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ISRO को मिला ‘चांद की मिट्टी’ का पेटेंट, भारतीय आत्मनिर्भरता की है यह एक मिसाल

ISRO को मिला ‘चांद की मिट्टी’ का पेटेंट, भारतीय आत्मनिर्भरता की है यह एक मिसाल

नासा अगले साल आइरिस नाम का एक मिनी रोवर चंद्रमा पर भेज रहा है. (प्रतीकात्मक तस्वीर)

नासा अगले साल आइरिस नाम का एक मिनी रोवर चंद्रमा पर भेज रहा है. (प्रतीकात्मक तस्वीर)

ISRO ने चंद्रयान 2 (Chandrayaan 2,) के रोवर-लैंडर के परीक्षण के लिए एक खास मिट्टी बनाई थी जिसका पेटेंट उसे मिल गया है.

  • IANS
  • Last Updated :
    नई दिल्ली:  भारत के नाम अंतरिक्ष अनुसंधान में एक और उपलब्धि जुड़ गई है. इसका संबंध किसी अंतरिक्ष यान के प्रक्षेपण से नहीं बल्कि एक बड़े अभियान की तैयारी से है. अपने चंद्रयान 2 अभियान के लिए भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान  (ISRO) ने एक प्रयोगात्मक मिट्टी (Soil) बनाई थी जिस पर चंद्रमा पर जाने वाले विक्रम लैंडर और प्रज्ञान रोवर की परीक्षण किया जा सके. इसरो को इसी मिट्टी का पेटेंट मिल गया है.

    क्या है यह पेटेंट
    इसरो को स हाईलैंड लूनार स्वाइल सिम्यूलेंट या चांद की मिट्टी के निर्माण का पेटेंट मिला है. यू आर राव सैटेलाइट सेंटर के पूर्व निदेशक एम अन्नादुरई का कहना है कि पृथ्वी की सतह और चंद्रमा की सतह में बहुत ही ज्यादा अंतर है इसी लिए उनकी टीम को एक कृत्रिम मिट्टी का निर्माण करना पड़ा जिस पर रोवर और लैंडर का परीक्षण किया जा सके.

    क्यों अहम होती है ऐसी मिट्टी
    चंद्रमा पर किसी यान को भेजना एक बहुत ही कठिन और खर्चीला काम है. इसके लिए इस बात की तैयारी करनी पड़ती है कि जब कोई यान, रोवर या लैंडर चंद्रमा की सतह पर उतरे तो उसे कोई परेशानी न हो. इसके लिए जब इनका परीक्षण होता है तब ठीक चंद्रमा की सतह वाले हालात में ही परीक्षण करना जरूरी होता है. इसके लिए मिट्टी भी वैसी ही होनी चाहिए जैसी की चंद्रमा पर होती है. ऐसे में पृथ्वी की मिट्टी से काम नहीं चलता.

    इसरो ने खुद ही क्यों तैयार की ऐसी मिट्टी
    आम तौर पर इस तरह की मिट्टी का आयात अमेरिका ने करना पड़ता है और यह मिट्टी बहुत महंगी पड़ती है ,क्योंकि इस मिट्टी की करीब 60-70 टन की मात्रा में आवश्यकता पड़ती है. इसरो ने अपने परीक्षणों के लिए खुद ही खास तरह की कृत्रिम मिट्टी तैयारी की और उसके पेटेंट के लिए आवेदन भी कर दिया.

    Moon
    चंद्रमा की सतह पृथ्वी की सतह से बहुत अलग होती है.


    कहां मिली यह मिट्टी
    बहुत से भूगर्भविज्ञानियों ने इसरो को बताया था कि तमिलनाडु के सलेम के पास एनॉर्थोसाइट (anorthosite)  प्रकार की चट्टान हैं जिसमें वहीं गुण मिल सकते हैं जो चंद्रमा की मिट्टी यानि रेगोलिथ (Regolith) में पाए जाते हैं. इसरो ने सितमपोंडी और कुन्नामलाई गांव की एनॉर्थोसाइट  मिट्टी का उपयोग करने का फैसला किया.  एनॉर्थोसाइट चट्टानों को पीस कर निर्धारित आकार में मिट्टी बनाई गई और बेंगलुरू स्थिति लूनार टेरेन फेसिलिटी में भेजा गया जहां परीक्षण होना था. पेटेंट पत्र के अनुसार यह आविष्कार लूनार सिम्यूलैंट और उसके निर्माण और उत्पादन से संबंधित है. यह सिम्यूलैंट उसी रेगोलिथ के जैसा है जो अपोलो 16 चंद्रमा के नमूनों के साथ लाया था.

    क्या हो सकते हैं इसके उपयोग
     इसका उपयोग उन वैज्ञानिक अनुसंधानों में किया जा सकता है जिनमें किसी रोवर आदि का चंद्रमा की सतह वाले हालातों में परीक्षण किया जाना है. इसके अलावा अलावा इसका उपयोग चंद्रमा की मिट्टी रेगोलिथ के इंजीनियरिंग बर्ताव के अध्ययन के लिए भी किया जा सकता है. इससे चंद्रमा पर सिविल इंजिनियरिंग प्रोजेक्ट के लिए भी मदद मिल सकेगी.  शोधकर्ता यह जान सकेंगे कि चंद्रमा पर कोई इमारत खड़ी करने में मिट्टी के कारण क्या संभावित चुनौतियां आ सकती है. इसके अलावा चंद्रमा की सतह पर वाहन आदि कैसे चल फिर सकेंगे. उस मिट्टी का निर्माण पदार्थ के तौर पर क्या उपोयगिता हो सकती है, जैसी जानकारी भी हासिल हो सकती है.

    दो प्रकार की हो सकती है ये मिट्टी
    चंद्रमा की मिट्टी दो प्रकार की होती है. एक को हाईलैंड मिट्टी कह सकते हैं जो एनॉर्थोसाइट (anorthosite) चट्टानों से विकसित हो सकती है. इनमें एल्यूमीनियम और कैल्शियम की मात्रा अधिक होती है. जबकि दूसरा प्रकार मेर (Mare) मिट्टी जो बेसाल्ट चट्टानों से बनती है. इनमें लोहा, मैग्नीशियम और टाइटेनियम की मात्रा अधिक होती है, लेकिन शोध में ज्यादा ध्यान मिट्टी के भौतिक गुणों पर दिया गया था.

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    चंद्रमा पर रोवर भेजने के लिए चंद्रयान 2 अभियान के लिए इसरो ने यह मिट्टी तैयार की थी.


    यह पेटेंट भारत के अपने अंतरिक्ष अभियानों में आत्मनिर्भर प्रयासों का एक उदाहरण है. भारत को इस समय अंतरिक्ष यान प्रक्षेपण में महारत हासिल है. भारत दुनिया में सबसे सस्ते में अंतरिक्ष में कोई उपग्रह पहुंचा सकता है. इसरो की चंद्रमा पर रोवर उतारने की योजना हो या फिर कुछ समय बाद चंद्रमा पर मानव भेजने की. सभी पर पूरी आत्मनिर्भरता से ही काम चल रहा है.

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    Tags: Chandrayaan 2, ISRO, Research, Science, Space

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