क्या सच में फांसी से पहले पूछी जाती है आखिरी इच्छा. क्या है जेल मैन्युअल

क्या जेल मैन्युअल फांसी से पहले सजायाफ्ता की आखिरी इच्छा के बारे में कुछ कहता है.

क्या जेल मैन्युअल फांसी से पहले सजायाफ्ता की आखिरी इच्छा के बारे में कुछ कहता है.

आमतौर पर हमारी फिल्मों में फांसी की सजा पाए कैदियों की आखिरी इच्छा को बहुत नाटकीय या सनसनीखेज तरीके से पेश किया जाता है. क्या वास्तव में आखिरी इच्छा जैसी कोई बात जेल मैन्युअल में होती है.

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  • Last Updated: February 17, 2021, 12:27 PM IST
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अमरोहा की शबनम को इस महीने के आखिर या मार्च के शुरू में फांसी की सजा होनी है. हालांकि तिथि अभी तय नहीं है. क्या होती है फांसी देने की पूरी प्रक्रिया. क्या वाकई फांसी देने से पहले सजायाफ्ता से उसकी आखिरी इच्छा पूछी जाती है.

जेल मैन्युअल के अनुसार एक जल्लाद का काम उसी दिन से शुरू हो जाता है, जब मुजरिम को फांसी की सजा सुनाई जाती है. ऑर्डर की एक-एक कॉपी मुजरिम और उसके परिवार को सौंपी जाती है. जल्लाद को भी सूचना दे दी जाती है. जिस तरह मथुरा में पवन जल्लाद दो बार दौरे करके फांसी की तैयारियां करवा रहा है, उसका मतलब ये हुआ कि कोर्ट से फांसी का आर्डर हो गया है. अब इसकी तारीख जेल प्रशासन और मजिस्ट्रेट मिलकर तय कर लेंगे.

क्या कैदी से आखिरी इच्छा पूछी जाती है

- लंबे समय से कैदी की आखिरी इच्छा को फिल्मों में बहुत ड्रामेटाइज करके दिखाया जाता रहा है. वास्तव में कैदी से आखिरी इच्छा पूछने में दो बातें ही आमतौर पर उससे पूछी जाती हैं कि वो आखिरी समय में क्या कुछ खास खाना चाहता है या किसी तरह की कोई पूजा या आराधना करना चाहता है. आखिरी समय से पहले उसकी वसीयत के बारे में भी पूछा जाता है
क्या जेल मैन्युअल में है आखिरी इच्छा

लंबे समय तक दिल्ली जेल में लॉ अफसर रहे सुनील गुप्ता ने पिछले दिनों मीडिया को बताया था, आखिरी इच्छा वाली कोई बात नहीं होती. मान लीजिए, अपराधी आखिरी इच्छा के तौर पर कह दे कि उसे फांसी नहीं दी जाए, तो उसकी बात नहीं मानी जा सकती या कोई भी ऐसी चीज़ मांग ले, जो आप नहीं दे सकते.यह भ्रम है, जेल मैनुअल में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है?"

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फांसी के वक्त कितने लोग मौजूद रहते हैं

-फांसी के वक्त पांच लोगों को मौजूद रहना चाहिए. जिसमें जेल सुपरिटेंडेंट, डिप्टी सुपरिटेंडेंट, असिस्टेंट सुपरिटेंडेंट और मेडिकल अफसर होते हैं. जिलाधिकारी द्वारा नियुक्त एक मजिस्ट्रेट भी वहां रहता है, जो डेथ वारंट पर हस्ताक्षर करता है. कैदी की इच्छा के आधार पर उसके धार्मिक विश्वास के मुताबिक एक पुजारी फासी के स्थल पर मौजूद रह सकता है.

फांसी से कितनी देर पहले उस जगह का मुआयना होता है और उसे तकनीक तौर पर मुकम्मल देने की रिपोर्ट तैयार की जाती है.

कब फांसी स्थल का मुआयना आखिरी बार होता है

-जेल सुपरिटेंडेंट की मौजूदगी में फांसी देने से एक दिन पहले इंजीनियर फांसी स्थल का निरीक्षण करता है. अपनी ओके रिपोर्ट दे देता है. तकनीक तौर पर फांसी का ये आखिरी मुआयना होता है. उस समय एक डमी को फांसी की सजा दी जाती है.

कब होता है फांसी स्थल पर गहराई का निर्धारण

-फांसी के कुछ दिन पहले ही एक मेडिकल अफसर ये देखता है कि फांसी के तख्त के नीचे कितनी गहराई होनी चाहिए. इसका निर्धारण कैदी के वजन और लंबाई के आधार पर होता है.

फांसी देने से पहले क्या होता है

-फंदा डालने से पहले सजायाफ्ता के चेहरे को सूती कपड़े से ढंका जाता है. जल्लाद उसे वहां खड़ा करता है, जहां पर फंदा लटका होता है. कैदी के हाथ सख्ती से बंधे रहते हैं. फंदा गले में डाला जाता है.

क्या फांसी के बाद शव परिजनों को देना जरूरी होता है या फिर इसका निर्धारण जेल प्रशासन करता है.

फांसी के फंदे पर कितनी देर तक लटकाया जाता है

- शरीर को 30 मिनट तक फंदे पर लटकाया जाता है, जब मेडिकल अफसर ये घोषित कर देता है कि अब फांसी दिए गए शख्स की मौत हो चुकी है, तब उसको उतार लिया जाता है.

क्या फांसी के बाद बॉडी परिजनों को देना जरूरी है

- नहीं, इसका निर्धारण जेल प्रशासन ही करता है. हालांकि सामान्य मामलों में अगर अंतिम संस्कार के लिए मृतक के रिश्तेदार लिखित रूप से आवेदन करते हैं, तो शव उन्हें दे दिया जाता है.

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फांसी से पहले अपराधी से क्या पूछा जाता है

- जिस दिन फांसी दी जानी होती है, सुबह 4:30 या 5 बजे के करीब अपराधी को चाय पिलाई जाती है. वे नहाना चाहें, तो नहा भी लेते हैं. नाश्ता करना चाहते हैं, तो नाश्ता भी करवाया जाता है.मजिस्ट्रेट अपराधी से किसी वसीयत आदि के बारे में पूछते हैं. ये पूछते हैं कि आपको अपनी कोई जायदाद किसी के नाम करनी है, तो कर सकते हैं.वसीयत रिकॉर्ड हो जाने के बाद वो शख्स जल्लाद के हवाले कर दिया जाता है.

फांसी के तख्त पर कौन करता है फांसी देने का इशारा

तख्ते पर जब जल्लाद सजायाफ्ता के ढंके हुए चेहरे पर रस्सी का फंदा डाल देता है तो इसके बाद जेल सुपरिंटेंडेंट के इशारे का इंतजार करता है. इशारा होते ही लीवर खींचकर तख्ते को एक वेल में गिरा दिया जाता है. लीवर खींचते ही शरीर हवा में लटक जाता है और कुछ देर में गर्दन खींचने से ऑक्सीजन की आपूर्ति बंद हो जाती है और मौत हो जाती है.

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आजाद भारत में फांसी की सजा पाने वाली पहली महिला है शबनम. ये भी जानें कि आखिरी पूरी दुनिया में फांसी भोर में ही क्यों दी जाती है, जब आमतौर पर पूरी दुनिया सोयी होती है.

आमतौर पर फांसी भोर में ही क्यों दी जाती है

- फांसी को सुबह तड़के शांत बेला में देने की तीन वजहें हैं, जो प्रशासनिक, व्यावहारिक और सामाजिक पहलुओं से जुड़ी हैं.

आमतौर पर फांसी एक खास घटनाक्रम होता है. अगर ये दिन के दौरान होंगी तो जेल का सारा फोकस इसी पर टिक जाएगा. इससे बचने की कोशिश की जाती है ताकि जेल की दिनभर की अन्य गतिविधियों पर कोई असर नहीं पड़े. सारी गतिविधियां सुचारू तौर पर काम करती रहें. फांसी होने के बाद मेडिकल परीक्षण होता है और उसके बाद कई तरह की कागजी कार्यवाहियां. इन सबमें भी समय लगता है.

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ये माना जाता है कि जिस फांसी दी जा रही है, उसका मन सुबह भोर के समय में ज्यादा शांत रहता है. सोकर उठने के बाद फांसी देने पर वो ज्यादा शारीरिक तनाव और दबाव का शिकार नहीं होता. अगर फांसी दिन में हो तो सजायाफ्ता का तनाव और मानसिक स्थिति बिगड़ सकती है.

जिसे फांसी होती है, उसे सुबह तीन बजे ही उठना होता है ताकि वो अपने सारे काम फांसी से पहले निपटा ले, जिसमें प्रार्थना और अकेले में कुछ समय के लिए अपने बारे में सोच-विचार करना आदि भी शामिल है. सबसे बड़ी बात है कि फांसी के बाद उसके परिजनों को शव सौंप दिया जाए, ताकि वो उसे लेकर अपने गंतव्य तक जा सकें और दिन में ही अंतिम संस्कार कर लें.

फांसी का तीसरा पक्ष सामाजिक है. चूंकि ये खास घटना होती है लिहाजा बड़े पैमाने पर लोगों का ध्यान आकर्षित करती है. इसके चलते जेल के बाहर बड़े पैमाने पर तमाशबीन इकट्ठा होने और हंगामा होने के भी आसार होते हैं. लिहाजा कोशिश होती है कि जब तक लोग सोकर उठें तब तक फांसी हो जाए.

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