशन एंटेबे क्या है
वैसे तो कई ऑपरेशनों के लिए मोसाद का जिक्र होता है लेकिन ऑपरेशन एंटेबे को खासतौर पर याद किया जाता है. साल 1976 में युगांडा के हवाईअड्डे पर घुसकर मोसाद ने आतंकियों को मार गिराया था ताकि वो अपहरकर्ताओं की कैद में फंसे 54 नागरिकों को सेफ निकाल सके. इसके लिए उसने कई सारे प्रोटोकॉल तोड़े थे. ये ऑपरेशन बाद में अपने नागरिकों को बचाने के लिए हुए सबसे अहम ऑपरेशनों में शामिल किया गया.

मोसाद के ऑपरेशन एंटेबे को खासतौर पर याद किया जाता है (Photo-pikist)


इसी तरह से साल 1972 में मोसाद ने अपने 11 खिलाड़ियों की हत्या का बदला लिया. दो आतंकी संगठनों ने मिलकर इजरायल के खिलाड़ियों की हत्या की थी. इसके तुरंत बाद बदले की मुहिम शुरू हुई जो अगले कई सालों तक चली. हरेक आतंकी को दुनिया के हर कोने से निकालकर मारा गया था.

साइकोलॉजिकल वारफेयर भी 
सिर्फ हथियार ही नहीं, मोसाद के एजेंट्स को मनोवैज्ञानिक लड़ाई में भी महारत है. वहां साइकोलॉजिकल वारफेयर का पूरा एक विभाग है, जो पक्का करता है कि दुनिया के किस नेता की कौन सी सीक्रेट बात लीक की जाए, जो उनके फेवर में जाए. मोसाद ने ही अमेरिका के पूर्व प्रेसिडेंट बिल क्लिंटन और मोनिका लेविंस्की की बात को रिकॉर्ड कर लिया था. बाद में इसी वजह से पूरे अमेरिका में बदहवासी फैल गई थी.

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माना जाता है कि मोसाद के पास दुनिया के हर बड़े और ताकतवर नेता की अलग खुफिया फाइल है. इसमें नेता के बारे में जानकारी के अलावा इसका जिक्र भी रहता है कि किसकी क्या कमजोरी है. जैसे कोई पैसों से बदल जाता है तो किसी के लिए हनीट्रैप काम करता है. इसी आधार पर नेता को फंसाकर उसे ब्लैकमेल किया जाता है.

तेल अवीव में ऑपरेशन एंटेबे की याद में स्मारक बना हुआ है


रॉ और मोसाद का कनेक्शन
ये मोसाद की ताकत ही है, जिसके कारण भारत ने रॉ के लिए मोसाद से मदद ली थी. साल 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद बाह्य खुफिया एजेंसी की जरूरत देश को महसूस होने लगी थी. तब तक आईबी ही इंटेलिजेंस का काम करता था. लेकिन वो कई जगहों पर उतने बढ़िया तरीके से काम नहीं कर पा रही थी. ये देखते हुए साल 1968 को तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी ने रॉ का गठन करवाया. रामेश्वर नाथ काव इसके पहले डायेक्टर थे. इंदिरा गांधी ने ही तब उन्हें सलाह दी कि वो मोसाद के संपर्क में रहें ताकि प्रशिक्षण मिल सके. तब भी यहूदी बहुल देश होने के कारण इजरायल मुस्लिम देशों के निशाने पर था. और चूंकि भारत को पाकिस्तान का आतंक झेलना पड़ रहा था, लिहाजा इजरायल ने मदद की.

माना जा रहा है कि अब भी दिल्ली में भी रॉ और मोसाद का पक्का संबंध है. मोसाद भारत में अपने ऑपरेशन्स के लिए दिल्ली में सेफ ठिकाने रखता है, जिसमें रॉ उसकी मदद करता है. जम्मू-कश्मीर में सीआरपीएफ के काफिले पर हमले के तुरंत बाद भी इजरायल ने खुफिया बातें निकालने के लिए भारत को तकनीक और ट्रेनिंग की मदद की पेशकश की थी.
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