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Jagdish Chandra Bose B’day: खोजों से लेकर वैज्ञानिक साहित्य तक अद्भुत योगदान

Jagdish Chandra Bose B’day: खोजों से लेकर वैज्ञानिक साहित्य तक अद्भुत योगदान

जगदीश चंद्र बोस (Jagdish Chandra Bose) एक बेहतरीन शिक्षक के तौर पर भी प्रसिद्ध थे. (तस्वीर: Wikimedia Commons)

जगदीश चंद्र बोस (Jagdish Chandra Bose) एक बेहतरीन शिक्षक के तौर पर भी प्रसिद्ध थे. (तस्वीर: Wikimedia Commons)

जगदीश चंद्र बोस (Jagdish Chandra Bose) भारत के पहले वैज्ञानिक शोधकर्ता थे. उन्होंने विज्ञान, जीव विज्ञान, भौतिकी, वनस्पति शास्त्र के विषयों में अपनी खोजों और प्रयोगों से पूरी दुनिया को प्रभावित किया और रेडियो संचार (Radio Communication) जैसे आविष्कार तक दिए फिर भी उन्हें नोबेल पुरस्कार (Nobel Prize) से नवाजा नहीं जा सका जबकि उन्हें रेडियो संचार का पिता या जनक कहा जाता है. उन्होंने भारतीय संस्कृति को, विशेषतौर पर उपनिषदों को आधुनिक विज्ञान से जोड़ने का काम किया था.

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    आधुनिक भारतीय विज्ञान (Modern Indian Science) में सबसे पहले वैज्ञानिक शोधकर्ता के रूप में जगदीश चंद्र बोस (Jagdish Chandra Bose) का नाम लिया जाता है. 19वीं सदी के अंत और 20 वीं सदी के शुरुआत में बोस ने अपने योगदान से देश को विज्ञान की दुनिया पर वैश्विक पटल पर ला दिया था. उन्होंने भौतकी, वनस्पति विज्ञान, जीव विज्ञान जैसे विषयों को भारतीय संस्कृति से तो जोड़ने का काम किया है. विज्ञान साहित्य तक में अपना योगदान देते हुए आम लोगों को भी विज्ञान से रूबरू होने का मौका दिया. उन्हें रेडियो संचार के पिता के रूप में जाना जाता है. 30 नवंबर को उनकी जन्मदिन पर देश उन्हें याद कर रहा है.

    अपने ही गांव में शुरुआती पढ़ाई
    जगदीश चंद्र बोस का जन्म 30 नवंबर, 1858 को ब्रिटिश शासन के पूर्वी बंगाल के मेमनसिंह के ररौली गांव में हुआ था जो अब बांग्लादेश में है. उनके पिता भगवान चन्द्र बसु ब्रह्म समाज के नेता और ब्रिटिश शासन में कई जगहों पर डिप्टी मैजिस्ट्रेट या सहायक कमिश्नर थे. बोस ने अपनी शुरुआती पढ़ाई अपने पिता द्वारा स्थापित गांव के ही एक स्कूल में की थी.

    बचपन से जीव विज्ञान में रुचि
    बचपन से ही बोस की प्रकृति के करीब रहने में बहुत दिलचस्पी थी. इसी वजह से उनकी जीव विज्ञान में भी गहरी रुचि जागृत हुई. 11 साल की उम्र में वे कलकत्ता आ गए और सेंट जेवियर स्कूल में दाखिला लिया. इसके बाद चिकित्सा विज्ञान की पढ़ाई के लिए वे लंदन चले गए हैं. लेकिन स्वास्थ्य खराब होने की वजह वे डॉक्टर बनने का इरादा छोड़कर कैम्ब्रिज कॉलेज चले गए, जहां उन्होंने भौतिक शास्त्र का प्रमुख रूप से अध्ययन किया.

    शिक्षण के प्रति समर्पण
    बोस 1885 में स्वदेश लौटे और कलकत्ता के प्रेसिडेंसी कॉलेज में सहयाक प्रोफेसर के तौर पर पढ़ाने लगे. अंग्रेजी प्रोफेसरों की तुलना में भारतीय प्रोफेसरों को कम वेतन मिलने का विरोध किया जिसके कारण उन्होंने तीन साल तक बिना वेतन तक पढ़ाया, लेकिन उन्होंने पढ़ाना नहीं छोड़ा. बोस के ही कुछ छात्र जैसे सतेन्द्र नाथ बोस आगे चलकर प्रसिद्ध भौतिकशास्त्री बने थे.

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    जगदीश चंद्र बोस (Jagdish Chandra Bose) के यंत्रों की वजह से ही आधुनिक रेडियो संचार की दिशा तय हो सकी थी. (तस्वीर: Wikimedia Commons)

    पौधों में होती है जान
    जगदीश चंद्र बोस ने केस्कोग्राफ नाम के एक यंत्र का आविष्कार किया. यह आस-पास की विभिन्न तरंगों को माप सकता था. बाद में उन्होंने प्रयोग के जरिए साबित किया था कि पेड़-पैधों में जीवन होता है. इसे साबित करने का यह प्रयोग रॉयल सोसाइटी में हुआ और पूरी दुनिया में उनकी खोज को सराहा गया था.

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    रेडियो संचार के जनक
    वैज्ञानिक तबके में माना जाता है बोस के बनाए गए वायरलेस रेडियो जैसे यंत्र से ही रेडियो का विकास हो सका. लेकिन अपने नाम से पेटेंट करा लेने के चलते रेडियो के आविष्कार का श्रेय इटली के वैज्ञानिक जी मार्कोनी को दिया जाता है. यहां तक कि मार्कोनी को इस खोज के लिए 1909 का भौतिकी का नोबेल पुरस्कार भी मिला.

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    जगदीश चंद्र बोस (Jagdish Chandra Bose) ने साबित किया था कि पेड़ पौधों में जान होती है. (तस्वीर: Wikimedia Commons)

    बोस और उपनिषद
    बोस ने वेदांतों और उपनिषदों का वैज्ञानिक पक्ष रखा था जिससे गुरुदेव रबींद्रनाथ टैगोर, स्वामी विवेकानंद और सिस्टर निवेदिता जैसी हस्तियां प्रभावित थीं. उपनिषद आधारित विज्ञान पर उनकी चर्चित किताब ‘रिस्पॉन्सेस इन द लिविंग एंड नॉन लिविंग’ का संपादन सिस्टर निवेदिता ने किया था. निवेदिता और टैगोर के बीच हुए पत्र व्यवहार से भी पता चलता है कि निवेदिता ने वेदांतों और उपनिषदों के काफी अध्ययन के बाद बोस के कार्यों का सम्पादन किया था.

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    बोस को बंगाली विज्ञान साहित्य का जनक भी कहा जाता है. 1896 में बोस ने निरुद्देशर कहानी लिखी थी जो एक छोटी सी कहानी थी लेकिन 1921 में उनके संकलन अभ्यक्त का हिस्सा बनी. 1917 में उन्हें नाइटहुड की उपाधि प्रदान की गई जिसके बाद बोस को सर जगदीश चंद्र बोस के नाम से जाना जाने लगा. 23 नवंबर 1937 को 78 साल की उम्र में उनका देहांत हो गया.

    Tags: India, Research, Science

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