जलियांवाला बाग के खलनायक डायर को मिलनी चाहिए थी फांसी, किसने उसे बचाया

कर्नल रेगिनाल्ड डायर को हंटर कमीशन ने दोषी तो माना लेकिन उस पर कोई आपराधिक मामला नहीं बनाया यही काम ब्रिटिश संसद ने भी किया. जबकि उस समय ब्रिटिश हुक्मरान देशभक्तों को हल्के अपराधों पर भी फांसी की सजा दे देते थे.

कर्नल रेगिनाल्ड डायर को हंटर कमीशन ने दोषी तो माना लेकिन उस पर कोई आपराधिक मामला नहीं बनाया यही काम ब्रिटिश संसद ने भी किया. जबकि उस समय ब्रिटिश हुक्मरान देशभक्तों को हल्के अपराधों पर भी फांसी की सजा दे देते थे.

कर्नल रेगिनाल्ड डायर जलियांवाला बाग का खूनी खलनायक था. अकेला इस नरसंहार के लिए जिम्मेवार. हंटर कमीशन की सुनवाई में जिस तरह उसने सवालों के जवाब दिए, उससे भी ये जाहिर हो गया. सही बात ये है कि वो तुरंत फांसी की सजा पाने का हकदार था. लेकिन ब्रिटिश राज ने उसे बचाया बल्कि काफी हद तक वो ब्रिटेन में हीरो भी रहा.

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 14, 2021, 6:20 PM IST
  • Share this:
दुनिया के सबसे भयानक नरसंहारों में एक था जालियांवाला बाग नरसंहार. इसके बाद पूरे देश में गुस्सा फूट पड़ा था. दुनिया भर में भी ब्रिटिश राज की बहुत बदनामी हुई थी. भारत में हुकूमत करने वाली ब्रिटिश सरकार दुनिया में कहीं मुंह दिखाने के लायक नहीं रह गई थी. आनन-फानन में कर्नल रेगिनाल्ड डायर को पद से मुक्त कर दिया गया. लेकिन सुनवाई के दौरान ये साबित होने के बाद भी इस नरसंहार के लिए वो अकेले जिम्मेवार था, उस पर कोई आपराधिक सजा नहीं दी गई. नियमानुसार उसे इतने बड़े नरसंहार के लिए फांसी की सजा होनी थी लेकिन पहले हंटर कमीशन और फिर ब्रिटिश हुक्मरानों ने उसे छोड़ दिया. वो ब्रिटेन लौट गया लेकिन वहां वो कई हलकों में हीरो बन गया. ये वाकई भारत ब्रिटिश राज के भयानक पक्षपात और अमानवीयता की कहानी भी कहता है.

जलियांवाला बाग नरसंहार के बाद एक जांच कमेटी बनी. मोटे तौर पर इसका मुख्य उद्देश्य कर्नल डायर को बचाना था. इस जांच कमेटी के अध्यक्ष लॉर्ड विलियम हंटर थे, जिनके नाम पर इस कमेटी को हंटर कमीशन कहा गया. डायर को 19 नवंबर को इस कमेटी के सामने पेश किया गया. इसमें जिस तरह पूछताछ हुई और इसमें डायर ने खुद अपना गुनाह कबूल किया, उसके बाद उसे सजा नहीं देना हैरान करने वाला ही है.

Youtube Video


कमेटी के सभी ब्रिटिश सदस्यों की कोशिश थी कि डायर को निर्दोष साबित किया जाए. इस कमेटी में एक भारतीय वकील सर चिमनलाल सीतलवाड़ भी शामिल थे. उन्होंने तीखी जिरह करते हुए डायर को यह कहने पर मजबूर कर दिया कि उसने जो किया, वो खुद उसके दिमाग की उपज ही नहीं थी बल्कि उसने जानबूझकर ऐसा किया था.
इस कानूनी बहस का अंश यहां पढ़िए जब डायर ने आखिरकार माना कि वो ये इरादा लेकर ही जलियांवाला बाग में घुसा था कि वो बड़े पैमाने पर वहां कत्लेआम करेगा. इस जिरह के बारे में नेशनल बुक ट्रस्ट की किताब "जलियांवाला बाग" और इस बारे में प्रकाशित तकरीबन सभी किताबों में दिया गया है.

सवाल: जब तुम बाग में गए, तो तुमने क्या किया?

जवाब: मैंने गोली चलाई.



सवाल: तुरंत?

जवाब: फौरन. मैंने सोच लिया था कि मुझे क्या करना है और कैसे करना है.

सवाल: क्या गोली चलाने के तुरंत बाद भीड़ तितर-बितर होने लगी थी?

जवाब: हां, फौरन ही.

सवाल: क्या तुम फिर भी गोली चलाते रहे?

जवाब: हां

सवाल: क्या भीड़ ने बाग के कुछ रास्तों से निकलने की कोशिश की थी?

जवाब: हां

सवाल: उन जगहों पर भीड़ बहुत रही होगी?

जवाब: हां

सवाल: किसी किसी वक्त तुम फायरिंग का रुख बदलकर सीधा उसी भीड़ पर गोली चलाने लगे?

जवाब: हां क्योंकि ठीक था

सवाल: क्या ये वाकई ठीक था?

जवाब: हां, ये ठीक था

सवाल: क्या तुमने पहले ही फैसला कर लिया था कि तुम भीड़ पर गोली चलाओगे?

जवाब: हां, मैंने फैसला कर लिया था कि मैं वहां पहुंचते ही तुरंत फायरिंग शुरू कर दूंगा. वक्त आ गया था कि कड़ी कार्रवाही की जाए. अगर मैं ऐसा नहीं करता तो मेरा कोर्टमार्शल कर दिया जाता.

सवाल: अगर जलियांवाला बाग का रास्ता चौड़ा होता और तुम गाड़ियां लेकर अंदर जाते तो क्या मशीनगनों से फायरिंग कराते?

जवाब: हां, शायद मैं ऐसा ही करता.

सवाल: उस हालत में तो मरने वालों की संख्या और ज्यादा होती?

जवाब: हां ऐसा जरूर होता.

सवाल: क्या ये समझा जाए कि तुम गोली चला कर लोगों के दिलों में दहशत पैदा करना चाहते थे?

जवाब: मैं सैनिक दृष्टि से उनके दिलों पर गहरा असर डालना चाहता था.

सवाल: दहशत केवल अमृतसर में नहीं, बल्कि पूरे पंजाब में?

जवाब: हां, सारे पंजाब में. मैं उनका आत्मविश्वास और मनोबल तोड़ना चाहता था.

इसके बाद डायर ने हंटर कमीशन की रिपोर्ट पर अपनी विरोधी टिप्पणी भी लिखी. ब्रिटिश संसद में भी डायर की बहुत थू-थू हुई थी. उसके अकेले तौर पर आधिकारिक रूप से जलियांवाला बाग में मारे गए 379 की मौत का जिम्मेदार ठहराया गया. इसमें हजारों लोग घायल हुए थे. उसे नौकरी से हटाया जरूर गया लेकिन ये उसके किए गए खूनी कृत्य की तुलना में बहुत हल्की सजा थी. लेकिन ब्रिटिश राज के कुछ बड़े अफसर भी उसे हीरो मानते थे. लेकिन कुछ इतिहासकारों का ये भी कहना है कि इसके बाद भारत में ब्रिटिश राज के अंत की शुरुआत निर्णायक तौर पर हो गई थी. बाद में जो कुछ ब्रिटिश इतिहासकारों ने भी माना कि डायर ने जो किया वो आर्मी के नियमों के अनुसार भी सही नहीं था. 

कैसे हुई मौत

इस नरसंहार के 08 साल बाद डायर एक के एक कई स्ट्रोक्स का शिकार हुआ. वो इससे पैरालाइज हो गया. वो बोलने में असमर्थ हो गया. 27 जुलाई 1927 को ब्रेन हैमरेज से उसका 62 साल की उम्र में निधन हो गया. उसकी मौत सामरसेट में उसके कॉटेज में हुई. वो अपने पीछे काफी प्रापर्टी छोड़ गया. हालांकि अंत समय तक उसने अपने काम को जस्टिफाई ही किया.
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज