वो घटना, जब इसरो के वैज्ञानिक को हवा में ही नष्ट करना पड़ा था करोड़ों का रॉकेट

जानिए उस घटना के बारे में, जब इसरो के वैज्ञानिक ने 325 करोड़ का रॉकेट हवा में ही धवस्त कर दिया था


Updated: July 27, 2019, 4:30 AM IST
वो घटना, जब इसरो के वैज्ञानिक को हवा में ही नष्ट करना पड़ा था करोड़ों का रॉकेट
इसरो का उपग्रह प्रक्षेपण

Updated: July 27, 2019, 4:30 AM IST
चंद्रयान-2 की सफलतापूर्वक लॉन्चिंग के बाद भारत ने अंतरिक्ष की दुनिया में एक बार फिर से इतिहास रचा है. 'मिशन मून' के तहत भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान यानी ISRO ने सोमवार को दोपहर 2.43 मिनट पर चंद्रयान-2 की सफलतापूर्वक लॉन्चिंग की. चांद पर कदम रखने वाला ये मिशन भारत के सबसे बड़े मिशन में से एक है. इस सफलता के पीछे कई लोगों का योगदान है. मिलिए ISRO के ऐसे ही शख्स से, उस साइंटिस्ट से जिसने 325 करोड़ का रॉकेट हवा में ही उड़ा दिया था.

इसरो सैटेलाइट लांच


वो दिन 25 दिसंबर 2010 का था. सुबह के 10.30 बजे थे. भारत के श्रीहरिकोटा स्थित इसरो के मिशन कंट्रोल सेंटर में वैज्ञानिकों की सांसें थमी हुई थीं. थोड़ा सा भय और बहुत सारा उत्साह. जीएसएलवी-एफ06 रॉकेट पर संचार उपग्रह जीसैट-5पी रखा था. इसके ठीक चार मिनट बाद 10.34 बजे रॉकेट को लॉन्च किया गया. लेकिन ये क्या! लॉन्च के 53.8 सेकंड बाद लोगों ने देखा कि रॉकेट एक बलास्ट के साथ आसमान में ध्वस्त हो गया.

वैज्ञानिकों और वहां मौजूद लोगों के चेहरे पर मायूसी छा गई. इसरो को लगभग 325 करोड़ का नुकसान हुआ था. इतनी बड़ी राशि की नुकसान एक बड़ा झटका था ही, लेकिन इससे बड़ा झटका था हजारों वैज्ञानिकों की महीनों की मेहनत का व्यर्थ हो जाना. इस बात को कई लोग नहीं जानते हैं कि इसरो वैज्ञानिकों का काम केवल रॉकेट लॉन्च करना ही नहीं है. लॉन्चिंग के बाद अगर रॉकेट दिशा से भटक जाता है या उड़ान के बाद उसमें कोई बड़ी खामी दिखाई देती है, तो ऐसा स्थिति में उसे हवा में ही बलास्ट करके ध्वस्त करना भी उसकी जिम्मेदारी है.

उपग्रह प्रक्षेपण


2010 में भी जीएसएलवी-एफ06 को इसी तरह लॉन्च के बाद हवा में ध्वस्त कर दिया गया था. आज हम बात कर रहे हैं एक ऐसे इसरो वैज्ञानिक के बारे में जिन्होंने इस रॉकेट को हवा में खत्म किया था. ताकि, दिशा से भटक रहे रॉकेट से आम लोगों को जान-माल की क्षति न पहुंचे. अब तक इसरो में ऐसे मौके केवल दो बार ही आए हैं जब रॉकेट को हवा में ध्वस्त किए गए हों. पहली घटना 2006 की है और दूसरी 2010 की. 2010 में रॉकेट को हवा में ध्वस्त करने वाले इस रॉकेट साइंटिस्ट ने पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम के साथ अग्नि मिसाइल के प्रक्षेपण में बतौर संरक्षा अधिकारी काम किया था. इस वैज्ञानिक का नाम है विनोद कुमार श्रीवास्तव.

इसरो के वैज्ञानिक विनोद कुमार श्रीवास्तव इंडिया टूडे को दिए इंटरव्यू में कहा, जब जीएसएलवी-एफ06 की लॉन्चिंग हो रही थी तब मैं सतीश धवन स्पेस सेंटर में रेंज सेफ्टी ऑफिसर था. मेरा काम था रॉकेट और रेंज की सेफ्टी. मैं बता दूं कि यहां सेफ्टी का अर्थ सुरक्षा नहीं है, इसरो के वैज्ञानिक इसे संरक्षा कहते हैं. यानी किसी अनचाहे परिणाम से रॉकेट को बचाना. जीएसएलवी-एफ 06 की लॉन्चिंग के बाद 47.5 सेकंड तक सब सही चल रहा था. 47.8 सेकंड में हमने देखा कि उसकी दिशा में कुछ गड़बड़ी आ रही है. इसके बाद रॉकेट में दिक्कतें तेजी से बढ़ने लगी. रॉकेट अपना दिशा तेजी से बदल रहा था. रॉकेट से जुड़ी सभी जानकारी हमें सेकंड के दसवें हिस्से में सबसे पहले मिलती है.
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इसरो उपग्रह


अगर रॉकेट कहीं गिरता तो बहुत बड़ा नुकसान हो सकता था. इस बात का ख्याल रखते हुए मैंने 53.8 सेकंड में डिस्ट्रक्शन का कमांड दिया. मैंने कहा- कमांड एग्जीक्यूटेड. तब रेंज ऑपरेशन डायरेक्टर ने कहा- रॉजर. इसके बाद इसकी पूरी रिपोर्ट उस समय के इसरो चेयरमैन के. राधाकृष्णनन को सौंपी गई. पूरा मिशन कंट्रोल सेंटर हैरान था. मैं खुद भी हैरान था कि मुझे रॉकेट को ध्वस्त करना पड़ रहा है. बहुत दुख होता है ऐसा करते हुए. लेकिन हमारे लिए लोगों की जान बेहद जरूरी होती है.

हवा में जाने के बाद रॉकेट में कोई बड़ी खामी होती है तो यह साफ हो जाता है कि मिशन कामयाब नहीं हो पा रहा है. रॉकेट किसी को नुकसान पहुंचाए उससे पहले उसे नष्ट कर देना पड़ता है. इसके बाद मैंने अपने इस काम की एक रिपोर्ट बनाकर इसरो के आलाकमान को सौंपी. उसमें मैंने बताया कि किस खास परिस्थिति में मुझे रॉकेट को ध्वस्त करना पड़ा.

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First published: July 26, 2019, 4:30 AM IST
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