पुण्यतिथि : एक-दो नहीं चार बार जगजीवन राम के हाथों से फिसला था पीएम पद, एक बार बेटे के चलते लगा था झटका

पुण्यतिथि : एक-दो नहीं चार बार जगजीवन राम के हाथों से फिसला था पीएम पद, एक बार बेटे के चलते लगा था झटका
वो शायद देश के अकेले नेता थे, जिनके हाथों से कई बार पीएम का पद फिसलता रहा

बाबू जगजीवन राम की आज पुण्यतिथि है. वो एक दो बार बल्कि कई बार प्रधानमंत्री नहीं बन पाए. ये पद उनके हाथ में आने से पहले फिसल गया. हालाकि जगजीवन राम की गिनती एक काबिल राजनीतिज्ञ और केंद्रीय मंत्री के रूप में होती है. इंदिरा से बाद में उनकी अनबन हुई. उन्होंने कांग्रेस छोड़ी लेकिन पीएम बनने का सपना उनके लिए सपना ही रहा.

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बाबू जगजीवन राम की आज यानि 06 जुलाई को पुण्यतिथि है. 1986 में उनका निधन दिल्ली में हुआ था. वो देश के ऐसे नेता थे. जिनके सामने कम से कम चार बार प्रधानमंत्री बनने के चांस थे लेकिन वो एक बार भी पीएम नहीं बन सके. एक बार तो उनके बेटे सुरेश राम की अश्लील तस्वीरें राह में रोड़ा बन गईं. वो लगातार 33 सालों तक मंत्री रहे. ये भी एक रिकॉर्ड है. बिहार के दलित घर में पैदा होने के बाद अपनी दृढइच्छा शक्ति और मजबूत इरादों से वो भारतीय राजनीति में एक बड़ा नाम बने.

चूंकि वो बिहार के आरा जिले में दलित घर में पैदा हुए थे, लिहाजा उनकी राह में सामाजिक भेदभाव से लेकर छुआछूत की खासी बाधाएं आईं. उन्होंने इन्हें लांघा ही नहीं बल्कि जब जरूरत पड़ी तो इसके खिलाफ विरोध भी किया. अपनी बात भी मनवाई.

स्कूल से ही शुरू हो गई थी भेदभाव के खिलाफ लड़ने की आदत
वो बिहार में जिस घर में पैदा हुए थे. वो मामूली घर था. 06 भाई-बहन थे. बिहार के आरा के जिस स्कूल में वो पढ़ने गए, वहां हिंदू और मुसलमान छात्रों के लिए पीने के पानी के अलग-अलग मटके रखे जाते थे. जब दलित समुदाय के छात्रों ने हिंदू छात्रों के लिए रखे मटके से पानी पिया तो इस पर हंगामा हो गया.  स्कूल के प्रिंसिपल ने दलितों के लिए एक और मटका रखवा दिया.
जगजीवन राम ने दलितों के लिए रखे अलग मटके को फोड़कर अपना विरोध प्रकट किया. आखिर में  प्रिंसिपल को उनकी बात माननी पड़ी. उन्होंने तीसरा मटका नहीं रखने का निर्णय लिया. वैसे स्कूल की इसी घटना से उनके जीवन की दिशा तय हो गई.



बीएचयू में विरोध प्रदर्शन
जगजीवन प्रतिभाशाली थे. मैट्रिक में प्रथम श्रेणी से परीक्षा पास की थी. एक बार बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के संस्थापक मदन मोहन मालवीय उनके स्कूल में एक कार्यक्रम में आए. उसमें छात्र जगजीवन के भाषण से वो बहुत प्रभावित हुए. हालांकि बाद में उन्हीं के विश्व विद्यालय में जगजीवन राम ने विरोध प्रदर्शन भी किया.

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फर्स्ट डिविजन में मैट्रिक पास करने के बाद जगजीवन राम ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में दाखिला लिया. वहां विश्वविद्यालय में होने वाले भेदभाव के खिलाफ पीड़ितों को एकजुट कर विरोध जाहिर करते हुए प्रदर्शन किया.

जगजीवन राम बिहार के दलित घर में पैदा हुए थे. वहां से उन्होंने अपनी इच्छाशक्ति की बदौलत लंबी दूरी तय की


संस्कृत के विद्वान थे
जगजीवन राम हिंदू महासभा के सदस्य भी थे. वो संस्कृत भाषा के खासे जानकार और विद्वान थे. उन्हें कम से कम दो बार उनके मंत्रि पद के योगदान के लिए किया जाता है. 1971 में पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध में वो रक्षा मंत्री थे. तब बांग्लादेश का निर्माण हुआ था. फिर जब हरित क्रांति हुई तो कृषि मंत्री थे.

लंबा संसदीय जीवन
बाबू जगजीवन राम के संसदीय जीवन का इतिहास 50 साल का रहा.वो आजादी से पहले से बनी सरकारों में भी शामिल थे.  1938 से 1979 तक लगातार चुने जाते रहे. 1946 से लेकर 1979 तक लगातार केंद्रीय मंत्री रहे. 1946 में नेहरूजी की प्रोविजनल कैबिनेट में जगजीवन राम सबसे युवा मंत्री के रूप में शामिल हुए थे.

तब इंदिरा ने कहा था-हम आपको प्रधानमंत्री बनाएंगे
1975 में जब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी के खिलाफ फैसला सुनाया तो वो जगजीवन राम के घर गईं. उन्होंने तब उनसे कहा था कि अगर प्रधानमंत्री पद से हटती हैं तो अगला प्रधानमंत्री उन्हें ही बनाया जाएगा.

इंदिरा गांधी ने भी इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला आने के बाद 1975 में उनसे कहा था कि अगर वो पद से हटती हैं तो उन्हें पीएम बनाया जाएगा


हालांकि ये कहा जाता है कि जब इंदिरा गांधी ने 25जून की आधी रात इमर्जेंसी लगाने की घोषणा की तो अगले दिन कैबिनेट की मीटिंग बुलाई. उसमें जगजीवन राम के जरिए आपातकाल का प्रस्ताव पेश कराया गया. हालांकि जगजीवन राम बाद में लगातार कहते रहे कि ये काम उन्हें इंदिरा के दबाव में करना पड़ा था.

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कांग्रेस छोड़ नई पार्टी बनाई
इमर्जेंसी हटते ही उन्होंने हेमवती नंदन बहुगुणा के साथ कांग्रेस से इस्तीफा देकर नई पार्टी बनाई. तब विपक्ष को एक जुट करने पर लगे जयप्रकाश नाराणण ने उनसे वाद किया कि अगर वो अपनी पार्टी  'कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी' का विलय जनता पार्टी में कर लें तो पार्टी के जीतने की स्थिति में प्रधानमंत्री पद के दावेदार होंगे.

जब दूसरी बार पीएम नहीं बन सके
जनता पार्टी के जीतन के बाद जगजीवन राम ने प्रधानमंत्री बनने का अपना दावा पेश किया  लेकिन दो बातें प्रमुख तौर पर उनके खिलाफ गईं. पहला- इंमर्जेसी के दौरान उसके पक्ष में दिया गया उनका भाषण और उसी दौरान उनके बेटे सुरेश राम की अश्लील तस्वीरों का सामने आ जाना. नतीजतन मोरारजी देसाई ने पीएम पर बाजी मार ली. उनके बेटे के सेक्स स्कैंडल की तस्वीरों के चलते पूरे देश में काफी भूचाल की स्थिति आ गई थी.

न्यूड तस्वीरों के चलते खत्म हुआ राजनीतिक करियर
प्रधानमंत्री न बनने के पीछे एक कारण 1978 में सूर्या नाम की एक पत्रिका में जगजीवन राम के बेटे सुरेश राम को यूपी के बागपत जिले के गांव की एक महिला के साथ शारीरिक संबंध बनाते हुए आपत्तिजनक स्थिति में दिखाया जाना रहा.

इन तस्वीरों ने सियासी गलियारे में तूफान ला दिया. इस स्कैंडल में सुरेश राम के साथ दिख रही युवती दिल्ली विश्वविद्यालय के सत्यवती कॉलेज की छात्रा थी. कहा जाता है कि इसके बाद सुरेश ने उससे शादी भी की थी. लेकिन सुरेश की मौत के बाद जगजीवनराम के परिवारवालों ने उसका बहिष्कार कर दिया.

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खुशवंत सिंह थे इस कांड को सामने वाले सूत्रधार
रिपोर्ट के अनुसार इस चर्चित सेक्स स्कैंडल का सूत्रधार खुशवंत सिंह को माना जाता है. वह उस समय कांग्रेस के अखबार नेशनल हेराल्ड के प्रधान संपादक और मेनका की पत्रिका सूर्या के कंसल्टिंग एडिटर थे. वही बंद लिफाफे में तस्वीरें लेकर पहुंचे थे.

सूर्या पत्रिका की संपादक इंदिरा गांधी की बहू मेनका गांधी थीं. इस सेक्स स्कैंडल का जिस वक्त खुलासा हुआ उस वक्त जगजीवन राम, मोरारजी देसाई की सरकार में रक्षा मंत्री थे. उनकी गिनती कद्दावर नेताओं में होती थी, लेकिन स्कैंडल ने उनके पीएम बनने के सपने को हमेशा के लिए तोड़ दिया. इससे उनका करियर ही खत्म हो गया.

जब 1971 में पाकिस्तान से युद्ध हुआ और अलग देश बांग्लादेश बना तब वो देश के रक्षा मंत्री थे. इससे पहले जब देश में हरित क्रांति हई तब वो कृषि मंत्री थे


फिर पीएम बनने का मौका हाथ से गया
जब 1979 में मोरारजी की सरकार दोहरी सदस्यता के मामले पर गिर गई तो फिर चौधरी चरण सिंह और बाबू जगजीवन राम के बीच पीएम पद के लिए राजनीतिक युद्ध हुआ. इंदिरा गांधी ने कहा कि अगर  जगजीवन राम उनके हितों के खिलाफ कुछ नहीं बोलें तो वो प्रधानमंत्री बन सकते हैं. लेकिन इस बार भी चरण सिंह ने बाजी मार ली. इस बार इंदिरा गांधी ने चरण सिंह को समर्थन दे दिया.

तब कहा गया कि उनके छूने से मूर्ति अपवित्र हो गई
24 जनवरी 1978 को उन्होंने रक्षा मंत्री के रूप में वाराणसी में जब संपूर्णानंद की मूर्ति का अनावरण किया तो विवाद हो गया. ये कहा गया कि उनके छूने से मूर्ति अपवित्र हो गई. मूर्ति को गंगा जल से धोकर पवित्र किया. इस घटना ने उन्हें व्यथित कर दिया था.

उपप्रधानमंत्री बने
24 जनवरी 1979 को देश के उप प्रधानमंत्री बने. 1946 से लेकर 1986 तक निरतंर 40 वर्षों तक सासाराम संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर उन्होंने विश्व कीर्तिमान बनाया. 6 जुलाई 1986 को दिल्ली के राममनोहर लोहिया अस्पताल में उनका देहांत हुआ.

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बाद में वो कांग्रेस में शामिल होना चाहते थे
हालांक कांग्रेस ने उनकी बेटी मीरा कुमार को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया. वो लोकसभा की स्पीकर भी रहीं.  जीवन के अंतिम सालों में जगजीवन राम चाहते थे कि वो फिर से कांग्रेस पार्टी में शामिल हों, लेकिन इंदिरा गांधी और राजीव गांधी को यह स्वीकार नहीं था.
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